अजय बोकिल

जापान की राजधानी तोक्यो में आज से शुरू हो रहे 32 वें समर ओलिंपिक का ध्येय वाक्य वही है, पांच महाद्वीपों के गलबहियां डाले रिंगों वाला सफेद ध्वज वही है, मेडल जीतने के वैसे ही अदम्य अरमान हैं, लेकिन नहीं है तो बस वो माहौल, जिससे हर खिलाड़ी अतिरिक्त ऊर्जा हासिल करता है। यूं तोक्यो के खेल गांव में 206 देशों के 11 हजार से अधिक खिलाडि़यों ने डेरा डाल दिया है, लेकिन वो थ्रिल, गहमागहमी और रोमांच नहीं है, जो हर ओलिंपिक आयोजन के दो हफ्तों में होता है। पूरी दुनिया खेलों की दीवानी हुई जाती है। खिलाडि़यों द्वारा जीते गए हर पदक में राष्ट्र गौरव ठाठें मारता है। हर पल ओलिंपिक के ध्येय वाक्य ‘और तेज, और ऊंचा, और शक्तिशाली’ का भाव साकार होता दिखता है।

लेकिन इस बार ‘चढ़ते सूरज के देश’ जापान में चौरतफा कोविड की आशंकाएं है तो इस वैश्विक जिम्मेदारी को पूरा करने की जिद भी है। जापान ही क्यों, पूरी दुनिया में इस ओलिंपिक को लेकर वैसा जुनून नहीं है, जो हमें हर ओलिंपिक के मौके पर महसूस होता है, जब सारा जहां मेडलों के हिसाब में ड़ूब जाता है। खेल की हर पायदान आशा और निराशा में सराबोर दिखती है। खिलाड़ी अपना सर्वश्रेष्ठ दांव पर लगा रहे होते हैं और हर देश अपने गौरव को खिलाडि़यों की उपलब्धियों के आईने में निहार रहा होता है। किसी भी खिलाड़ी की ओलिंपिक में हिस्सेदारी गंगास्नान की तरह है। कुछ समय के लिए लगता है मानो खेल ही दुनिया है और दुनिया ही खेल है।

हर चार साल में होने वाले ओलिंपिक के महाआयोजन को लेकर जापान में पिछले साल जबर्दस्त उत्साह था। लेकिन कोविड ने सब पर पानी फेर दिया। बीती सदी में इसके पहले प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण तीन ओलिंपिक रद्द करने पड़े थे। यह मानकर कि कोविड महामारी साल भर बाद चल देगी, तोक्यो ओलिंपिक को एक साल के लिए स्थगित किया गया। ऐसा भी ओलिंपिक के इतिहास में पहली बार हुआ। कोरोना महामारी के आगे जब पूरी दुनिया ही बेबस थी तो जापान और ओलिंपिक का आयोजन करने वाली अंतराष्ट्रीय ओलिंपिक कमेटी भी लाचार थी।

इसके पूर्व तोक्यो में 1964 में पहली बार ओलिंपिक खेल आयोजित हुए थे। तब जापान द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका से उबर कर नवनिर्माण में जुटा था। भारत के लिए वो ओलिंपिक इसलिए भी यादगार है कि उसमें हमने पुरुष हॉकी के फायनल में पुराने प्रतिद्वंदी पाकिस्तान को हराकर गोल्ड मेडल जीता था। इसके बाद भारतीय हॉकी टीम आखिरी बार 1980 के मास्को ओलिंपिक में ही स्वर्ण पदक जीत पाई, लेकिन उसमें भी दुनिया की कई नामी हॉकी टीमें नदारद थीं। वो अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध का आखिरी दौर था।

आज 57 साल बाद जापान के लिए फिर से ओलिंपिक खेलों का आयोजन करना कई दृष्टि से महत्वपूर्ण था। एक तो खेलों में अपनी ताकत‍ दिखाना, दूसरे सुनामी और फुकुशिमा न्यू्क्लीयर हादसे से जूझने के बाद जापान की अर्थव्यवस्था को नई स्फूर्ति प्रदान करना। अगर ये ओलिंपिक तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक पिछले साल ही हुए होते तो आर्थिक महाशक्ति के रूप में जापान की प्रतिष्ठा और बढ़ती, उसकी अर्थव्यवस्था को बूस्टर डोज मिलता। लेकिन कोविड ने सब उलट-पलट कर दिया। यानी यह महाआयोजन हो तो रहा है, लेकिन कुछ बेमन से। कुछ बेमजा-सा और सहमा सहमा-सा।

