राकेश अचल

नींद और जागरण एक दूसरे की विलोम क्रियाएं हैं। थका हुआ व्यक्ति हो या देवता या असुर सब नींद चाहते हैं। नींद का आव्हान करते हैं। दवाएं खाते हैं, तब कहीं सो पाते हैं। लेकिन नींद के बाद जागरण हर एक की अभिलाषा होती है, क्योंकि नींद निष्क्रियता का प्रतीक है, और कोई ताउम्र निष्क्रिय नहीं रहना चाहता।

भारत में देवता एक जीवित संज्ञा है। देवता सर्वशक्तिमान होता है। देवता का सोना, जागना महत्वपूर्ण होता है। उत्सवों का कारण होता है। वे सोयें या जागें मनुष्य खुश होते हैं। देवताओं को सुलाने के लिए हम देवशयनी एकादशी मनाते हैं और जागरण को देवोत्थान एकादशी। देवता यदि सोयें नहीं तो बारहों महीने इनसान को काम से फुर्सत ही न मिले।

हमारी मान्यताओं में भगवान विष्णु चार महीने क्षीरसागर में शयन करते हैं। इन चार महीनों में हमारे यहां कोई शुभ कार्य नहीं होते। मौसम भी माकूल नहीं होता। इस तरह भगवान ही इनसान की मदद करते हैं। भगवान के बिना इनसान का कोई काम पूरा नहीं होता। इनसान होता ही भगवान के भरोसे है।

हमारी मान्यताओं में तो लंबी नींद लेने वाले कुंभकर्ण जैसे असुर भी हुए हैं। बहरहाल बात नींद और जागरण की है। नींद के बाद जागरण न हो तो जिंदगी अंधेरे में डूबकर रह जाए। सुर और असुर तो जागें या सोयें उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं, लेकिन यदि इनसान नींद के बाद जागे तो उसका नुकसान हो जाता है। इनसान के लिए जागरण अनिवार्य है।

जागरण ही जीवन है और जीवन ही जागरण। दुनिया की तमाम व्यवस्थाएं इनसान के जागरण से जुड़ी हैं। लोकतंत्र भी इनमें से एक है। लोकतंत्र तभी कामयाब होता है जब अवाम जागरूक हो। अवाम का नींद में होने से ज्यादा नीम बेहोशी में होना खतरनाक होता है। जब अवाम सोता है तो दूसरी ताकतें सिर उठाती हैं। देव जागरण ही लोक जागरण है। जिस तरह हम अपने देवताओं को गा -बजाकर जगाते हैं, उसी तरह हमें अपने आपको जाग्रत करना चाहिए।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु 4 महीने के बाद योग निद्रा से जागते हैं। जिसके बाद से सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ-साथ व्रत कथा का पाठ भी किया जाता हैं। देवउठनी एकादशी की कथा के बारे में हमें हमारी दादी जो कहानी सुनातीं थीं, आप भी सुनिए।

एक राजा के राज्य में सभी लोग श्रद्धापूर्वक एकादशी का व्रत रखते थे। प्रजा और राज्य के नौकरों से लेकर पशुओं तक को एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था। कहते हैं कि इस दिन किसी दूसरे राज्य का व्यक्ति राजा से बोला कि महाराज! कृपा करके मुझे नौकरी पर रख लें। तब राजा ने उसके सामने एक शर्त रखी कि रोज तो तुम्हें खाने को सब कुछ मिलेगा, लेकिन एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करने के लिए नहीं मिलेगा।

राजा के कहने के मुताबिक वह व्यक्ति राजी हो गया। लेकिन एकादशी के दिन जब उसे फलाहार मिला तो वह राजा के सामने जाकर कहने लगा महाराज! इससे मेरा पेट नहीं भरेगा। मैं भूखा ही मर जाऊंगा, मुझे अन्न दिया जाए। राजा ने उसे शर्त की बात याद दिलाई। लेकिन वह व्यक्ति अन्न त्याग करने के लिए तैयार नहीं हुआ। जिसके बाद राजा ने उसके लिए अन्न की व्यवस्था कर दी। वह रोज की तरह नदी पर पहुंचा और स्नान करके भोजन पकाने लगा। जब भोजन बन गया तो वह भगवान को बुलाने लगा। आओ भगवान! भोजन तैयार है।

कहा जाता है कि उसके बुलाने पर पीतांबर धारण किए भगवान चतुर्भुज रूप में आ पहुंचे और प्रेम से उसके साथ भोजन ग्रहण करने लगे। भोजन करने के बाद भगवान अंतर्धान हो गए। जिसके बाद वह व्यक्ति भी अपने काम पर चला गया। फिर पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि महाराज, मुझे दोगुना सामान दीजिए। उस दिन भूखा ही रह गया था। राजा के पूछने पर उसने बताया कि उसके साथ भगवान भी भोजन ग्रहण करते हैं। यह सुनकर राजा को थोड़ा अटपटा लगा और उन्‍हें उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ।

राजा की बात सुनकर वह बोला- महाराज! यदि विश्वास न हो तो साथ चलकर देख लें। राजा एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया। उस व्यक्ति ने भोजन बनाया भगवान को शाम तक पुकारता रहा, लेकिन भगवान नहीं आए। अंत में उसने कहा कि हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूंगा।

इसके बाद भी भगवान नहीं आए। तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा। उसका दृढ़ इरादा जान शीघ्र ही भगवान ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और साथ बैठकर भोजन करने लगे। भोजन के बाद भगवान अपने गंतव्य को चले गए। यह देख राजा ने सोचा कि व्रत-उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो। इससे राजा को ज्ञान मिला। वह भी मन से व्रत-उपवास करने लगा और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुआ।

ऐसी कहानियां कब से लोग सुन रहे हैं, पता नहीं, लेकिन इन कहानियों ने इनसान को जागरण से जोड़ रखा है। दुनिया के दूसरे देशों और धर्मों में भी ऐसी दंतकथाएं हैं।
(मध्यमत)
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