अजय ‍बोकिल

महत्वपूर्ण यह नहीं है कि ये राजनीति कौन कर रहा है, दुखद यह है कि कोरोना वैक्सीन जैसे अत्यंत संवेदनशील और इंसानी जिंदगी को बचाने के मुद्दे पर भी देश में निहायत घटिया राजनीति हो रही है। कोविड संक्रमण के मामले में लगभग शुरू से अब तक लगातार नंबर वन हाॅटस्पाॅट रहे महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने केन्द्र की मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि राज्य में कोरोना की बेहद गंभीर स्थिति होने के बाद भी वह महाराष्ट्र को पर्याप्त कोविड वैक्सीन के टीके उपलब्ध नहीं करा रही है। इस गंभीर आरोप में सियासी तड़का यह था कि जो आंकड़े दिए गए, उसमें महाराष्ट्र की तुलना  चार अन्य भाजपा शासित राज्यों को की जा रही वैक्सीन सप्लाई से की गई थी।

टोपे ने साफ कहा कि महाराष्ट्र की आबादी और जरूरत के अनुपात में बहुत कम वैक्सीन डोज उसे दी जा रही है। इस पर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाॅ.हर्षवर्धन ने जवाबी हमला किया कि महाराष्ट्र सरकार कोरोना नियंत्रण करने में विफल है और अफवाह फैलाने का काम कर रही है। उधर खुद अस्पताल में इलाज करवा रहे राज्य की महाआघाडी सरकार के बैक सीट ड्राइवर शरद पवार ने विवाद पर यह कहकर ठंडा पानी डालने की कोशिश की कि कोविड प्रकोप से राज्य और केन्द्र सरकार दोनों को मिलकर निपटना होगा। इसका परोक्ष संदेश यही था कि कम से कम वैक्सीन पर तो राजनीति न हो।

केन्द्र और राज्य सरकारों की आंकड़ेबाजी से दूर जमीनी हकीकत यह है कि महाराष्ट्र में कई कोविड वैक्सीन सेंटर डोज के अभाव में बंद कर दिए गए हैं। ध्यान रहे कि मप्र सहित कई राज्यों में कोविड में जीवनरक्षक रेमडिसिवर इंजेक्शन का टोटा तो पहले से था अब ऑक्‍सीजन और कोविड वैक्सीन की भी किल्लत हो गई है। इसके पीछे भारी अव्यवस्था और अनियोजन बड़ा कारण दिखता है।

चूं‍कि यह मुद्दा महाराष्ट्र ने उठाया, इसलिए उसको निशाने पर आना ही था। यह सही है कि कोरोना से निपटने में महाराष्ट्र सरकार का रिकाॅर्ड शायद सबसे खराब रहा है, बावजूद इसके कोरोना इलाज के लिए जरूरी दवाइयों, ऑक्सीजन की समय पर और समुचित मात्रा में आपूर्ति न हो पाने के लिए केन्द्र सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से हटकर यह डरावनी सच्चाई है कि महाराष्ट्र में समुचित वैक्सीन सप्लाई न होने से कई कोविड टीकाकरण सेंटर बंद हो चुके हैं तो कुछ के पास महज एक या दो दिन का स्टाॅक बचा है।

इसी को मुद्दा बनाते हुए महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने एक चार्ट जारी किया, जिसमें कहा गया कि महाराष्ट्र की आबादी करीब 12 करोड़ है, यहां एक्टिव कोविड रोगियों की संख्या 5 लाख 2 हजार से अधिक होने के बाद भी हमें मात्र 17.50 लाख वैक्सीन डोज दिए गए, जबकि 23 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में महज 31987 एक्टिव कोरोना मरीज होने के बाद भी उसे वैक्सीन के 40 लाख डोज सप्लाई किए गए। टोपे ने अपने आरोप के समर्थन में गुजरात, मध्यप्रदेश व हरियाणा के भी तुलनात्मक आंकड़े दिए।

आशय यही था कि इन राज्यों में रोगी कम होने के बाद भी उन्हें वैक्सीन की सप्लाई ज्यादा की जा रही है और महाराष्ट्र के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। इस आरोप में सियासत यह थी कि जिन राज्यों का हवाला दिया गया, वो सभी भाजपा शासित हैं। टोपे के आरोप की स्पष्ट ध्वनि यही थी कि कोरोना वैक्सीन के बंटवारे में भी राजनीतिक आधार पर भेदभाव किया जा रहा है। इस आरोप से भड़के केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाॅ हर्षवर्धन ने वैक्सीन कमी के लिए सारा दोष राज्य की अक्षम स्वास्थ्य सेवाओं पर मढ़ दिया।

