राकेश अचल

दिल्ली के प्रगति मैदान से 67 साल पहले मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में तत्कालीन शासकों ने एक प्रगति मैदान बनाया था। इस प्रगति मैदान को दुनिया ग्वालियर व्यापार मेला के नाम से जानती है। देश की आजादी के बाद इस प्रगति मैदान को जितनी तरक्की करना चाहिए थी वो तो नहीं हुई, उल्टे मप्र का ये इकलौता प्रगति मैदान उजड़ रहा है।

ग्वालियर में 1905 में अकाल पड़ा। तत्कालीन सिंधिया शासक माधवराव सिंधिया (प्रथम) ने जनता को रोजगार दिलाने की गरज से रेसकोर्स से लगी 104 एकड़ जमीन में स्थाई मेला लगाने का फैसला किया। ये मेला पहले कोटेश्वर महादेव के पास के जंगल में लगता था। दरअसल ये मूलतः पशु मेला था, लेकिन सिंधिया ने इसे स्थाई अधोसंरचना देकर कारोबारी मेले में तब्दील कर दिया। दिल्ली के प्रगति मैदान की जमीन 150 एकड़ है।

ग्वालियर मेला ग्वालियर नुमाइश के नाम से देश भर में मशहूर हो गया। पड़ोसी राज्यों के पशु पालकों से लेकर देश भर से दूसरे व्यापारी, नौटंकी कंपनियां, सर्कस भी इससे जुड़ गए। स्थायी दुकानों में पूरे एक महीने की ये नुमाइश पूरी रियासत की पहचान और जरूरत बन गई। राज प्रमुख खुद नुमाइश में शाही तंबू लगाकर आते थे। 1956 में मध्य प्रदेश बना तो राज्य सरकार ने इस नुमाइश का प्रबंधन उद्योग विभाग को सौंप दिया। विभाग जनभागीदारी से इसे आयोजित करने लगा।

कहते हैं कि बारह साल में घूरे के दिन फिरते हैं, लेकिन ग्वालियर नुमाइश के दिन मप्र बनने के 28 साल बाद फिरे। 1984 में सिंधिया परिवार के मुखिया माधवराव सिंधिया केंद्र में मंत्री बने तो उन्होंने अपने पूर्वजों की इस थाती को नया रूप देने के लिए ग्वालियर मेला से 67 साल बाद बने प्रगति मैदान के मुखिया को ग्वालियर बुलाकर इसे व्यापार मेला का दर्जा दिलाया। राज्य सरकार द्वारा विभिन्न करों में दी गई रियायत की वजह से मेला एक बार फिर जी उठा। मेला परिसर में एक स्थायी शिल्प बाजार और फेसिलिटेशन सेंटर बन गया।

माधवराव सिंधिया जब तक रहे तब तक मेले की तरक्की होती रही। मेला प्राधिकरण भी बन गया और प्रशासनिक भवन भी। कुछ और निर्माण कार्य भी हुए लेकिन सिंधिया के निधन के बाद एक बार फिर मेले के दुर्दिन शुरू हो गये। राज्य सरकार ने रियायतें वापस ले लीं। राज सहायता बंद कर दी। मेला राजनीति का अखाड़ा बन गया। पूरे सात साल मेला प्राधिकरण मप्र सरकार में मंत्री रही श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया के हाथों में रहा।

पिछले कई सालों से मेला प्राधिकरण सफेद हाथी बना है। राजनीति के चलते प्राधिकरण में न अध्यक्ष की नियुक्ति हो रही है न संचालक मंडल की। सब नौकरशाही के हाथों में है। प्राधिकरण की जमीन पर प्रगति मैदान दिल्ली की तर्ज पर नये भवन बनाने के बजाय मेले में दर्जन भर मैरिज गार्डन खोल दिए गए हैं। जिस मेले में देश भर का प्रतिनिधित्व होता था उसमें अब प्रदेश के ही लोग नहीं आ रहे।

मप्र की सरकार के पास उज्जैन में महाकाल लोक बनाने के लिए पैसा है, इंदौर में प्रवासी भारतीयों का सम्मेलन बुलाने के लिए पैसा है किंतु प्रदेश के नहीं बल्कि देश के पहले प्रगति मैदान के लिए न पैसा है, न सोच। मेला प्राधिकरण की तमाम जमीन अतिक्रमण की चपेट में हैं, तमाम जमीन का इस्तेमाल नहीं हो रहा। मेले की जमीन राजनीतिक सभाओं को मुफ्त में देने के लिए है।

मेला प्राधिकरण चाहे तो यहां प्रगति मैदान की तर्ज पर स्थायी मंडप बना सकता है, प्रगति मैदान की तर्ज पर पूरे साल मेलों का आयोजन कर सकता है। स्थायी एम्यूजमेंट पार्क बना सकता है, लेकिन कोई कुछ नहीं करना चाहता। एक काकस मेले की दुकानों की कालाबाजारी पर जिंदा है। मेले का कंप्यूटरीकरण दिखावा है। अधिकारियों की मनमानी ने मेले का मूल स्वरूप ही चौपट कर दिया है। पशु मेला मृतप्राय है। सिर्फ औपचारिकता पूरी की जा रही है। मेले की स्वायत्तता का मेला प्राधिकरण को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा।

वर्ष 2023 का मेला देखकर आप यहां के लचर प्रबंधन की हकीकत का अनुमान लगा सकते हैं। चौतरफा गंदगी, जन सुविधाओं का घोर अभाव मेले की जान का दुश्मन बन गया है। पिछले पांच दशक में ये मेला अढाई कोस ही चल पाया है।(मध्यमत)
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