राकेश दुबे

अफगानिस्तान से चली दकियानूसी हवा का झोंका भारत भी आ सकता है, दुआ कीजिये भारत इससे महफूज रहे। खुद को अफगानिस्तान का हमदर्द बताने वाला पाकिस्तान भी तालिबान के इस कदम से परेशान है। अफगानिस्तान में महिलाओं के लिये विश्वविद्यालय के दरवाजे बंद करने की वैसे तो अंतर्राष्ट्रीय जगत में निंदा हो रही है। लेकिन इसके बावजूद तालिबानी शिक्षा मंत्री अपने फैसले के पक्ष में कुतर्क दे रहे हैं कि ये शिक्षा इस्लामिक सिद्धांतों का उल्लंघन करती है। इस फैसले से छात्राओं में घोर निराशा है, उन्हें लगता है कि उनके भविष्य का पुल तालिबान ने बारूद से उड़ा दिया है।

बीते मंगलवार को तालिबान द्वारा की गई घोषणा पर अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। पिछले साल जब तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा किया था तो दलील दी गई थी कि पिछले तालिबानी दौर के प्रतिबंधों की पुनरावृत्ति नहीं होगी, लेकिन धीरे-धीरे लड़कियों की शिक्षा पर बंदिशें थोपी जाने लगी। तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद ही छात्राओं के सेकंडरी स्कूल में दाखिला लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। प्रतिरोध के कुछ स्वर उठे भी, कुछ महिलाएं व संगठन सड़कों पर भी उतरे, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गई।

अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक मान रहे हैं कि अफगानिस्तान पुराने निष्ठुर तालिबानी दौर में लौट रहा है। तब भी छात्राओं की संस्थागत शिक्षा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। दरअसल, तालिबान महिलाओं के मानव अधिकारों का लगातार अतिक्रमण कर रहा है। उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाने पर तुला है। संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि के अनुसार, तालिबान का यह कदम महिलाओं को शिक्षा के समान अधिकार से वंचित करने का कुत्सित प्रयास है।

अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि तालिबान का यह कदम उनकी सरकार की अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता में बाधक बनेगा। अमेरिकी विदेश मंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक अफगानिस्तान में महिला अधिकारों का सम्मान नहीं किया जायेगा, तब तक तालिबान सरकार को अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी द्वारा मान्यता का प्रश्न ही नहीं उठता। यहां तक कि खुद को अफगानिस्तान का हमदर्द बताने वाला पाकिस्तान भी तालिबान के इस कदम से परेशान है।

इस 21वीं सदी के वैज्ञानिक व प्रगतिशीलता के दौर में महिलाओं को शिक्षा के अधिकार से वंचित करना हकीकत में आदिम सोच का पोषण करना ही है। कोई भी राष्ट्र उसकी आधी आबादी को अधिकारों से वंचित करके विकास नहीं कर सकता। सुनहरे भविष्य के सपने देख रही अफगानी लड़कियां इस फैसले से सदमे में हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि उन्होंने सब कुछ गंवा दिया है। उनका मानना है कि कट्टरपंथी धर्म की अपनी सुविधा अनुसार व्याख्या करके उनके हक मार रहे हैं।

लड़कियों की दलील है कि इस्लामिक विद्वानों ने कभी भी महिलाओं की शिक्षा पर रोक लगाने को धर्म से नहीं जोड़ा है। प्रतिबंध की यह व्याख्या तालिबानी नेता महिलाओं को पिंजरे में कैद करने के मकसद से कर रहे हैं। जबकि दूसरे इस्लामी देशों में महिलाओं को पढ़ाई के पर्याप्त अधिकार मिले हैं। यहां तक कि पाक हुकमरान भी इस फैसले से खिन्न हैं और कहते हैं कि बातचीत के जरिये छात्राओं की विश्वविद्यालय में पढ़ाई का रास्ता खोला जा सकता है।

वास्तव में, यह तालिबान के उस वायदे की खिलाफत है जिसमें उन्होंने उदार शासन का भरोसा दिलाया था। वैसे तालिबान के विभिन्न गुटों के नेताओं के बीच टकराव के ये निष्कर्ष निकाले जा रहे थे कि देर-सवेर तालिबानी नेतृत्व महिला के अधिकारों को कुचलेगा। खासकर आधुनिक शिक्षा का विरोध, जो महिलाओं में चेतना लाती है और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाती है। कट्टरपंथी विश्वविद्यालयों में उपयुक्त माहौल बनाने की दलील देते रहे हैं।

इससे पहले मार्च में तालिबान ने छात्राओं के दसवीं तक के स्कूल खोलने का वायदा किया था। लेकिन ऐन मौके पर उन्होंने यू टर्न ले लिया था। तब से उनकी नीयत पर शक किया जा रहा था कि वे उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी को भी खत्म करेंगे। इससे पहले महिलाओं के पार्क, जिम में जाने तथा सार्वजनिक रूप से नहाने पर सख्ती से रोक लगा दी गई थी।

वैसे भी तीन महीने पहले जब छात्राओं को विश्‍वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई थी तो इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र, कृषि, वेटरनरी विज्ञान तथा पत्रकारिता आदि विषयों के आवेदन पर रोक लगा दी गई थी। जो तालिबानी सोच को बेनकाब करती है।(मध्यमत)
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