अजय बोकिल

किसी अखबार की मौत पर विदाई हो तो ऐसी, जैसी कि हांगकांग के ‍अखबार ‘एप्पल डेली’ को उसके चाहने वालों ने दी। इस अखबार की रोजाना 80 हजार प्रतियां छपती थीं, लेकिन समाचार पत्र का आखिरी अंक खरीदने सुबह से लोग टूट पड़े और देखते ही देखते उसकी 10 लाख प्रतियां बिक गईं। लोकतंत्र की खातिर ‘शहीद’ होने वाले इस अखबार की अंतिम प्रति को सहेजे रखने शहर की सड़कों पर भीड़ उमड़ पड़ी। उन्होंने अखबार के समर्थन में अपने मोबाइल की फ्लैश लाइटें चमकाईं। क्योंकि यह अखबार कोविड, आर्थिक संकट या किसी काले धंधे के कारण बंद नहीं हुआ था, बल्कि देश में लोकतंत्र कायमी की लड़ाई लड़ते और सरकार की प्रताड़ना झेलते हुए ‘वीरमरण’ को प्राप्त हुआ था।

अखबार के संचालकों ने 24 जून को अपने ग्राहकों, विज्ञापनदाताओं को अपने आखिरी मेल में उनके सहयोग के लिए धन्यवाद देते हुए ‘शोक सूचना’ दी कि अब अखबार का प्रिंट और डिजीटल एडीशन उन्हें नहीं ‍मिल पाएगा। अखबार के अंतिम अंक में एक तस्वीर प्रकाशित की गई, जिसमें ‘एप्पल डेली’ के कर्मचारी, इमारत के आसपास बारिश के बावजूद एकत्रित हुए समर्थकों का, कार्यालय से हाथ हिलाकर अभिवादन कर रहे हैं। इसे शीर्षक दिया गया- ‘हांगकांग वासियों ने बारिश में दुखद विदाई दी, हम एप्पल डेली का समर्थन करते हैं।’

एक लोकतंत्रवादी अखबार की इस तरह मौत पर शायद ही कोई वामपंथी आंसू बहाना चाहे, जो चीनी कम्युनिस्ट सरकार की प्रताड़ना का शिकार हुआ और शायद ही कोई दक्षिणपंथी इस पर आंसू बहाना चाहे, क्योंकि मीडिया को लेकर उसकी आंतरिक भावना भी इससे बहुत अलग नहीं है। फर्क केवल दमन के तरीकों और जुमलों का है। चाहत मीडिया को ‘कोल्हू का बैल’ बनाने की ही है क्योंकि कई खामियों के बावजूद  प्रेस लोकतंत्र का सबसे बड़ा झंडाबरदार रहा है।

दुर्योग देखिए कि कल ही मैंने अपने इस स्तम्भ में भारत सहित पूरी दुनिया में प्रिंट मीडिया की चलाचली की बेला की चर्चा की थी और दूसरे ही दिन हांगकांग के प्रमुख और दमदार अखबार का सरकारी ठोकशाही के चलते उठावना हो गया। कहा जा सकता है कि यह मामला हांगकांग का है, जहां लोग बीते 24 सालों से देश में लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं, उसका भारत से क्या सीधा सम्बन्ध है? यकीनन सीधा सम्बन्ध नहीं है, लेकिन सत्ता की मानसिकता में बहुत फर्क नहीं है। मकसद वही है, किसी न किसी रूप में अभिव्यक्ति पर नकेल डालना और इसे जायज ठहराने के लिए अपने हिसाब से जुमले और तर्क गढ़ना।

यह भी संयोग है कि हमारे देश में आपातकाल लगाने की आज 45 वीं बरसी पर मीडिया या तो दम तोड़ रहा है या फिर ‘बैंड पार्टी’ में तब्दील हो रहा है। वही आपातकाल, जिसे अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र का काल माना गया और जिसकी समाप्ति को लोकतं‍त्र की जीत के रूप में पारिभाषित किया गया। तब भी प्रेस का एक बड़ा वर्ग सत्ता के आगे दंडवत कर रहा था। लेकिन उस अंधेरे में भी कुछ दीए बोलने की आजादी और लोकतंत्र की मशाल वाले भी थे। उन्हीं दीयों को आज हम पत्रकारिता के प्रकाश स्तम्भ मानकर नमन करते हैं, आदर्श मानते हैं।

