अजय बोकिल

देश में कोविड 19 टीकाकरण की गति तेज करने और टीके बर्बाद होने से बचाने के लिए केन्द्र सरकार ने 18 साल से ऊपर वालों के टीकाकरण सेंटर पर ही रजिस्ट्रेशन करने का जो फैसला अब किया है, वह एक माह पहले ही हो जाना चाहिए था। क्योंकि ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की शर्त के चलते 18 साल से ऊपर वाले ज्यादातर युवाओं को टाइम स्‍लॉट ही नहीं मिल रहे थे। जिन्हें मिले भी तो उनमें से कई को टीकाकरण सेंटर से खाली हाथ लौटना पड़ा, क्योंकि वैक्सीन ही उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में बहुतों ने शहर से बाहर जाकर गांवों में स्‍लॉट बुक करना शुरू कर दिया, जो असल में गांव वालों का हक मारना था।

हालांकि गांवों में कोरोना टीके को लेकर अभी भी बहुत गलतफहमियां हैं। इससे निपटना अलग चुनौती है, लेकिन देश में टीकाकरण महाभियान को जिस व्यवस्थित तरीके से और केन्द्र तथा राज्यों के आपसी सहयोग से चलाने की जरूरत है, वह अब भी नदारद है। जनता में संदेश यही है कि दोनों की दिलचस्पी टीकाकरण में कम, इस पर राजनीति करने में ज्यादा है। इस रवैए से टीकाकरण की उन व्यावहारिक दिक्कतों पर भी पर्दा पड़ रहा है, जिन्हें आपस में बैठकर सुलझाया जाना चाहिए। दुनिया में शायद ही कोई दूसरा देश होगा, जहां जनस्वास्थ्य से जुड़े टीकाकरण के संजीदा मसले पर भी ऐसी सियासत होती होगी।

पूरे देश में कोरोना टीकाकरण जिस गति और प्रबंधन से चल रहा है, उसे देखकर यही लगता है कि यह अव्यवस्था और अदूरदर्शिता से भरा महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। अभी हालत यह है कि आधा दर्जन राज्यों ने अपने यहां टीकाकरण कार्यक्रम स्थगित कर दिया है, क्योंकि उनके पास टीके के डोज ही नहीं है। इसमें देश की राजधानी दिल्ली और भाजपा शासित कर्नाटक जैसे राज्य भी शामिल है। मध्यप्रदेश की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। फर्क इतना है कि गैर भाजपाशासित राज्यों के मुख्यमंत्री टीके के टोटे की बात सार्वजनिक रूप से कहते हैं और भाजपाशासित राज्यों के मुख्यमंत्री अपना दर्द सार्वजनिक रूप से कह भी नहीं पाते।

यूं केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में अपनी टीकाकरण नीति का हवाला देते हुए दावा किया था कि यह पूरी तरह संविधान सम्मत है और विचारपूर्वक बनाई गई है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन अभी भी दावा करते हैं कि राज्यों के पास पर्याप्त टीके के डोज हैं, वितरण व्यवस्था गड़बड़ है। सरकार भाग दौड़ कर रही है। जल्द ही सब ठीक होगा। उधर राज्यों की शिकायत है कि केन्द्र जरूरत के हिसाब से सप्लाई ही नहीं कर रहा है। हम क्या करें? उधर भारतीय टीका निर्माता कंपनियों ने हाथ खड़े कर दिए हैं कि वो इतनी जल्दी इतने बड़े पैमाने पर टीके तैयार कर सप्लाई नहीं कर सकती।

यानी जुलाई तक अतिरिक्त टीके मिलने की संभावना नहीं के बराबर है। इस बीच कुछ राज्यों ने सीधे ग्लोबल टेंडर निकाल कर विदेशी कंपनियों से वैक्सीन मंगवाने की कोशिश की। लेकिन वह भी बेकार गई, क्योंकि वैक्सीन निर्माता कंपनियों ने साफ कह दिया कि वो राज्यों को सीधे सप्लाई नहीं करेंगे। अगर भारत सरकार उनसे टीका मंगवाए तो देने को तैयार हैं। इस पर केन्द्र सरकार की कोई प्रतिक्रिया अभी नहीं आई है। यानी मामला सुलझने की बजाए और उलझ गया है। अब राज्यों के सामने संकट यह है कि देश में वैक्सीन उपलब्ध होने में दो तीन महीने लगेंगे और विदेशी कंपनियां सीधे वैक्सीन देने तैयार नहीं है। ऐसे में वो वैक्सीन कहां से लाएं?

