राकेश अचल

नया साल भी दूसरे तीज-त्यौहरों की ही तरह बाजार की मुठ्ठी में है। नया साल जश्न से ज्यादा गये साल की सफलताओं, असफलताओं की समीक्षा और नये साल के लक्ष्यों और उनकी पूर्ति की शुभेच्छाओं का संधिकाल है। जो अंक गणना के साथ शुरू होता है।

जब तक मनुष्य ने समय को गणित के हिसाब से महीने, पखवाड़े, सप्ताह, दिन, पहर और पल, क्षण में विभक्त नहीं किया था तब तक न कुछ नया था और न पुराना। आगत, विगत तो मनुष्य के विकास और चिंतन की अवधारणा है। तकलीफ़ ये है कि इस अवधारणा में भी तेजी से बदलाव हो रहा है। इक्कीसवीं सदी में तो ये परिवर्तन इतनी तेज गति से हो रहा है कि इससे तालमेल बैठाना भी असंभव सा लगने लगा है।

विज्ञान के विकास के साथ जिस रफ्तार से तकनीक चल रही है, उस गति से मनुष्य नहीं चल पा रहा है। मनुष्य की लड़खड़ाहट साफ दिखाई दे रही है किन्तु हम आंखें बंद कर तूफान के गुजरने का इंतजार कर रहे हैं। हम शुतुरमुर्ग हो रहे हैं। नववर्ष से ठीक पहले हम ब्लैक फ्राइडे, बड़ा दिन यानि क्रिसमस के जश्न देख चुके हैं। नववर्ष भी हमारी जेब की ओर ताक रहा है।

नये वर्ष के जश्न अर्थशास्त्र से संचालित होते हैं। दुख, तकलीफ, तनाव, घृणा, अवसाद से घिरी मनुष्यता पल भर के सूकून की कोई भी कीमत देने को तैयार है। बाजार इनसान की इस विवशता को पहचान चुका है। बाजार उजाले की, उमंग की, कीमत वसूल करना जानता है। अब खुशी रंग-बिरंगी रोशनी में है, कानफाड़ू संगीत में, शराब की बोतल में और किराए की स्त्री में तलाशी जा रही है। शुभेच्छाएं मंहगे तोहफों में लिपटी हुई हैं।

मुझे हैरानी होती है जब भारत की चौथी पीढ़ी के समर्थ लोग नये साल की अगवानी करने अपने घर से नहीं अपितु अपने देश से दूर उन ठिकानों पर जा रहे हैं जहां सिर्फ़ जिस्म की नुमाइश लगती है। कोई प्रकृति के साथ, परिवार के साथ नववर्ष को आते नहीं देखना चाहता। वे बदनसीब है जो अपने घर की छत या फ्लैट की बालकनी में खड़े होकर नववर्ष की अगवानी को विवश हैं।

मैं अपने जीवन में पहली बार अमेरिका में बसे अपने बच्चों के साथ नववर्ष को आते हुए निहारूंगा। यहां आसमान दुर्दिन का है, अर्थात बादल छाए हुए हैं, छुटपुट पानी भी बरस रहा है। तापमान हमारे मूल्यों की तरह ठंडा है। पारा आदमी की तरह गिर और बढ़ रहा है। लेकिन मुझे न सूरज में कुछ नवीनता नजर आ रही है और न चंद्रमा में कोई अतिरिक्त चमक दिखाई दे रही है। ये दृष्टिदोष भी हो सकता है और हकीकत भी। लेकिन मुझे पता है कि 2022 क्या देकर और क्या छीनकर जा रहा है?

नये वर्ष 2023 के आने और पुराने के जाने से बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है। बदलाव आ सकता है तब, जब हम अपने आप को बदलें। धरती के लिए, हवा के लिए, आसमान के लिए, पशु, पक्षियों के लिए हमारा बदलना जरूरी है। हम ही इन सबके प्रथम शत्रु हैं। तो आइए मिलकर बदलें दुनिया की, देश की, प्रदेश की, शहर की और अपने आपकी तस्वीर। तदबीर हमारे पास है, तकदीर हमारे साथ है। अनन्य शुभेच्छाओं के साथ विनयावनत!
(मध्यमत)
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