अजय बोकिल

मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार की इस बात के लिए सराहना तो की ही जानी चाहिए कि वह कोरोना जैसी महाघातक महामारी से जूझने के लिए अपने ही एक मंत्री की ‘सांस्कृतिक सलाह’ के बजाए विशेषज्ञों और डॉक्टरों की राय और चेतावनियों के हिसाब से जल्द फैसले ले रही है। मसलन ब्लैक फंगस (म्यूकोरमाइकोसिस) पीडि़तों का फ्री में इलाज, कोरोना की तीसरी लहर के अंदेशे के चलते कुछ जगह बच्चों के लिए अलग से बेड की व्यवस्था, कोरोना के कारण जो बच्चे अपने मां-बाप को खोकर अनाथ हो गए हैं, उन्हें पांच हजार रुपये प्रति माह पेंशन तथा उनकी देखभाल की जिम्मेदारी सरकार द्वारा लेना आदि कुछ ऐसे फैसले हैं, जो इस भयावह संकट में किसी भी जनहितैषी सरकार से अपेक्षित हैं। इनका क्रियान्वयन कितना प्रभावी होगा, यह अभी कहना मुश्किल है, लेकिन सरकार ने पहल की है तो यह उसकी दूरंदेशी का परिचायक है।

अच्छी बात यह है कि सरकार देसी और अवैज्ञानिक टोटकों में सिर खपाने की बजाए कोरोना से लड़ने के वास्तविक और वैज्ञानिक सुझावों पर गौर कर रही है। वरना विरोधाभासो में जीने के लिए अभिशप्त इस देश में कोरोना से बचने के लिए यज्ञशालाएं खुलवाने, गोबर थेरेपी और माता पूजन जैसे टोटकों की आजमाइश भी चल रही है और पढ़े-लिखे मूर्ख भी उस पर भरोसा कर रहे हैं। ठीक वैसे ही कि जैसे कोरोना वैक्सीन से मरने का डर। उधर गोबर स्नान (बाद में दूध से भी) ने तो मानो दिमाग और शरीर में उसके वजूद के भेद को भी मिटा दिया है। गांवों में, जहां अभी भी कोरोना को लेकर खास जागरूकता नहीं है, वहां लोग इसे दैवी प्रकोप मानकर पूजा अर्चना में जुटे हैं और कई तो पूजा करते-करते ही मौत के मुंह में जा रहे हैं।

याद करें कि कोरोना की पहली लहर में पिछले साल शिवराज सरकार कोरोना मरीजों का सरकारी खर्च पर इलाज कराने के साथ-साथ आयुर्वेदिक काढ़ा बांटने में भी जुटी थी। इनके पैकेटों पर बाकायदा मोदी और शिवराज के फोटो भी चस्पा थे ताकि सनद रहे। करोड़ों रुपये इसमें बह गए। जिन्होंने इसे पिया, उनकी इम्युनिटी कितनी बढ़ी पता नहीं, लेकिन इसे पीने के बाद यह मान लेना कि अब ‘कोरोना गो गो..,’ भी नादानी ही थी। उल्टे दूसरी लहर पहले से भी कई गुना खतरनाक तरीके से आई। यानी जब वैक्सीन लगवाने के बाद भी कोरोना संक्रमण नहीं होने की सौ फीसदी गारंटी नहीं है तो काढ़ा पीने भर से बहुत कुछ नहीं होना था। कुछेक मामले ऐसे भी सामने आए कि काढ़ा पीने का अतिरेक भी जानलेवा बन गया। ध्यान रहे कि यूं चिकित्साशास्त्र में हर ‘पैथी’ का अपना महत्व है, लेकिन हर पैथी में हर बीमारी का इलाज नहीं है।

