वासु चौरे

तन्मय को बचाने के लिए 4 दिन तक चली जद्दोजहद आख़िर नाकामयाब साबित हुई। बचाव दलों के लिए यह सबसे कठिन रेसक्यू ऑपरेशन था और हम टीवी रिपोटर्स के लिए भी सबसे चुनौतीपूर्ण ग्राउंड रेपोर्टिंग्स में से एक। जिस खेत के बोरवेल में साढ़े 6 साल का मासूम तन्मय अपनी बहन के साथ खेलते वक्त गिरा वह मध्‍यप्रदेश के बैतूल से 35 किमी दूर मांडवी गांव और उससे भी करीब 5 किमी आगे चारों तरफ जंगल, पहाड़ियों से घिरे हुए इलाके के बीच था।

घटना 6 नवम्बर को शाम 5 बजे हुई जब तन्मय अपने मां-बापू के साथ अपने खेत गया हुआ था। खेलते वक्त बाजू के खेत में खुले पड़े 400 फीट गहरे बोरवैल में गिरा और करीब 45 फीट की गहराई में जाकर फंस गया। आप अंदाजा लगा सकते हैं जमीन से 45 फीट एक संकरे और अंधेरे गड्ढे में गिरना कितना दर्दनाक होगा। घटना के 2 घन्टे के भीतर ही रेसक्यू ऑपरेशन शुरू हो गया, रेसक्यू टीम के कैमरे में कैद हुई एक तस्वीर में तन्मय के दोनों हाथ सिर के ऊपर नज़र आये, उसके आजू-बाजू इतनी जगह भी नहीं दिख रही थी कि वह थोड़ा हिल भी सके।

बहरहाल ऑपरेशन जिंदगी जारी था, तन्मय पर एक ओर जहां कैमरे से नज़र रखी जा रही थी तो वहीं ऑक्सीजन सिलेंडर्स के जरिये लगातार उसे ऑक्सीजन, दवाइयां देने की कोशिश भी हो थी। लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात यह थी कि तन्मय की ओर से किसी तरह का कोई रिस्पोंन्स नहीं मिल रहा था। एक तरफ ऑपरेशन तो दूसरी ओर दुआओं का दौर शुरू हो गया था। सबको उम्मीद थी कि आस्था विश्वास और रेसक्यू की टीम के प्रयासों की जीत होगी और तन्मय एक बार फिर हंसता मुस्कुराता हम सबके बीच होगा।

लेकिन कोई नहीं जानता था कि यह ऑपरेशन कितना जटिल और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। तन्मय को बचाने के लिए बोरवैल के ठीक बाजू में 45 फीट गहरा और 15 फीट चौड़ा गड्ढा बनाने का काम शुरू हुआ, पर खुदाई शुरू होने के 4-5 फीट बाद ही बड़ी-बड़ी चट्टाने (हार्ड रॉक्स) आने लगे। खुदाई के काम में तेजी लाने के लिए पोकलेन, जेसीबी, ड्रिलर जैसी बड़ी भारी मशीनों की मदद ली गयी। पठार इतना मजबूत था कि कई बार मशीनें खराब हुईं। 4-4 मशीनें खुदाई के काम में जुटी हुईं थी।

हम सब भी बड़े हैरान थे कि गड्ढे की खुदाई में मिट्टी नहीं बल्कि बड़े बड़े पत्थर निकल रहे हैं जिन्हें मशीन काटकर या तोड़कर निकाल रही थी। मुसीबत अभी और भी बढ़ने वाली थी, 25 फीट तक खुदाई के बाद ही जमीन से पानी का रिसाव भी शुरू हो गया। अब रेसक्यू टीम को खुदाई के साथ पानी को भी बाहर निकलना पड़ता जिसके चलते ऑपरेशन को अंजाम देने का समय कई गुना बढ़ गया। ऊपर से जंगलनुमा इलाके की पहाड़ियों के बीच हाड़ कंपा देने वाली सर्दी का सितम अलग, पर हम सबकी परेशानियां मासूम तन्मय से कम थी।

बमुश्किल गुरुवार 8 तारीख को दोपहर तक 45 फीट का एक पैरेलल गड्ढा बनाने का काम पूरा हुआ। अब तन्मय तक पहुंचने के लिए इतनी ही गहराई में 12 फीट की हॉरिजोंटल टनल बनानी थी। इस काम को बेहद सावधानी से करना ज़रूरी था क्योंकि डर इस बात का था कि बोरवेल की तरफ खोदते समय कोई पत्थर या मिट्टी न धंसे जो तन्मय को नुकसान पहुंचाए या जमीन में और अंदर खिसका दे। लिहाजा फैसला हुआ कि आगे की खुदाई मैन्युअली यानी कि हाथों से ही की जाएगी।

