अजय बोकिल

‘अरब सागर का हीरा’ कहे जाने वाले शांत लक्षद्वीप में भी अब सियासी तूफान उठने लगा है। वजह है ‍वहां के प्रशासक प्रफुल्ल भाई पटेल द्वारा नए नियमों को लागू करना। विरोधी इसे लक्षद्वीप की संस्कृति में अनावश्यक सरकारी दखल और आरएसएस एजेंडे को लागू करना मानते हैं तो प्रशासक पटेल के अनुसार यह सब ‘द्वीप समूह के विकास’ के लिए किया जा रहा है। केरल विधानसभा ने तो बाकायदा सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर प्रशासक पटेल के कदमों का विरोध करते हुए केन्द्र से उन्हें वापस बुलाने की मांग की है। उधर पश्चिम बंगाल में मुख्य सचिव के तबादले को लेकर मोदी-ममता पंगा चल ही रहा है। वहां राजनीतिक खुन्नसें कम होने का नाम नहीं ले रहीं।

जिस तरह देश में केन्द्र सरकार और गैर भाजपा शासित राज्यों के बीच विभिन्न मुद्दों पर टकराव बढ़ रहा है, उससे लगता है कि इन सरकारों की दिलचस्पी कोविड संकट से जूझने से ज्यादा राजनीतिक बवाल के नए मोर्चे खोलने में है। इसका क्या अर्थ निकाला जाए, अपनी नाकामियों से ध्यान हटाना या फिर किसी भी कीमत पर अपना एजेंडा लागू करना? इसका अंजाम क्या होगा, यह सोचने की बात है। देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब एक राज्य की विधानसभा ने किसी केन्द्र शासित प्रदेश के प्रशासन में राजनीतिक हस्तक्षेप का आरोप लगाते हुए, वहां प्रशासक की वापसी की मांग का प्रस्ताव पारित किया हो। यही नहीं सभी विरोधी पार्टियों ने राष्ट्रपति को एक संयुक्त याचिका भेजकर प्रशासक प्रफुल्‍ल भाई पटेल को वापस बुलाने की मांग की है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र कर लिख कर कहा कि प्रशासक द्वारा लाए गए ‘लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण नियमन अधिनियम’ का मसौदा इस बात का सबूत है कि लक्षद्वीप की पारिस्थितिकीय शुचिता को कमतर करने का प्रयास किया जा रहा है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी इस मामले को लेकर राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी है। उधर लक्षद्वीप में मोदी सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक प्रफुल्‍ल पटेल के खिलाफ भाजपा के ही एक धड़े ने मोर्चा खोल दिया है तो दूसरा उनके समर्थन में है।

यह भी पहली बार ही है कि बाकी देश सुदूर लक्षद्वीप और वहां की राजनीति के बारे में जान रहा है कि समुद्र से घिरे इस द्वीप समूह में क्या और क्यों हो रहा है? गौरतलब है कि लक्षद्वीप देश के दक्षिण-पश्चिम में मलाबार तट के पास स्थित 36 द्वीपों का समूह है। इनमें से एक लक्षद्वीप भी है। पूरे द्वीप समूह को लक्षद्वीप नाम 1973 में दिया गया। लक्षद्वीप की राजधानी कवरत्ती द्वीप है। लक्षद्वीप देश की सबसे छोटी केन्द्र शासित प्रदेश इकाई भी है। मध्य पूर्व की दृष्टि से द्वीपों का सामरिक महत्व है। यहां हमारी नौसेना का बड़ा अड्डा भी है।

लक्षद्वीप के 96 फीसदी लोग मुसलमान हैं और वे मलयाली या धिवेही भाषा बोलते हैं। किसी जमाने में यहां बौद्ध धर्म प्रचलित था, लेकिन बाद में ज्यादातर ने सुन्नी इस्लाम अपना‍ लिया। यहां हिंदुओं की आबादी तीन फीसदी से भी कम है। इतिहास में लक्षद्वीप पर कुछ समय पुर्तगालियों का शासन भी रहा। फिर यह मुस्लिम शासकों के अधीन रहा। बाद में इस पर ‍अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया। देश की आजादी के बाद 1956 में लक्षद्वीप को केन्द्रशासित प्रदेश बना दिया गया। प्रशासनिक दृष्टि से पूरा लक्षद्वीप एक ही जिला है, जिसकी आबादी करीब 65 हजार है। नारियल और मछलीपालन यहां के मुख्य उद्योग हैं।

