राकेश अचल

भारत की स्वास्थ्य नीति कोरोना महामारी के दौरान पूरी तरह नाकाम साबित हुई है,  इसलिए अब सवाल किया जा सकता है कि क्या देश की स्वास्थ्य नीति में आमूल-चूल परिवर्तन किये जाने चाहिए या नहीं? भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से एक है जहाँ स्वास्थ्य की नीति आजादी के तीन दशक बाद बनाई गयी। पांच साल पहले बनाई गयी आखिरी और तीसरी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति भी इस महामारी का मुकाबला करने में नाकाम साबित हुई।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की नाकामी को लेकर मैं देश की मौजूदा सरकार को भूलकर भी दोषी नहीं ठहराऊंगा, इसके लिए नेहरू-गांधी ही जिम्मेदार माने जाना चाहिए। दोषी उन भारतीयों को माना जाना चाहिए जो आजादी के 73 साल बाद भी जनसंख्या नियंत्रण में सरकार के साथ कंधे से कंधा लगाकर चलने के लिए तैयार नहीं हुए। देश की दोषी जनता को कोरोना ने सबसे अधिक और क्रूर सजा दे दी है। हमारी लापरवाही के एवज में हम अब तक 262350 लोगों की जान गँवा चुके हैं, इसलिए अब बारी सरकार की है कि वो अपनी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की समीक्षा करे।

स्वास्थ्य के बारे में हमारी चिंताओं का पता हमारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की उम्र देखकर आसानी से लगाया जा सकता है। देश में पहली राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति आजादी के 30 साल बाद 1983 में बनी। इसके बाद देश लम्बे समय तक इसी नीति पर काम करता रहा। देश की नींद यकायक 2002 में खुली और फिर पूरे 15 साल तक देश सोता रहा। 2017 में हमने अपनी तीसरी नीति बनाई। पिछले पांच साल से हम इसी नीति पर काम कर रहे हैं।

स्वास्थ्य हमारे यहां राज्यों का विषय है, लेकिन केंद्र भी इसके लिए काम करता है। हमारे यहां स्वास्थ्य की नीतियां नेताओं के नाम से शुरू और बंद की जाती हैं। देश नेअपनी मौजूदा स्वास्थ्य नीति में सभी उम्र के लिए स्वास्थ्य और आरोग्यता के बेहतर संभावित स्तर को हासिल करने, ग़रीबों को बिना किसी आर्थिक दबाव के उत्तम इलाज उपलब्ध कराने और स्वास्थ्य पर किए जाने वाले खर्च को 2025 तक कुल सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फीसदी तक करने का लक्ष्य रखा था। हमारे इरादे बुरे नहीं थे किन्तु हम इन पर ईमानदारी से काम नहीं कर पाए इसलिए ये तीनों लक्ष्य आज तक पूरे नहीं हो सके।

हकीकत ये है कि भारत में जीडीपी का लगभग 1 से 1.5 फीसदी हिस्सा ही स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च किया जाता है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से स्वास्थ्य पर ख़र्च किये जाने का मानक 5 फीसदी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में प्रस्ताव है कि 2025 तक स्‍वास्‍थ्‍य खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए और राज्यों को 2020 तक स्वास्थ्य पर अपने बजट का 8 प्रतिशत खर्च करना चाहिए। अभी राज्यों द्वारा स्वास्थ्य पर खर्च भिन्न-भिन्न है और अधिकांश राज्य स्वास्थ्य पर अपने बजट का पांच प्रतिशत खर्च करते हैं।

इस समय देश में आयुष्मान योजना समेत करीब आठ स्वास्थ्य योजनाएं काम कर रही हैं किन्तु इन पर ईमानदारी से अमल नहीं हो पा रहा क्योंकि सभी के साथ राजनीति वाबस्ता है, यदि राजनीति न होती तो महामारी के इस आपदाकाल में सांसद, विधायक और मंत्री अपनी-अपनी निधियों का अपनी मर्जी से इस्तेमाल न करते। ये रकम एक हाथ से और सबके लिये खर्च की जाती। एक तो हमारा स्वास्थ्य बजट कम है और ऊपर से उस पर नियंत्रण कहिये या दखल राजनीति का है, इसलिए स्थिति कोढ़ में खाज की हो गयी है।

