राकेश अचल

मेरा सौभाग्य है कि मैं पत्रकारों की उस खर्च होती पीढ़ी से हूं जिसने भारत के केंद्रीय चुनाव आयोग को शेषनाग के कंधों पर टिके हुए भी देखा है और केंचुओं की पीठ से फिसलते हुए भी देखा है। संतोष की बात ये है कि तीन दशक बाद एक बार फिर चुनाव आयोग के शेषनाग प्रासंगिक बने हुए हैं और उनकी नजीर देश की सबसे बड़ी अदालत भी दे रही है।

इन दिनों चुनाव आयोग में नियुक्तियों को लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हर सरकार अपनी हां में हां मिलाने वाले व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त नियुक्त करती है। जो बात उच्चतम न्यायालय ने कही है वो बात हम खबरनबीस न जाने कब से कहते आ रहे हैं, लेकिन हमारी सुनता कौन है?

आपको याद होगा कि चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चार साल पहले 2018 में कई याचिकाएं दायर की गई थीं। इन याचिकाओं में माँग की गई थी कि चुनाव आयुक्त (ईसी) और मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी प्रणाली अपनाई जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इन सब याचिकाओं को एक करते हुए इसे पाँच जजों की संविधान पीठ को रेफ़र कर दिया था। इसी याचिका पर इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है।

इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को लेकर सरकार के सामने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों की संविधान पीठ में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार शामिल हैं, जबकि जस्टिस केएम जोसेफ़ इस बेंच की अध्यक्षता कर रहे हैं।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने नए चुनाव आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से उनकी नियुक्ति की फ़ाइल मांगी है। अदालत ने कहा, “सुनवाई शुरू होने के तीन दिन के भीतर नियुक्ति हो गई। हम ये जानना चाहते हैं कि नियुक्ति के संदर्भ में क्या प्रक्रिया अपनाई गई है। अगर ये नियमानुसार किया गया है तो इसमें परेशान होने वाली कोई बात नहीं है।”अदालत ने कहा कि जब सुनवाई चल रही थी तब नियुक्ति न की जाती तो ज़्यादा बेहतर होता।

भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी अरुण गोयल ने सोमवार को चुनाव आयुक्त का पदभार संभाला है। इससे पहले उन्हें शनिवार को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। इस मामले में खास बात अरुण गोयल की नियुक्ति से ज्यादा मंगलवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का जिक्र करना है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश को इस समय टीएन शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त की ज़रूरत है। “ज़मीनी स्थिति ख़तरनाक है। अब तक कई सीईसी रहे हैं, मगर शेषन जैसा कोई कभी-कभार ही होता है। हमें सीईसी के पद के लिए सबसे अच्छा व्यक्ति खोजना होगा।‘’

टीएन शेषन कैबिनेट सचिव रह चुके थे और उन्हें दिसंबर 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया था। गुस्‍सा उनकी नाक पर रहता था। वे एक बार ग्वालियर आए तो उनके दौरे की तैयारियों को लेकर पूरी सरकार हलकान थी। प्रेस को हिदायत थी कि कोई उन्हें भड़काए नहीं। लेकिन शेषन बेहद सरल निकले। उन्होंने सब सवालों के ज़वाब दिए। मैंने उनसे पूछा था कि लोग उनसे डरते क्यों हैं? तो उन्होंने हंसते हुए कहा था-‘मै किसी को नहीं डराता, मैं तो सबसे निडर होकर काम करने के लिए कहता हूं।‘’

शेषन पूरे 6 साल पद पर रहे। उन्होंने चुनाव आयोग को कभी केंचुआ नहीं बनने दिया। शेषन ने चुनाव आयोग में कई ऐतिहासिक सुधार किए। उनकी निडर प्रवृत्ति का सबसे पहला उदाहरण तब मिला जब उन्होंने राजीव गाँधी की हत्या के बाद तत्कालीन सरकार से बिना पूछे लोकसभा चुनाव स्थगित करा दिए।

शेषन ने बताया था कि जब मैं कैबिनेट सचिव था तो प्रधानमंत्री ने मुझे बुला कर कहा कि मैं चुनाव आयोग को बता दूँ कि मैं फ़लाँ-फ़लाँ दिन चुनाव करवाना चाहता हूँ। मैंने उनसे कहा, हम ऐसा नहीं कर सकते। हम चुनाव आयोग को सिर्फ़ ये बता सकते हैं कि सरकार चुनाव के लिए तैयार है।”

पिछले आठ साल में केवल चुनाव आयोग ही नहीं अधिकांश संवैधानिक संस्थाओं की रीढ़ या तो तोड़ दी गई है या लचकदार बना दी गई है, ऐसे में टीएन शेषन का स्मरण राहत देता है। ईश्वर हमें अनेक टीएन शेषन उपलब्ध कराए।
(मध्यमत)
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