लक्षद्वीप सुंदर पर्यटन केन्द्र भी है। यहां केन्द्र सरकार प्रशासक की नियुक्ति करती है, जो अमूमन वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ही होते थे। लेकिन पहली बार मोदी सरकार ने लक्षद्वीप के प्रशासक की कमान ऐसे राजनेता प्रफुल्‍ल भाई खोड़ा भाई पटेल को सौंपी, जो गुजरात में उनके मंत्रिमंडल में मंत्री रहे हैं। आरएसएस से उनका पुराना नाता है। दरअसल विवाद की जड़ प्रशासक द्वारा लाए गए दो एक्ट हैं। ये हैं लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण नियमन एक्ट तथा लक्षद्वीप असामाजिक गतिविधि निरोधक एक्ट। इन कानूनों को लेकर लक्षद्वीप वासियों में कई आशंकाएं हैं। उनमें पहला तो लक्षद्वीप विकास के नाम पर उनकी कथित रूप से उनकी जमीने हड़पने और गोमांस प्रतिबंधित करने को लेकर है।

कहा जा रहा है ‍कि जब भाजपा शासित राज्य गोवा में बीफ पर रोक नहीं है तो लक्षद्वीप में गोमांस व गोहत्या विरोधी कानून क्यों लागू किया जा रहा है? दूसरे, प्रशासक पटेल ने लक्षद्वीप का समुद्री परिवहन सम्बन्ध केरल की जगह कर्नाटक से जोड़ने की पहल की है। इसका राजनीतिक एंगल यह है कि केरल में वाम मोर्चे की सरकार है तो कर्नाटक में भाजपा की। तीसरा है, द्वीप के कई अंचलों से शराब पर प्रतिबंध हटाना ताकि सभी को शराब सुलभ हो सके। बताया जाता है कि अभी इस दवीप समूह के केवल बंगरम द्वीप में ही शराब मिलती  है, लेकिन वहां कोई स्थानीय आबादी नहीं है।

चौथा, इस द्वीप समूह में आपराधिक गतिविधियां रोकने के लिए गुंडा एक्ट लागू करना है। जबकि नए कानून के मुताबिक पुलिस किसी को भी बिना कारण बताए 1 साल के लिए बंद कर सकती है। पांचवां, प्रदेश में दो बच्चों से ज्यादा वालों को पंचायत चुनाव की उम्मीदवारी से बाहर करना है। छठा, क्षेत्र के स्कूलों के मिड डे मील और होस्टल मेस में मांसाहारी व्यंजनों पर प्रतिबंध लगाना। उधर लक्षद्वीप सांसद व एनसीपी नेता मोहम्मद फैजल ने प्रशासक के कदमों का विरोध करते हुए कहा है कि नए अधिनियम के तहत वह यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि मुझे क्या खाना चाहिए और क्या नहीं? वो मेरा संवैधानिक अधिकार छीन रहे हैं।‘

हालांकि इस बारे में प्रशासक प्रफुल्‍ल पटेल का कहना है कि जो ‍कुछ भी हो रहा है, सब नियमों के मुताबिक ही है। उनके मुताबिक विरोध के स्वर लक्षद्वीप से ज्यादा केरल से उठ रहे हैं। हमने पंचायतों में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण दिया है। उस पर कोई नहीं बोल रहा है। पटेल के अनुसार हमारा मकसद द्वीप को स्मार्ट सिटी बनाना है। गुंडा एक्ट लागू करने के पीछे पटेल का कहना है कि इस क्षेत्र से ड्रग्स की तस्करी बड़े पैमाने पर हो रही है, जिसे रोकने के लिए ही यह एक्ट लाया गया है। निर्दोष लोगों को इससे डरने की जरूरत नहीं है।

