भारतभूषण आर. गांधी

क्या भारतीय सच में आवारा पशु ही हैं? शायद सभी ना सही, लेकिन 90 फ़ीसदी तो जरूर हैं। एक फिल्म में नाना पाटेकर का डायलॉग था कि 100 में से 99 बेईमान, फिर भी भारत देश महान। लेकिन ऐसा ज़रूर लगता है कि 100 में से 90 तो पशु ही हैं, बाकी 10 उनके मालिक या पालनहार हैं।

बात उसी सवाल से जोड़ कर देखिए। दरअसल किसी सड़क से गुजरते समय रास्ते में कोई पशु यदि हमारे आने जाने में बाधा पैदा करता है तो हमें बहुत गुस्‍सा आता है। लेकिन हम उसे हटाने या ऐसे मामलों की उचित स्‍तर पर शिकायत करते हुए समस्‍या के हल का प्रयास करने के बजाय उसको प्रणाम करके जैसे-तैसे निकल जाते हैं। अब उस पशु की जगह अपने आपको रखकर देखें कि आप खुद किसी रास्ते पर चलते या खड़े रहते समय लोगों के लिए बाधा उत्पन्न करते हैं, गलत तरीके से पार्किंग करते हैं, गलत तरीके से वाहन चलाते हैं, गलत तरीके से साइड लेते हैं। तो आप क्या हुए? आप भी तो उसी पशु की तरह हैं जो सड़क पर कहीं पर भी बैठा हो सकता है, चल रहा हो सकता होता है। ऐसे में आप भी तो सोचकर देखें कि इसका समाधान कौन करेगा?

हम 100 में से 90 फ़ीसदी लोग इसी प्रकार से पशु जैसा व्‍यवहार ही तो कर रहे हैं। और जो हमारे पालनहार यानी जनप्रतिनिधि या सरकार हैं वे इस समस्‍या को हल करने की दिशा में कभी सोचते तक नहीं। क्‍या क्या ये सही है?

इसके साथ ही जरा यह भी सोच कर देखिए, कि क्‍या हम उन्‍हीं जनप्रतिनिधियों को पसंद नहीं करते जो हमारी गलतियों को नजरअंदाज करते हैं। या गलती करने पर होने वाली कार्रवाई पर हमारे पक्ष में खडे हो जाते हैं। अपने मोहल्ले में, नगर में या कहीं भी होने वाले अतिक्रमण आदि पर लोग उसी प्रकार चुप्‍पी साधकर निकल जाते हैं जैसा वे आवारा पशुओं के बारे में करते हैं।

बात कडवी है लेकिन सच तो यही है कि हम भले ही आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हों पर हम लोग अच्छे नागरिक बिलकुल नहीं बन पाए। सोचने वाली बात तो ये भी है कि इसका जिम्मा जिन पर था क्या उन्होंने ठीक तरीके से देश चलाया। इसका जवाब आपके और हमारे पास ही है। हमें तय करना होगा कि क्या हम नियमों का पालन करते हुए अच्छे नागरिक कहलाना पसंद करेंगे या नियमों की अवहेलना करते हुए आवारा पशु कहलाना चाहेंगे?
(लेखक की सोशल मीडिया पोस्‍ट से साभार)
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