पर टनल बनाने के काम में भी मजबूत पत्थर और जमीनी पानी बड़ी मुसीबत बन गए। टीम को काम जल्दी पूरा करने के लिए हल्की ड्रिल मशीनों की मदद लेनी ही पड़ी। इन तमाम कोशिशों के बावजूद 12 फीट की टनल बनाने में 24 घन्टे से अधिक समय लग गया। इस सबके बीच तन्मय की मां बेचैन थी, खाना पीना तक छोड़ दिया था। पूरे मांडवी गांव ने खेत में ही डेरा डाल लिया था। तन्मय की मां कहती बस मेरे बेटे को जल्दी ला दो.. और कितना समय लगेगा, तन्मय कैसा होगा…, उनके इन सवालों का जवाब देने की ताकत किसी मे नहीं थी।

हम पत्रकार भी दिन रात डटे हुए थे। हर छोटे-छोटे अपडेट पर चैनल्स लाइव लेते और रेसक्यू फील्ड के चारों ओर कैमरे ट्राइपॉड के सामने खड़े रिपोटर्स नज़र आते।  घटनास्थल के आस पास न तो कोई रुकने-आराम करने की जगह थी और न ही खाने पीने की व्यवस्था। हम बाहर से पहुंचे मीडिया के साथियों, रेसक्यू टीम और 4 जिलों बैतूल, नर्मदापुरम, हरदा, भोपाल के पुलिस और प्रशासनिक अमले के खाने पीने का जिम्मा ग्रमीणों ने उठाया। 4 दिन तक रोजाना दो टाइम का खाना, चाय नाश्‍ते का बंदोबस्त ग्रामीण करते। बड़े-बड़े बर्तनों में पत्थरों से बने चूल्हे में लकड़ियां जलाकर खाना पकाया जाता, पानी का इंतज़ाम खेतों में लगे बोरवेल से होता।

दिन ढलते ही गाँव वाले जगह-जगह अलाव का इंतज़ाम भी कर देते क्योंकि जानते थे कि रात में टेम्परेचर 6-7 डिग्री तक गिर जाता है। रात हम सबको खुले आसमान के नीचे ही बीतानी थी क्योंकि नेता-मंत्रियों के कुछ घंटे के कार्यक्रमों में सुविधा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर देने वाले प्रशासन ने 5 दिन चले रेसक्यू ऑपरेशन में न तो साइट के आस-पास रोशनी की व्यवस्था की और न ही तंबू लगवाया। तन्मय के परिवार ने तक रातें खुले आसमान के नीचे गुजारीं। रेसक्यू ऑपरेशन खत्म होने के 24 घन्टे पहले ही उनके लिए टेंट और रजाई गद्दों का इंतज़ाम हो सका। हम लोग रात में बमुश्किल कुछ घन्टे गाड़ी की सीट पर आराम कर पाते। इस दौरान कार के पॉवर से ही कैमरा, लाइव व्‍यू, मोबाइल चार्ज कर लेते।

जिले के प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार ने भी लेट लतीफी और रिजल्ट ओरिएंटेड ऑपरेशन न होने की बात स्वीकार करते हुए जिम्मेदारों पर कार्रवाई की बात कही। इस सबके साथ चल रहा रेसक्यू ऑपरेशन 10 दिसम्बर शनिवार को सुबह 6 बजे खत्म हुआ। तन्मय को बचाने की यह कोशिश नाकामयाब रही। 85 घन्टे तक मासूम अंधेरे गड्ढे में मौत से जंग नहीं लड़ सका और हार गया।

तन्मय को बाहर निकालने से पहले ही प्रशासन परिवार को अलग गाड़ी में बैठाकर जिला अस्पताल बैतूल ले जाने के लिए तैयार था। टीम टनल से तन्मय को लेकर ऊपर आई जहां सीधे उसे एम्बुलेंस से बैतूल के जिला अस्पताल के पोस्टमार्टम रूम में ले जाया गया। पोस्टमार्टम के बाद तन्मय का पार्थिव शरीर परिवार को सौंप दिया गया। उसके दम तोड़ने का कारण घुटन और पसलियां टूट जाना बताया गया।

लेकिन तन्मय के आज हम सबके बीच न होने का असल कारण उस व्यक्ति की लापरवाही है जिसने बोरवैल खुला छोड़ा। उन अधिकारियों उदासीनता है जिन्हें इसका ध्यान रखना चाहिए था कि उनके इलाकों के सारे बोर, गड्ढे ठीक तरह से पैक हैं। ज़िंदगी से जंग हारते हुए शायद तन्मय ने भी यही प्रार्थना कि होगी कि अब कोई ऐसे गड्ढों को, बोरवेल को खुला न छोड़े। प्रशासन के अधिकारी भी अपना फर्ज इमानदारी से निभाएं… ताकि उस जैसा दर्द किसी और को न झेलना पड़े। हमें माफ करना तन्मय तुम्हारे दोषी हम सब हैं। तुम्हें बचा नहीं सके, किसी और की लापरवाही की कीमत तुमने अपनी जान देकर चुकाई।
(लेखक की फेसबुक पोस्‍ट से साभार)
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