‘एप्पल डेली’ की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एप्पल डेली का प्रकाशन 20 जून 1995 को एक कपड़ा व्यापारी जिमी लाई ने टैबलायड अखबार के रूप में शुरू किया था। पहले यह पत्रिका के रूप में ‍निकलता था। ‘एप्पल’ नाम इसे जान बूझ कर दिया गया था, क्योंकि आदम और हौव्वा की कहानी में इसे एक वर्जित फल माना गया है। शुरू में इस पत्र की प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए सभी तरीके अपनाए गए। लेकिन इस अखबार को सही पहचान तब मिली, जब 2015 में चान पुई मान इसकी पहली महिला प्रधान संपादक बनीं। उन्होंने इसे मानवाधिकार और लोकतंत्र की लड़ाई लड़ने वाले अखबार में तब्दील कर दिया।

मानव‍ाधिकार और लोकतं‍त्र ऐेसे शब्द हैं, जिनसे चीनी सत्ता को सबसे ज्यादा चिढ़ रही है। अखबार ने अपने डिजीटल एडीशन के साथ हांगकांग में लोकतंत्र कायमी के लिए जारी संघर्ष को खुला समर्थन दिया। लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों, सरकार के प्रति लोगों के असंतोष और राजनीतिक गतिविधियों को भरपूर कवरेज दिया, जो सरकार की निगाहें टेढ़ी होने के लिए काफी था। सरकार के दबाव में बहुत से बड़े विज्ञापनदाताओं ने ‘एप्पल डेली’ को विज्ञापन देने से हाथ खींच लिए। चीन समर्थित हांगकांग प्रशासन और पुलिस ने पिछले साल ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ की आड़ में अखबार के दफ्तर पर छापा मारा। यह कानून हांगकांग में पिछले साल ही लागू किया गया है।

छापे के बाद अखबार के खाते सील कर दिए गए। 23 लाख डॉलर की सम्पत्ति जब्त कर ली गई। अखबार के संपादक रेयान लॉ सहित पांच शीर्ष संपादकों और सीईओ चेंउंग किम हंग को गिरफ्तार कर लिया गया। अखबार ने उसके खिलाफ की गई सरकारी कार्रवाइयों की भी पूरी ताकत से रिपोर्टिंग की। छापे के दूसरे दिन के अंक में अखबार की हेड लाइन थी-‘एप्पल डेली लड़ता रहेगा।‘ इस बात को जनता तक डिजीटल माध्यम से पहुंचाया गया। गौरतलब है कि सरकारी दमन के चलते अखबार के सामने विकल्प था कि वह संघर्ष की अपनी टेक छोड़कर सरकार की भजन मंडली में शामिल हो जाता। लेकिन ‘एप्पल डेली’ ने ऐसा करने की बजाए प्रकाशन बंद करने का निर्णय लिया।

इन भावुक क्षणों में एप्पल डेली के ग्राफिक डिजाइनर डिकसन ने कहा, ”यह हमारा आखिरी दिन और आखिरी संस्करण है, क्या यह सच्चाई दिखाता है कि हांगकांग ने अपनी प्रेस की आजादी और अभिव्यक्ति की आजादी को खोना शुरू कर दिया है?  इससे अखबार के पाठकों और प्रशंसकों में उसकी इज्जत और बढ़ गई। जबकि चीनी सरकार की मीडिया का गला घोंटने की कार्रवाई की पूरी दुनिया में कड़ी आलोचना हुई।  हाल में 17 जून को हांगकांग पुलिस ने एप्पल डेली के मुख्यालय पर फिर छापा मारा तथा कई लोगों को गिरफ्तार किया।

