राकेश अचल

आने वाले दिनों में भारत के लिए ‘वेरिएंट आफ कंसर्न’ कोविड यानि कोरोना ही होगा या कश्मीर, ये कहना कठिन है। कोरोना के नए वेरिएंट डेल्टा प्‍लस को लेकर तो केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग ने सभी राज्यों को आगाह कर दिया है, लेकिन कश्मीर में चुनावों को लेकर अभी तक सरकार ‘मटकी में गुड़ फोड़’ रही है। किसी को नहीं पता कि सरकार का असली ‘गेम’ क्या है? कश्मीर के विखंडन और वहां से अनुच्छेद 370 की समाप्ति को दो साल होने वाले हैं।

केंद्र सरकार की हिम्मत की दाद देना होगी क्योंकि एक तरफ सरकार कोरोना के नए वेरिएंट से निपटने की तैयारी कर रही है और दूसरी तरफ कश्मीर में चुनाव को लेकर भी उसने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। कश्मीर को तोड़कर वहां विधानसभा के चुनावों से पहले नए सिरे से परिसीमन कराया जाना है। परिसीमन के नए फार्मूले, जाहिर है कि केंद्र सरकार के अपने होंगे, इन्हें लेकर कश्मीरी राजनीतिक दल क्या रुख अख्तियार करेंगे, किसी को नहीं पता।

पिछले सात साल से लगातार अपनी ढपली बजाकर अपना राग निकालने वाली केंद्र सरकार ने दो साल पहले कश्मीर को तोड़ने के बाद जिन राजनीतिक दलों के नेताओं को जन सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए नजरबंद कर दिया था, जिन्हें देशद्रोही तक कह दिया था उन सबसे वार्ता भी शुरू कर दी है। यानि दो साल में केंद्र को लगने लगा है कि लम्बी नजरबंदी के बाद कश्मीरी नेताओं की हेकड़ी निकल गयी है और वे अब देश के लिए खतरा नहीं रह गए हैं,  इसलिए उन्हें अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है।

केंद्र के इस विश्वास की कोई न कोई वजह जरूर होगी, केंद्र ने कश्मीर में अपने एक अनुभवी पूर्व केंद्रीय मंत्री को राज्यपाल बनाकर बैठाया हुआ है। मनोज सिन्हा नाम के ये सज्जन बीते दिनों में इस टूटे हुए केंद्र शासित प्रदेश में भाजपा के लिए अनुकूल माहौल बनाने में कामयाब हुए हैं, ऐसा माना जा सकता है। केंद्र में कोई भी सरकार रही हो अपने मिशन इन्हीं राज्यपालों/उप राज्यपालों के जरिये पूरे कराती हैं। कभी उन्हें कामयाबी मिलती है और कभी नहीं। जैसा कि हाल में बंगाल विधानसभा चुनावों में हुआ। वहां केंद्र के प्रतिनिधि राज्यपाल  धनकड़ साहब ‘फुल टाइम’ भाजपा कार्यकर्ता बनने के बाद भी भाजपा को सत्ता नहीं दिला पाए।

मेरा अपना अनुभव है कि यदि केंद्र कश्मीर का विखंडन न करता तो वहां भी उसे मुंह की खाना पड़ती। कारण साफ़ है कि जैसे बंगाल में माटी और मानुष का मुद्दा गूंजा, वैसा ही कुछ कश्मीर में होता,  क्योंकि कश्मीरियत अभी भी ज़िंदा है। कश्मीरियत एक भाव है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। पिछले सात दशकों में कश्मीर के साथ पूर्व की सरकारों का क्या रवैया रहा इसे बताने की जरूरत नहीं है,  दुनिया सब जानती है। जानने की चीज ये है कि क्या अब टूटा हुआ कश्मीर अपनी कश्मीरियत को भूलकर बिना बन्दूक और बारूद के राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए राजी हो गया है।