लेकिन भाजपा इस मामले को लेकर दोफाड़ दिखाई देती है। पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ए.पी. अब्दुल्लाकुट्टी ने आरोप लगाया कि विपक्षी नेता प्रशासक पटेल का विरोध इसलिए कर रहे हैं,  क्योंकि उन्होंने द्वीपसमूह में नेताओं के ‘भ्रष्ट चलन’ को खत्म करने के लिए कुछ खास कदम उठाए हैं। अब्दुल्लाकुट्टी लक्षद्वीप में भाजपा के प्रभारी भी हैं। जबकि लक्षद्वीप बीजेपी के महासचिव मोहम्मद कासिम का कहना है कि यह तानाशाही है। उन्होंने इसके‍ खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी भी लिखी है। उनका कहना है कि पटेल के प्रस्तावों से स्थानीय लोगों के हाथ से नौकरियां चली जाएंगी।

यह भी कहा जा रहा है कि पटेल प्रशासन के फैसलों के विरुद्ध कई भाजपा कार्यकर्ताओं ने पार्टी छो़ड़ दी है। हालांकि लक्षद्वीप भाजपा अध्यक्ष हाजी पटेल इसे गलत बताते हैं। वो मानते हैं कि नए प्रस्तावों से लक्षद्वीप का विकास होगा। केरल के. सुरेन्द्रन भी हाजी पटेल की बात का समर्थन करते हैं।  लेकिन मामला इतना आसान नहीं है, जितना बताया जा रहा है। लक्षद्वीप के प्रशासक की कार्यशैली को  ‘सेक्युलरवाद बनाम राष्ट्रवाद’ की लड़ाई में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है। यही कारण है कि केरल राज्य ने दूसरे केन्द्रशासित प्रदेश के प्रशासक के खिलाफ प्रस्ताव पास किया।

विधानसभा में इसे पेश करते हुए मुख्यमंत्री पी. विजयन ने केरल और लक्षद्वीप के लोगों के बीच ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को याद किया और वहां ‘स्वाभाविक लोकतंत्र’ को नष्ट करने की कथित कोशिश के लिए केंद्र की निंदा की। इस प्रस्ताव का सत्तारूढ़ वाम मोर्चे के साथ कांग्रेसनीत यूडीएफ ने भी समर्थन किया। प्रस्ताव में कहा गया कि लक्षद्वीप में भगवा एजेंडा और कॉरपोरेट हितों को थोपने की कोशिश की जा रही है। इसकी शुरुआत लक्षद्वीप में नारियल वृक्षों को भगवा रंगने से हुई। यह लक्षद्वीप की संस्कृति व पहचान को नष्ट करने की कोशिश है। बता दें कि केरल विधानसभा में यह प्रस्ताव पारित करने का मुख्य कारण यह है कि लक्षद्वीप की ज्यादातर निर्भरता केरल पर ही है।

वैसे भी प्रशासक प्रफुल्‍ल पटेल विवादित शख्सियत रहे हैं। दमन दीव के निर्दलीय सांसद मोहन भाई डेलकर की आत्महत्या के सिलसिले में उनका नाम आया था। मुंबई पुलिस की एफआईआर में भी उनका नाम है। डेलकर के बेटे ने पटेल पर 25 करोड़ की वसूली के लिए धमकाने का आरोप भी लगाया था। लेकिन उसमें कोई कार्रवाई नहीं हुई, जबकि डेलकर पूर्व में भाजपा से भी सांसद रह चुके थे। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब समूचा देश कोरोना से जूझ रहा है (जिसमें लक्षद्वीप भी शामिल है, वहां अब तक कोरोना से 25 मौतें हो चुकी हैं) तब नए विवाद खड़े करने का असल मकसद क्या है? अगर लक्षद्वीप के निवासियों को विश्वास में न लेकर कोई काम किया जा रहा है तो उसका दूरगामी अंजाम क्या होगा? और इसकी हमें कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी? (मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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