अखबार पर आरोप लगाया गया कि वो विदेशी शक्तियों से मिलकर राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है। खास बात है कि पिछले साल अमेरिकी राष्ट्पति के चुनाव में एप्पल डेली ने ट्रंप का समर्थन किया था, जो चीनी सरकार को नागवार गुजरा था। हांगकांग में लोकतंत्र की विरासत इसके ब्रिटिश उपनिवेश होने के जमाने से है। ब्रिटेन ने हांगकांग को चीन के राजा से लीज पर लिया था और एक प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह के रूप में विकसित किया। सौ साल बाद इसे चीन ने वापस मांगा, क्योंकि चीन की वैश्विक हैसियत बदल गई थी।

ब्रिटेन ने हांगकांग चीन को इस शर्त पर लौटाया था कि चीन का हिस्सा बनने के बाद भी वहां पूंजीवादी व्यवस्था, पुरानी परंपराओं और लोकतंत्र को कायम रखा जाएगा। और अखबार इस लोकतंत्रवादी विचार के प्रमुख संवाहक हैं। लेकिन चीनी नेतृत्व इस लोकतंत्र में भी अपने लिए खतरा देखता है। इसलिए उसका गला घोंटने की पूरी कोशिश की जा रही है। एक बात और। हमारे यहां सोशल मीडिया की भूमिका जैसी भी हो, लेकिन हांगकांग में उसने लोकतं‍त्र के हक में दमदार भूमिका निभाई है।

75 लाख की आबादी वाले इस छोटे से देश में लोकतंत्र बचाओ प्रदर्शनों तथा लोकतंत्रवादियों को एकजुट करने और लोकतंत्र के पक्ष में जनमत बनाने में सोशल मीडिया ने संघर्ष के टूल का काम किया है। इसका महत्व इसलिए भी है कि हांगकांग में पिछले दिनों हुए लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों में शामिल होने वाले ज्यादातर अनाम लोग थे। बल्कि उनमें से बहुत से लोग सरकारी दमन से बचने के लिए अपनी पहचान छुपाकर लोकतंत्र बचाने के लिए लड़ रहे थे। इसके बावजूद कई लोगों की गिरफ्तारियां हुईें। इस लोकतंत्रवादी आंदोलन का प्रतीक चिन्ह एक ‘पीली छत्री’ को बनाया गया। इसकी शुरुआत 2014 में ‘छत्री आंदोलन’ के रूप में हुई थी।

हांगकांग में प्रेस की स्वतंत्रता को कानूनी संरक्षण मिला हुआ है। लेकिन चीनी सरकार धीरे-धीरे प्रेस पर ‍शिकंजा कसती जा रही है। इसका एक कारण यह भी है कि चीन में छुपाई जाने वाली बहुत सी जानकारियां हांगकांग के मीडिया में आकर पूरी दुनिया को पता चल जाती हैं। बहुत सी किताबें और अन्य सामग्री जो साम्यवादी चीन में प्रतिबंधित हैं, हांगकांग में प्रकाशित हो जाती हैं। जैसे कि चीनी कम्युनिस्ट नेता जाओ जियांग के संस्मरण, जिन्हें 1989 में पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

बहरहाल, लोकतंत्र की इस अनथक लड़ाई में ‘एप्पल डेली’ ने अपनी आहुति दे दी है। इस अखबार ने मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता क्या होती है और उसका क्या मूल्य चुकाना पड़ता है, इसका आदर्श प्रस्तुत‍ किया है। इसी के साथ एक सवाल यह भी कि क्या आज हमारे देश में कोई अखबार मूल्यों के लिए ऐसी आहुति देगा? और देगा तो कितने लोग उसके पक्ष में सड़कों पर उतरेंगे? कितने लोग उस पत्र के लिए आंसू बहाएंगे? आखिर हांगकांगवासियों की लोकतंत्र की लड़ाई और लोकतं‍त्र के प्रति हमारी प्रतिबद्धता में गुणात्मक फर्क क्या है? जरा सोचें। इस बीच उस अखबार के अवसान पर पत्रका‍रीय श्रद्धांजलि तो बनती ही है।(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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