राकेश दुबे

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि भारत में विनिर्माण कंपनियां एक दशक से अपनी क्षमता का तीन-चौथाई से कम उपयोग कर रही हैं। ऐसे में, निजी क्षेत्र में कम नौकरियों का सृजन हो रहा है, इसीलिए बेरोजगारी है।यहाँ एक बड़ा सवाल पैदा होता है, कि सरकारी नौकरियों के प्रति इतना आकर्षण क्यों है? जवाब में हकीकत सामने आती है कि निचले और मध्यम स्तर की सरकारी नौकरियां अधिकांश निजी नौकरियों की तुलना में बहुत बेहतर कमाई का जरिया होती हैं।

सातवें वेतन आयोग ने 2015 में अहमदाबाद स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान को इस मुद्दे का अध्ययन करने के लिए कहा था। संस्थान की रिपोर्ट में एक अध्ययन के हवाले से कहा गया था कि एक सामान्य हेल्पर, जो सरकार में सबसे निचली रैंक वाला कर्मचारी होता है, का कुल वेतन-भत्ता 22579 रुपये है, जो निजी क्षेत्र के उपक्रमों के एक सामान्य हेल्पर के वेतन और अन्य लाभ से दोगुना है। निजी क्षेत्र में इसी रैंक के हेल्पर को 8000 से 9500 रुपये तक मिलते हैं।

साफ बात है कि यह परिदृश्य नहीं बदल रहा है। इसके अलावा, एक सरकारी नौकरी, पक्की नौकरी की सुरक्षा के साथ मिलती है। यह मुद्दा महामारी के बाद की दुनिया में और भी महत्वपूर्ण हो गया है। इससे पता चलता है कि क्यों नियमित रूप से निम्न स्तर की सरकारी नौकरियों के लिए भी हम इंजीनियरों, पीएचडी और एमबीए धारकों को आवेदन करते देखते हैं।

दिलचस्प बात है कि सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी, निजी क्षेत्र के औसत वेतन से दोगुने से अधिक कमाते हैं और इसमें उदार स्वास्थ्य सुविधा तथा पेंशन लाभों की गिनती नहीं हो रही है। यह लोगों की धारणा को उस ओर ले जाता है, जहां सरकारी क्षेत्र की नौकरियां निजी क्षेत्र की नौकरियों की तुलना में बहुत अधिक मूल्यवान लगने लगती हैं। लगभग हर किसी को इनका इंतजार रहता है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी द्वारा प्रकाशित बेरोजगारी के आंकड़ों में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सितंबर 2022 में 20-24 वर्ष की आयु वर्ग के लिए बेरोजगारी दर 41.9 प्रतिशत थी। 25-29 वर्ष के आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 9.8 प्रतिशत थी। इसके अलावा, बेरोजगारी लगभग न के बराबर थी। यह हमें क्या बताता है? यह बताता है कि जैसे ही किसी व्यक्ति की उम्र 30  वर्ष होती है, बेरोजगारी एक घटना के रूप में लगभग लुप्त हो जाती है।

इस समय तक उम्र बढ़ जाती है और कई युवा ज्यादातर सरकारी नौकरियों के अयोग्य हो जाते हैं या परीक्षा देने के लिए जितने मौके मिलते हैं, वो समाप्त हो जाते हैं। यह स्थिति उन्हें निजी क्षेत्र में अनौपचारिक नौकरी करने या वैकल्पिक रूप से स्वरोजगार के लिए मजबूर करती है और इससे भारतीयों के लिए बेरोजगारी दर घट जाती है।

एक समाधान सामने आया है कि सरकारी नौकरियों में वेतन की कटौती की जाए और सरकारी वेतन को असंगठित निजी क्षेत्र के अनुरूप लाया जाए, लेकिन यह व्यावहारिक नहीं है। विशेषज्ञ बताते हैं, ‘कई विकासशील देशों के श्रम बाजारों में यह द्वंद्व विशेषता है, बिना किसी सुरक्षा के एक बड़ा असंगठित क्षेत्र है, जिसमें कई लोग बेहतर विकल्पों की कमी के चलते स्व-रोजगार करने लगते हैं, या संगठित क्षेत्र में नौकरी मिलने का इंतजार ही करते रहते हैं। संगठित क्षेत्र में कर्मचारियों से न केवल लाड़-प्यार किया जाता है, बल्कि उन्हें दृढ़ता से संरक्षित भी किया जाता है।’

इसके कई दुष्परिणाम हैं। अव्वल तो कई युवा एक सरकारी नौकरी का पीछा किए बिना अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे वर्ष बिताते हैं। दूसरा, निष्क्रिय युवा सामाजिक स्थिरता के लिए हानिकारक हैं। तीसरा, सरकारी नौकरी के प्रति अत्यधिक मोह की यह प्रवृत्ति अर्थव्यवस्था में समग्र निजी खपत को नुकसान पहुंचाती है।

एक पुस्तक ‘द एंड ऑफ द वर्ल्ड इज जस्ट द बिगिनिंग : मैपिंग द कोलैप्स ऑफ ग्लोबलाइजेशन’ में पीटर जीहान लिखते हैं, ‘’एक व्यक्ति अपना अधिकांश खर्च 15 और 45 की उम्र के बीच करता है, यही जीवन की खिड़की है, जब लोग वाहन खरीद रहे होते हैं, घर खरीद रहे होते हैं। इस तरह की खपत वाली गतिविधि ही अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाती है।‘’

अत: 30 वर्ष की आयु तक पहुंचने तक कई युवा जब बेरोजगार रहते हैं, तो अर्थव्यवस्था को वैसी गतिशीलता या तेजी नहीं मिल पाती है, जैसी मिलनी चाहिए। कम खपत का तात्पर्य भारतीय अर्थव्यवस्था में वस्तुओं व सेवाओं की कम मांग से है। इसका मतलब है कि क्या व्यवसायों को अपनी क्षमता का विस्तार करने की जरूरत नहीं है? इसीलिए बेरोजगारी है।