स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित करने वाला कोई एक कारण होता तो उसे दूर किया जा सकता था किन्तु भारत में तो आबादी अकेला इसका कारण नहीं है। प्रदूषण, खाद्य असुरक्षा, डाक्टरों की कमी, स्वास्थ्य पर कम खर्च, महंगा इलाज, झोला छाप डाक्टर, निजी अस्पतालों की लूट भी वे कारण हैं जो आम आदमी को स्वस्थ्य नहीं रहने देना चाहते। हमारी नीतियों की ही कमजोरी है कि हमारे यहां आपदा में ऑक्सीजन और रेमडेसिविर इंजेक्शन सौ गुना ज्यादा कीमत पर बिके, नकली बिके उनकी कालाबाजारी हुई और हम कुछ नहीं कर सके।

भारत में केंद्र में बैठी सरकारें चाहे वे कांग्रेस की रही हों या भाजपा की या गठबंधन की, सब राज्यों में डबल इंजिन की सरकार चाहते हैं। यदि राज्य के पास डबल इंजिन की सरकार नहीं है तो उसके साथ केंद्र का पक्षपात होना तय है। राज्य भी इसी वजह से केंद्र के सामने आस्तीनें चढ़ाकर खड़े होने की हिमाकत दिखाते हैं। आज कोरोना के टीकों को लेकर जो स्थिति है वो हमारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की नाकामी का सबसे बड़ा उदाहरण है। केंद्र पूरे देश की जरूरत पूरी कर नहीं पा रहा और राज्य विदेशों से सीधे इंजेक्शन खरीद नहीं पा रहे। अनेक राज्यों ने इसके लिए ग्लोबल टेंडर भी किये लेकिन किसी को कामयाबी नहीं मिली, नतीजा क्या हुआ कि देश में किसी भी आयु वर्ग के लिए समुचित टीके नहीं हैं। 18 वर्ष तक की आयु वर्ग के लिए 1 मई से शुरू किया जाने वाला टीकाकरण अभियान आज 18 दिन बीत जाने के बाद भी शुरू नहीं हो पाया है।

कोरोनाकाल में हमने देख लिया है कि स्वास्थ्य किसी भी समाज के लिए ज़रूरी विषय है। बिना स्वस्थ नागरिकों के किसी भी देश का आर्थिक और औद्योगिक विकास संभव नहीं है। ख़राब स्वास्थ्य के चलते शारीरिक क्षमता घटती हैं, जिससे उत्पादकता में गिरावट होती है। इसके अलावा आर्थिक और सामाजिक स्थिति भी प्रभावित होती है। बावजूद इसके हम सुधरने को राजी नहीं। जीवन और राष्ट्रिय अस्मिता से जुड़े इस मुद्दे पर राजनीति करने से बाज नहीं आना चाहते। हमारी अदालतें बार-बार हस्तक्षेप करने के बाद भी स्थिति को सुधारने में सहायक नहीं हो पा रही हैं। लोग इलाज के अभाव में बेमौत मर रहे हैं। स्थिति ये है कि अब हमारे पास बहाने के लिए आंसू तक नहीं बचे हैं।

भारत की तमाम नीतियों की ही खामी है कि देश में रोगों के शिकार लोगों को इलाज तो दूर सम्मान के साथ अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था नहीं है। सरकारें इस दुर्दशा के लिए आम आदमी के सर पर दोष मढ़ने में नहीं हिचकतीं लेकिन हमारे नेतृत्व को लज्जा नहीं आती। क्या आपको नहीं लगता कि एक निशान और एक विधान वाले इस देश में स्वास्थ्य के लिए एक ही नीति होना चाहिए? क्या आपको नहीं लगता कि स्वास्थ्य के लिए नेताओं के नाम पर कोई नीति नहीं चलना चाहिए? क्या आपको नहीं लगता कि स्वास्थ्य सेवाओं को देश की रक्षा के बाद सबसे बड़ी जरूरत समझा और माना जाना चाहिए? फैसला आपका है क्योंकि सरकारें आप चुनते हैं, हम नहीं। (मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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