राकेश दुबे

देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा मोटे अनाज पर जी रहा है। दुर्भाग्य, मोटे अनाज की खुदरा महंगाई दर घटने का नाम नहीं ले रही है। कहने को कुल मिलाकर खाद्य महंगाई दर में नरमी आई है, परन्तु खराब मौसम की मार से इन अनाजों का उत्पादन घटा है, जो इस असंतुलन का बड़ा कारण है। आंकड़े कहते हैं, इस नवंबर में मोटे अनाज की महंगाई दर अक्टूबर महीने के 12.08 प्रतिशत से बढ़कर नवंबर में 12.96 प्रतिशत हो गई। ऐसा तब हुआ है, जब समग्र महंगाई दर 11 महीनों में पहली बार भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 6 प्रतिशत के लक्ष्य के भीतर आ गई। खाद्य महंगाई दर भी 11 महीने के सबसे निचले स्तर 4.67 फीसदी पर आ गई है।

गेहूं की खुदरा महंगाई दर अक्टूबर के 17.64 प्रतिशत से बढ़कर नवंबर में 19.67 प्रतिशत प्रतिशत हो गई। साल की शुरुआत में यह महज 5.1 प्रतिशत थी और चालू वित्त वर्ष की शुरुआत में बढ़कर 9.59 प्रतिशत हो गई थी। उस स्तर की तुलना में यह नवंबर में दोगुने से अधिक हो गई है। एक अन्य प्रमुख अनाज चावल की महंगाई दर अक्टूबर के 10.21 प्रतिशत से बढ़कर नवंबर में 10.51 प्रतिशत हो गई। जनवरी में यह महज 2.8 प्रतिशत और अप्रैल में 3.96 प्रतिशत थी।

अक्टूबर और नवंबर को छोड़कर इन सभी महीनों में अन्य अनाजों की महंगाई दर कम होने के कारण गेहूं और चावल की कीमतों ने महंगाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। अक्टूबर में दरों में 1.99 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी, जबकि सितंबर में 1.37 प्रतिशत की कमी आई थी। नवंबर में यह थोड़ी नरम होकर 1.7 प्रतिशत रहीं। गेहूं और चावल की कीमत बढ़ने से गरीबों का बजट बिगड़ सकता है, लेकिन सरकार 80 करोड़ लोगों के लिए मुफ्त खाद्यान्न योजना को पहले ही 3 महीने बढ़ाकर 31 दिसंबर तक कर चुकी है।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) के तहत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लाभार्थियों को 5 किलो गेहूं या चावल मुफ्त प्रदान किया जाता है। यह उनके मासिक कोटा के अतिरिक्त है। इसके अलावा, राशन वाले चावल और गेहूं की कीमत में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक वितरण प्रणाली चावल की कीमतों में कैलेंडर वर्ष के पहले 4 महीनों के दौरान अप्रैल तक गिरावट देखी गई। इसके बाद सितंबर तक महंगाई दर 1 प्रतिशत से नीचे रही। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले चावल की कीमत में अक्टूबर-नवंबर के दौरान कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।

सरकार के अनुमान के मुताबिक, गेहूं और चावल दोनों का उत्पादन पिछले साल के स्तर से कम रहा है, लेकिन आधिकारिक तौर पर घोषित और निजी व्यापारियों की गणना के बीच गिरावट की सीमा अलग-अलग है। यह हाल के इतिहास में बहुत कम देखा गया है, जब दोनों मुख्य अनाजों के उत्पादन में प्रतिकूल मौसम की स्थिति के कारण गिरावट आई है। 2022 में रबी की कटाई से ठीक पहले गर्मी में अचानक वृद्धि के कारण गेहूं का उत्पादन गिर गया।

पूर्वी भारत के मुख्य उत्पादक राज्यों बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में सूखे और कम बारिश के कारण पिछले खरीफ सीजन में चावल का उत्पादन गिरा था। आधिकारिक अनुमान के अनुसार, जून में समाप्त होने वाले 2022 के रबी सीजन में गेहूं का उत्पादन 10.64 करोड़ टन आंका गया था। यह पिछले साल के उत्पादन से 38 लाख टन कम है क्योंकि मुख्य फसल उगाने के चरण में गरमी की लहर के कारण उत्पादन में कमी आई है।

हालांकि, निजी व्यापारियों ने उत्पादन को बहुत कम, लगभग 9.8 से 10.0 करोड़ टन के आसपास आंका है। उत्पादन में गिरावट के कारण घरेलू बाजार में कीमतों में तेजी आई। यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक बाजारों में गेहूं की भारी कमी के चलते भी कीमतें बढ़ीं। इसी तरह, चावल के मामले में भी खराब मौसम ने खेल दिखाया और पूर्वी भारत में सूखे ने चावल के उत्पादन को नीचे खींच लिया। पहले अग्रिम अनुमान के मुताबिक, हाल में समाप्त हुए खरीफ सीजन में चावल का उत्पादन 10.49 करोड़ टन रहने की उम्मीद है। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले करीब 6.05 प्रतिशत कम होगा।
(मध्यमत) डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता, सटीकता व तथ्यात्मकता के लिए लेखक स्वयं जवाबदेह है। इसके लिए मध्यमत किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है। यदि लेख पर आपके कोई विचार हों या आपको आपत्ति हो तो हमें जरूर लिखें।– संपादक