अनुशान्त सिंह तोमर

रेडियो सीलोन का संगीत इन दिनों श्रीलंका के जनमानस में पहले जैसी मिठास नहीं घोल पा रहा है। श्रीलंका की सडकों पर कार्ल मार्क्स दिख रहे हैं। सडकों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। हिंसा बढ़ती जा रही है। भयंकर आर्थिक और राजनीतिक संकट से गुजर रहे एक देश के लिए यह दृश्य बहुत डरावना है। यह विरोध भूख और अधिकार का है। श्रीलंका इन दिनों महंगाई, खाने पीने की चीजों और राजनीतिक अस्थिरता के बुरे दौर से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे इस्तीफा दे चुके हैं और राष्ट्रपति गोटवाया राजपक्षे देश को सम्हालने की असफल कोशिश में जुटे हैं। देश की अर्थव्यवस्था तबाह होती जा रही है। अब तो श्रीलंका की केन्द्रीय बैंक ने भी हाथ खड़े कर दिये हैं। देश में आपातकाल लागू है।

श्रीलंका की कुल आबादी करीब सवा दो करोड है। देश की अर्थव्यवस्था में पर्यटन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा खेती-बाडी और उद्योग भी श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के जरूरी अंग हैं। साल 2019 में कोविड महामारी की दस्तक ने श्रीलंका के पर्यटन को बुरी तरह से प्रभावित किया। इससे अर्थव्यवस्था को गहरा सदमा लगा। लगभग दो साल की कोरोना महामारी की लहर ने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर आने ही नहीं दिया। उद्योग भी इस दौरान बंद रहे थे। वहां भी महामारी से अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगा। यह वह कारण हैं जिन्होंने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के लिए ऐसे हालात पैदा किये जो आज वहां बदहाली के रूप में दिख रहे हैं।

इसके अलावा एक कारण और है जिसने श्रीलंका के लिए मौजूदा संकट तय करने में अहम भूमिका निभाई। पिछले दिनों श्रीलंका की राजपक्षे सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे भार को कम करने के लिए जैविक खेती का निर्णय लिया। खेती में रासायनिक खाद के उपयोग पर रोक लगा दी गई हालांकि बाद में इस फैसले को वापस ले लिया गया परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सरकार के इस निर्णय ने फसलों के उत्पादन को बुरी तरह से प्रभावित किया और उनमें जबरदस्त कमी आई। पहले से चले आ रहे आर्थिक संकट के साथ खाने-पीने का संकट भी श्रीलंका में हो गया। वहां खाने पीने की वस्तुएं कम हो रही है जिससे महंगाई आसमान छू रही है।

महंगाई और खाने-पीने की चीजों की कमी के विरोध में जनता सडक पर उतर आई है। इसी के चलते श्रीलंका में कैबिनेट भंग हो गई। सरकार के मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया। राजपक्षे परिवार के पैतृक घर को बीते दिनों जनता ने जला दिया। श्रीलंका में इन दिनों वैसे ही दृश्य सामने आ रहे हैं जो फ्रांस की क्रान्ति के दौरान सामने आये थे। आक्रोशित भीड़ फ्रांस की जेलों में घुस गई थी और चारों तरफ राख के ढ़ेर थे।

श्रीलंका के इन हालात के लिए चीन के बढ़ते कर्ज को भी कारण माना जा रहा है। एशियन डेवलपमेंट बैंक और जापान से भी श्रीलंका ने कर्जा लिया है। विदेशी कर्ज के साथ साथ राजपक्षे सरकार की कुछ योजनाओं ने भी अर्थव्यवस्था का दिवालिया निकाल दिया। हम्बनतोता बंदरगाह, क्रिकेट स्टेडियम और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं ने अर्थव्यवस्था पर भार और विदेशी कर्ज को कम नहीं होने दिया।

श्रीलंका के मौजूदा आर्थिक संकट को वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शशिभूषण राजनीति के नजरिये से देखते हैं। वे कहते हैं कि मौजूदा हालात चार परिवारों के खानों में बंटी श्रीलंका की सत्ता को परिवारवाद की बुरी नजर लगने का नतीजा हैं। समय समय पर बड़े बड़े और महत्वपूर्ण पदों पर सरकार में रहने वाले व्यक्तियों ने अपने परिवार के लोगों को बिठाया। चाहे वो वित्त मंत्रालय हो या देश की सैन्य शक्ति को नियंत्रित करने वाले पद। इस तरह से धीरे धीरे परिवारवाद श्रीलंका की सत्ता  में पनपता रहा और अंदर ही अंदर देश की अर्थव्यवस्था को खोखला करता रहा।

श्रीलंका भारत का पडोसी देश है। इस संकट के समय में भारत भले ही श्रीलंका के साथ खड़ा हो परन्तु श्रीलंका का संकट भारत को चेताता है। यह बात अलग है कि श्रीलंका ने दशकों से चले आ रहे गृहयुद्ध को शान्त कर लिया हो परन्तु राजनीति में धर्म की मिलावट ने साम्प्रदायिकता के जहर को बढाया ही है। श्रीलंका का यह संकट समूचे एशियाई देशों और दुनिया के तमाम विकासशील देशों के लिए एक उदाहरण है। वे श्रीलंका के संकट से यह सीख ले सकते हैं कि अधिक विदेशी कर्ज से देश में खुशहाली नहीं आती और गैरउपयोगी योजनाओं के हर पहलू को बारीकी से जाने बिना देश में लागू नहीं किया जाना चाहिये। भारत के लगभग सभी पड़ोसी जिनमें पाकिस्तान, नेपाल और भूटान शामिल हैं विदेशी कर्ज और महंगाई की मार से कराह रहे हैं और उस दरवाजे तक जा पहुंचे हैं जहां आज श्रीलंका खड़ा है। भारत में भी महंगाई आसमान छू रही है। श्रीलंका के संकट को देखते हुए जल्द से जल्द इस दिशा में सरकार को कदम उठाने की जरूरत है।
(मध्यमत)
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