कश्मीरियत के मुद्दे से अकेले जम्मू पर थोड़ा असर पड़ता था, लेह-लद्दाख पर नहीं,  लेकिन अब तीनों अलग-अलग हैं। कायदे से अब इन तीनों केंद्र शासित क्षेत्रों का चतुर्दिक विकास होना चाहिए। बीते दो साल में इन इलाकों का कितना विकास हुआ,  कोई नहीं जानता क्योंकि अभी भी वहां जन जीवन वैसा नहीं है जैसा दूसरे केंद्र शासित राज्यों में हैं। कश्मीर का पर्यटन अभी भी लंगड़ी अवस्था में है।  वहां के शिकारे अभी तक डल झील को खुश करने की स्थिति में नहीं हैं। विखंडित कश्मीर में एक भी निर्वासित कश्मीरी पंडित वापस नहीं लौट पाया है, यहां तक की अनुपम खेर भी नहीं। इससे जाहिर है कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के दो साल बाद भी तस्वीर में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है।

सवाल ये है कि क्या कश्मीरी अपना राज्य का दर्जा गंवाकर केंद्र शासित दिल्ली की तरह भारत के साथ रहना पसंद करेंगे या फिर जैसा केंद्र सरकार ने सोच रखा है वैसा करेंगे। कश्मीरी नेताओं की भावी रणनीति भी कोरोना के डेल्टा वेरिएंट जैसी है। किसी को पता नहीं है कि कश्मीरियत का नया चेहरा कैसा होगा? कश्मीर का दुर्भाग्य है कि उसका वजूद लगातार टूट रहा है। पहले देश विभाजन के समय टूटा,  आधा पाक अधिकृत कश्मीर है और आधा भारत के पास। भारत बनने के बाद जो कश्मीर था उसकी हैसियत दूसरे राज्यों से हटकर थी, लेकिन सत्तर साल बाद ये ख़ास कश्मीर अब न राज्य न रहा और न इसकी विशेषता बाक़ी रही। शायद इसी को ‘डेस्टिनी’ कहते हैं।

सात साला मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक कश्मीर का विखंडन है। कांग्रेस पर आरोप था कि उसने कश्मीर मुद्दे को अपने स्वार्थों के लिए उलझाए रखा,  लेकिन भाजपा ने क्या किया? भाजपा ने अपने स्वार्थ के लिए किसी ख़ास राज्य को समृद्धि देने के बजाय उसका अंग-भंग ही कर दिखाया। सृजन और विखंडन दो परस्पर विरोधी प्रक्रियाएं हैं। हितोपदेश की एक कहानी है कि- जब दो बिल्लियों के बीच रोटी का बँटवारा नहीं हो पा रहा था तो वे एक चतुर बंदर के पास न्याय की उम्मीद से पहुंचीं। बंदर ने न्याय करते-करते पूरी रोटी खुद हजम कर ली। कश्मीर के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ।

कश्मीर के साथ जो हुआ उसे राष्ट्रहित का नाम दिया गया है,  इसलिए कोई कुछ नहीं बोला। बोलने वाले गुपकार बनकर सामने आये हैं। ये भी भाजपा से कम नहीं। ये गुपकार सत्ता का सुख हासिल करने के लिए कभी कांग्रेस के साथ गलबहियां करते हैं तो कभी भाजपा के साथ। इनका कश्मीरियत से कुछ लेना-देना नहीं है। डॉ. फारूक अब्दुल्ला हों या मेहबूबा मुफ्ती सबको सत्ता में अपना हिस्सा चाहिए। मेरा पूरा यकीन है कि जब भी विखंडित कश्मीर में चुनाव होंगे सबसे पहले इन दोनों में से एक न एक भाजपा के साथ खड़ा नजर आएगा,  क्योंकि अभी कांग्रेस के पास इन सत्तालोलुपों को देने के लिए कुछ है नहीं।

आने वाले दिन देश के स्वास्थ्य के लिए सचमुच बहुत भारी हैं। देश एक तरफ कोरोना के नए वेरिएंट से जूझेगा और दूसरी तरफ सियासी वेरिएंट अपना असर दिखाएगा। महामारी से जूझते देश में मन की राजनीति करना बेहद आसान काम होगा। इसलिए सरकार को अपनी और अवाम को अपनी तैयारी करना चाहिए,  कोई किसी की मदद करने वाला नहीं है। जो एक लाख स्वयंसेवक हाल ही में कोरोना के नए वेरिएंट से निपटने के लिए तैयार किये गए हैं वे सबके सब मौक़ा पड़ने पर कश्मीर जीतने में लगा दिए जायेंगे। आपको अपनी जान खुद बचाना पड़ेगी। उस समय मैं भी आपके साथ कहीं न कहीं खड़ा नजर आऊंगा।(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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