केन्द्र और राज्य सरकारों के ‘आंकड़ों-आंकड़ों’ के खेल में परेशान आम लोग हो रहे हैं। इसकी किसी को चिंता ही नहीं है। गौरतलब है कि देश में 18 साल से ऊपर तक की पूरी आबादी यानी करीब 110 करोड़ लोगों को दो डोज के हिसाब से कुल 220 करोड़ टीके लगने हैं। ताकि कोविड की तीसरी लहर से यथासंभव बचा जा सके। अब तक की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 20 करोड़ लोगों का ही टीकाकरण हो सका है। देश में आम लोगों को टीका लगने का काम फरवरी में शुरू हो गया था। यानी चार माह में 20 करोड़ की आबादी ही टीकाकृत हो पाई है। ऐसे में 220 करोड़ डोज लगने में लोगों को कितना इंतजार करना पड़ेगा, यह आसानी से समझा जा सकता है।

ऐसा नहीं है कि टीकाकरण स्टाफ ठीक से काम नहीं कर रहा या फिर राज्य सरकारों की नीयत में कोई खोट है। मुख्‍य मुद्दा तो टीकों की पर्याप्त संख्या में अनुपलब्धता का ही है। केन्द्र सरकार ने 80 फीसदी आबादी को टीका लगाने की मुहिम तो जोरशोर से शुरू कर दी, लेकिन इतनी बड़ी तादाद में और समय पर टीके आएंगे कहां से, इसकी कोई ठोस प्लानिंग पहले ही की जानी थी, वो अभी तक तो नहीं दिख रही है। हालत यह है कि घर में मुट्ठी भर आटा है और पूरे मुहल्ले को खाने का न्यौता दे डाला है।

दूसरी बड़ी समस्या स्‍लॉट लेकर भी टीका लगवाने नहीं पहुंचने वालों की है। इससे भी लाखों की संख्या में टीके बेकार हो रहे हैं। इसकी बड़ी वजह ऑनलाइन स्‍लॉट बुकिंग की शर्त रही है। जबकि बहुत से लोग सीधे सेंटरों पर जाकर टीका लगवाने को तैयार हैं, जिनमें वो लोग भी हैं, जिनके लिए ऑनलाइन स्‍लॉट बुकिंग अभी भी दिक्कत वाला काम है। केन्द्र सरकार ने ऑनलाइन बुकिंग की अनिवार्यता की जो शर्त रखी थी, उससे यही संदेश जा रहा था ‍कि सरकार को आम खाने से ज्यादा पे़ड़ गिनने की चिंता है। जो भी हो, कम से कम उसे अब हकीकत समझ आई है। आखिर हमारा पहला लक्ष्य है टीका लगाना न कि किस व्यवस्था से लगवाना। जो आए, उसे लगाएं। इससे टीकाकरण की रफ्तार यकीनन बढ़ेगी। आम लोगों को भी राहत मिलेगी। खास कर उन युवाओं को जो, स्‍लॉट बुकिंग के लिए रोज परेशान हो रहे थे।

दूसरी चिंता की बात गांवों में टीकाकरण को लेकर फैले भ्रमों को दूर करने की है। मप्र में मुख्यमंत्री के पैतृक गांव में भी लोग टीका लगाने से बच रहे हैं। कई गांवों में लोगों को गलतफहमी है कि इससे मौत हो जाएगी। गांव वाले टीकाकरण टीम को देखते ही भाग जाते हैं। मानो यह कोई हौआ हो। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। निश्चय ही कुछेक मामलों में टीका लगवाने के बाद लोगों की मौत हुई है, लेकिन वह टीका लगवाने से हुई, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है। दूसरे, देश में कोरोना से मौतों का सिलसिला अभी घटा नहीं है और इसकी कोई शर्तिया दवा भी अभी तक नहीं है। ऐसे में कोरोना वैक्सीन ही एकमात्र उम्मीद की किरण है।

उधर गांवों में कोरोना तेजी से पैर पसार रहा है। यह अजीब‍ विडबंना है कि लोग कोरोना से मरने को तैयार हैं, लेकिन उससे बचने के लिए वैक्सीन लगवाने को तैयार नहीं है। यह सोच ही अपने आप में आत्मघाती और अंधविश्वास से भरी है। हालांकि इसमें राजनीति भी दोषी है। अब तो कोरोना से बचाने के लिए बच्चों को भी वैक्सीन लगाने की बात चल रही है, लेकिन जब बड़ों को ही वैक्सीन नहीं लग पा रही तो बच्चों तक वह कब और कैसे पहुंचेगी, सोचा जा सकता है।

हालात कहते हैं कि जब अन्य देशों में वैक्सीन की मांग घटेगी, तभी हमें पर्याप्त वैक्सीन मिल पाएगी। यूं सरकार ने अब देश में कई कं‍पनियों को वैक्सीन उत्पादन के लायसेंस दिए हैं, लेकिन वहां भी उत्पादन शुरू होने में वक्त लगेगा। वैसे भी वैक्सीन उत्पादन कोई नदी किनारे रेत खनन तो है नहीं कि जब जितना चाहा खोद लिया। बहरहाल 18 प्लस वालों के सेंटरों पर ही टीकाकरण का फैसला टीकों की बर्बादी को तो बचाएगा, लेकिन इससे टीकों की मांग और जल्दी बढ़ेगी, उससे सरकार कैसे निपटेगी, यह देखने की बात है। क्योंकि बुनियादी सवाल तो टीकों की जरूरत के मुताबिक उपलब्धता का ही है। (मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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