इस ओलिंपिक का उद्घाटन समारोह भी रस्म अदायगी की तरह होगा। खानापूर्ति के लिए हर देश के चंद खिलाड़ी और खेल पदाधिकारी ही शामिल होंगे। न उफनता शोर होगा, न उमंगों का जोर होगा। यूं कहने को खेल के इवेंट होंगे, जीत के दांव लगेंगे, स्टेडियम में विजेताओं के राष्ट्रध्वज लहराए जाएंगे, स्वर्ण पदक जीतने वालों के राष्ट्रगान भी गूंजेंगे, लेकिन उसे देखने वाले चुनिंदा ही होंगे। हालत यह है कि कोविड के कारण 6 लाख से ज्यादा विदेशी दर्शकों के टिकट कैंसिल किए जा चुके हैं। क्योंकि जापान में 8 जुलाई को आपातकाल घोषित हो चुका है। 10 हजार देशी दर्शक भी हिचकते हुए ही स्टेडियम में बैठे दिखेंगे। अपने देश के खिलाडि़यों को चीयर अप करने का पहले जैसा नजारा शायद ही दिखे। कोविड की लहरें यूं ही आती रहीं तो तय मानिए कि खेलों और खिलाडि़यों के लिए भी यही ‘न्यू नॉर्मल’ होगा।

तोक्यो ओलिंपिक इसलिए भी दूसरे ओलिंपिकों से अलग है, क्योंकि इसका बजट कई गुना बढ़ गया है तो खिलाडि़यों की संख्या और कई आयोजन घट गए हैं। बताया जाता है कि खेल के इस महाआयोजन पर करीब 15.4 अरब डॉलर खर्च होंगे। कुछ लोगों का तो अनुमान है कि यह खर्च 20 अरब डॉलर से भी ऊपर जा सकता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ओलिंपिक खेल और खेल भावना के साथ साथ बाजार भावना से भी संचालित होते हैं। इसके विपरीत कई प्रायोजकों ने फीके आयोजन के चलते अपने हाथ खींच लिए हैं। होटल, रेस्त्रां, मनोरंजन व पर्यटन उद्योग को 1.3 अरब डॉलर का नुकसान पहले ही हो चुका है। ऐसे मौकों पर जब होटलों में जगह मिलना बेहद मुश्किल होता है, ज्यादातर होटल खाली पड़े हैं। क्योंकि ग्राहक ही नहीं हैं।

चूं‍कि खेल जापान में हो रहे हैं, इसलिए कुछ अलग तो होना ही है। पहला है इन खेलो में रिसाइकल्ड टैक्‍नॉलॉजी का उपयोग। तोक्यो ओलिंपिक में अब 33 खेलों के 339 इवेंट्स में 11 हजार से अधिक‍ ‍खिलाड़ी मेडल जीतने के लिए अपनी खेल प्रतिभा को दांव पर लगाएंगे। अगर यही खेल पिछले साल हो जाते तो खिलाडि़यों की संख्या 18 हजार से अधिक होती। खास बात यह है कि विजेताओं दिए जाने वाले 15 हजार (स्वर्ण, रजत व कांस्य) पदकों को रिसाइकल्ड इलेक्ट्रानिक्स तकनीक से बनाया गया है। इसके लिए सामग्री पूरे जापान से इकट्ठा की गई है।

इस बार विजेता खिलाडि़यों को मेडल गले में पहनाने की जगह ट्रे में रखकर पेश किए जाएंगे ताकि शारीरिक संपर्क को यथासंभव टाला जा सके। इसी सोशल डिस्टेसिंग को ध्यान में रखते हुए खिलाडि़यों को पहली बार ‘एंटी सेक्स’ बिस्तर मुहैया कराए जा रहे हैं ताकि खिलाड़ी शारीरिक स्पर्श से दूर रहें। ये बेड भी रिसाइकल्ड तकनीक से बने हैं। हालांकि इनको लेकर काफी मजाक भी बन रहा है। तमाम सावधानियों के बाद भी सबसे बड़ा डर कोविड का ही है। अभी तक खेल गांव में 87 खिलाड़ी कोरोना पॉजिटिव मिल चुके हैं। खुद तोक्यो शहर में गुरुवार को 1979 नए कोविड पॉजिटिव केस मिले हैं।