उन्होंने भी आंकड़ों के हवाले से कहा कि महाराष्ट्र, दिल्ली और पंजाब (तीनों गैर भाजपाशासित) की सरकारों ने अपने राज्यों में पहली डोज के तहत क्रमशः 86, 72 और 64 प्रतिशत कर्मचारियों को ही टीका लगाया है, जबकि देश के 10 राज्यों व केंद्र शासित राज्यों में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत का है। हालांकि बाद में खबर आई कि केन्द्र ने तत्काल 17 लाख वैक्सीन डोज महाराष्ट्र को भिजवाने की व्यवस्था की है।

सवाल यह है कि कोरोना वैक्सीन सप्लाई को लेकर विवाद की यह ‍स्थिति क्यों बन रही है? क्या केन्द्र सरकार इसमें भी अपने-पराए का भेदभाव कर रही है या फिर राज्य सरकारें अपनी नाकामी को छुपाने के लिए केन्द्र पर दोष मढ़ रहे हैं? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या पूरे देश में कोविड वैक्सीन टीकाकरण के वृहद अभियान में मांग और आपूर्ति के संतुलन की बुनियादी बात का भी ध्यान नहीं रखा गया? रेमडेसिविर और ऑक्सीजन की कमी के पीछे एक तर्क गले उतर सकता है कि कोरोना की दूसरी लहर के अचानक इतना बढ़ जाने से इन दोनो की मांग और आपूर्ति का समीकरण गड़बड़ा रहा है, लेकिन कोविड वैक्सीन टीकाकरण का काम तो तीन माह से और एक निश्चित सिस्टम के तहत चल रहा है, फिर उसमें इतनी अव्यवस्था क्यों?

अगर देश में पर्याप्त वैक्सीन उत्पादन नहीं था तो टीकाकरण के लिए आयु सीमा क्यों घटाई गई? और यदि आयु सीमा घटाई तो इतनी आबादी की गरज से हिसाब से देश में वैक्सीन उत्पादन और सप्लाई की क्या‍ व्यवस्था है?  ऐसा लगता है कि टीकाकरण की प्रक्रिया और तेज करने तथा उसे व्यापक बनाने के चक्कर में सरकार ने इस बात को अनदेखा किया  कि जब एकदम मांग बढ़ेगी तब क्या उसी अनुपात में वैक्सीन देश भर में सप्लाई हो सकेगी या नहीं? जब मोदी सरकार ने शुरू में वैक्सीन डिप्लोमेसी के तहत मित्र देशों को काफी तादाद में वैक्सीन प्रदाय की थी, तब भी यह सवाल उठा था कि कहीं इससे देश की आंतरिक जरूरतों पर विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा।

लेकिन वो शंका तब इसलिए दब गई, क्योंकि सरकार द्वारा जारी गाइड लाइन के मुताबिक शुरू में कोरोना वाॅरियर्स और 60 साल से ऊपर के बुजुर्गों को ही टीके लगने थे। मोटे तौर पर यह काम ठीक से चला। लेकिन इस आलोचना के बाद कि इधर कोरोना विकराल हो रहा है, उधर सरकार की टीकाकरण  की रफ्तार बहुत धीमी है, सरकार ने 45 वर्ष से ऊपर के लोगों को टीका लगाने की अनुमति दे दी। यह आबादी देश की कुल आबादी का  लगभग एक तिहाई से ज्यादा होती है। जब मांग एकदम इतनी बढ़ जाएगी तो क्या हम देश में घरेलू वैक्सीन मांग को पूरा कर पाएंगे या नहीं अथवा किस प्रकार पूरा करेंगे, इसकी कोई ठोस कार्ययोजना बनी है या नहीं, देश में इस वैक्सीन का पर्याप्त उत्पादन तय समय सीमा में हो सकता है या नहीं, इन सवालों का जवाब अभी मिलना बाकी है।

ऐसा मानना सही नहीं होगा कि केन्द्र सरकार राजनीतिक स्वार्थों के चलते राज्यों में लोगों की जान से सियासी खेल रही है। उसी प्रकार यह स्वीकार करना भी कठिन है कि महाराष्ट्र की महाआघाडी सरकार केवल अपनी बला दूसरे के सिर डालने के मकसद से लोगों को कोरोना से मरने के लिए छोड़ देगी। राजनीतिक प्रतिबद्धताएं, आग्रह-दुराग्रह और सत्ता स्वार्थ अपनी जगह हैं, लेकिन वो नागरिकों की जान से ऊपर नहीं हैं। फिर भी कोई राज्य अगर सार्वजनिक रूप से ऐसा आरोप लगा रहा है तो वह अत्यंत चिंता की बात है। इसके पीछे अगर सचमुच कोई ‘खेला’ हो रहा है तो वह घोर निंदनीय और निकृष्टता का परिचायक है। यह निहायत घटिया राजनीति है। इस पर तुरंत विराम लगना चाहिए। यह परस्पर दोषारोपण की घड़ी नहीं है, बल्कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को जल्द से जल्द टीकाकरण की घड़ी है। नेता और सरकारें इसे संवेदनशीलता के साथ समझें।(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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