वैक्सीनेशन के मामले में जापान की स्थिति हमसे बेहतर नहीं है। इतने बड़े आयोजन के बाद भी देश में अभी तक कुल 22 फीसदी आबादी का ही पूर्ण टीकाकरण हो पाया है। जबकि 35 फीसदी लोगों को पहला डोज लगा है। अलबत्ता खेल पदाधिकारियों का 80 फीसदी टीकाकरण हुआ बताया जाता है। लिहाजा सरकार चिंतित है, आयोजन समिति परेशान है। कई जापानी इन खेलों के आयोजन को ही रद्द करने की मांग कर रहे हैं। हालांकि अब यह असंभव है, क्योंकि बारात द्वार तक आ गई है।

यह ओलिंपिक आयोजन पूर्व विवादों के लिए भी जाना जाएगा। जापानी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक ओलिंपिक की शुरुआत के एक दिन पहले एक विवादास्पद मामले को लेकर ओलिंपिक खेल उद्घाटन समारोह के निर्देशक केनतारो कोबायाशी को ही पद से हटा दिया गया है। पिछले हफ्ते उद्घाटन समारोह के संगीतकार कीएगो ओयामादा ने भी किसी विवाद के चलते पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके भी पूर्व तोक्यो ओलिंपिक अधिकारी योशिरो मोरी ने भी एक सेक्सिस्ट कमेंट के बाद पद से त्यागपत्र दे दिया था। कई लोगों का मानना है कि तोक्यो ओलिंपिक शायद दुनिया का आखिरी सबसे खर्चीला ओलिंपिक आयोजन होगा। क्योंकि कोविड महामारी से आयोजक शहरों को आर्थिक लाभ के बजाए घाटा ही ज्यादा होगा।

बावजूद इन तमाम निराशाजनक बातों के ओलिंपिक में भाग लेने वाले खिलाडि़यों के उत्साह और पदक जीतने की अदम्य आकांक्षा में कहीं कोई कमी नहीं है। वो बिना बैंड-बाजा-बारात के भी शादी रचाने के लिए तैयार हैं। खिलाड़ी स्टेडियम में न तो दर्शकों की भीड़ न होने का गम पाल रहे हैं न ही कोविड का शिकार होने से घबरा रहे हैं, उन्हें शादी के मंडप में शहनाई नहीं गूंज पाने का मलाल भी नहीं है। उनका सारा ध्यान अर्जुन की आंख की तरह मेडल पर है, अपने श्रेष्ठतम प्रदर्शन पर है। वैसे भी खेलों का इतिहास पदक जीतने से लिखा जाता है, दर्शकों की चीयरिंग से नहीं।

खिलाडि़यों का ध्यान अपने-अपने देश की शुभकामनाओं को जीत में बदलने पर है। भारत का तो इस बार अब तक का सबसे बड़ा यानी 127 खिलाडि़यों का दल गया है, जो 18 खेलों में अपना दम दिखाएगा। हमे तीरंदाजी, बेडमिंटन, शूटिंग, बॉक्सिंग, कुश्ती, दौड़ कूद में भी कुछ मेडलों की आस है। सब कुछ ठीक रहा तो भारत ओलिंपिक में अपनी मेडल संख्या दहाई तक ले जा सकता है। करोड़ों भारतीयों की शुभकामनाएं इन खिलाडि़यों के साथ हैं।

बहरहाल, कोविड महामारी ने हमें साल भर में इतना तो सिखा ही दिया है कि लाख आशंकाओं के बाद भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना है। जीतने की आस नहीं छोड़नी है। फीके मंडप में अरमानों की अठखेलियां कम नहीं होने देनी है। तोक्यो ओलिंपिक मानो इसी जज्बे पर मुहर लगा रहा है।(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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