ऐसा लगता है कि पिछले अनुभवों के बाद राज्य सरकार पहले की तुलना में ज्यादा सतर्क और व्यावहारिक तरीके से काम कर रही है। बावजूद इसके कि राज्य में पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलने के कारण कोविड पेशंट की मौतों का सिलसिला पूरी तरह थमा नहीं है, रेमडेसिविर इंजेक्शनों और ब्लैक फंगस दवा की कालाबाजारी की हकीकत कलेजा चीरने वाली हैं, हालात में कुछ सुधार है। सख्त लॉकडाउन लगाने का राज्य सरकार का फैसला कामयाब होता दिख रहा है। कोविड पॉजिटिव केस कुछ कम होने लगे हैं।

दूसरी तरफ प्रदेश में मूर्खतापूर्ण सलाहों और बयानों का दौर भी जारी है। राज्य की एक मंत्री उषा ठाकुर ने शिवराज सरकार को ‘नेक’ सुझाव दिया कि कोरोना की तीसरी लहर को रोकने के लिए सरकार प्रदेश में यज्ञशालाएं बनवाए (बजाए अस्पताल बनवाने के)। बकौल मंत्री यज्ञ करने से पर्यावरण शुद्ध होगा और कोरोना भारत भूमि में घुस नहीं पाएगा। उन्होंने ‘एंटी कोरोना ट्रिक’ के रूप में लोगों से भी यज्ञ में दो-दो आहुतियां डालने की वकालत की। मंत्री ने इसे ‘यज्ञ चिकित्सा’ बताया। बेशक यज्ञ हमारे धार्मिक अनुष्ठान का एक अहम कर्मकांड है, लेकिन वह हर मर्ज का इलाज है, यह मान लेना भी नादानी ही है। यज्ञ से पर्यावरण शुद्धि के अपने दावे हैं। उसमें आंशिक सचाई भी है। लेकिन यह सौ फीसदी कारगर होता तो दुनिया कार्बन उत्सर्जन पर काबू पाने के लिए ‘पेरिस समझौते’ की जगह यज्ञ करवाना ही बेहतर समझती।

गौरतलब है कि हरिद्वार में इस साल कुंभ शुरू होने के पहले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने भी ऐसे ही दावे किए थे कि गंगा स्नान से कोरोना भाग जाएगा। हमने देखा‍ कि कुंभ में पवित्र स्नान करने वाले कई साधु-संत जल्द ही कोरोना से चल बसे और कई लौटकर अपने साथ कोरोना संक्रमण लेकर आए। यह सिलसिला अभी जारी है। इससे भी ज्यादा दुर्भाग्य की बात तो यह है कि जिस गंगाजल को कोरोनारोधी बताया जा रहा था, उसी गंगा में लोग अब निर्लज्जता से कोरोना संक्रमितों की लाशें बहा रहे हैं। ये मूर्ख लोग कोरोना पीडि़तों को ‘मोक्ष’ दे रहे हैं या दूसरों को मौत बांट रहे हैं? हमने पवित्र गंगा को प्रदूषित तो पहले से कर रखा है, अब कोरोना संक्रमितों के शवों को बहाकर गंगा मां के प्रति हम यह कैसी श्रद्धा प्रकट कर रहे हैं? आस्था का यह कैसा क्रूर और क्षुब्ध करने वाला रूप है?

ध्यान रहे कि महाराष्ट्र के बाद गुजरात देश के उन राज्यों में है, जो कोरोना की दूसरी लहर में सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है। ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में बेड का टोटा और इलाज की अपर्याप्त सुविधाओं ने वहां कई लोगों की असमय जानें ले ली हैं। और तो और नकली रेमडेसिविर इंजेक्शनों का कारोबार भी मुख्य रूप से वहीं से संचालित हो रहा था, जिसके कारण कई कोविड पेशंट्स की जानें चली गईं। यह बात मप्र पुलिस की जांच में सामने आई है। लेकिन वहां भी कुछ लोग कोरोना से बचने के लिए क्या कर रहे हैं- गोबर स्नान। इस कथित ‘गोबर थेरेपी’ पर अधिकांश चिकित्सकों ने हैरानी जताई है। क्योंकि ये स्नान सामूहिक रूप से हो रहे हैं, जो खुद कोरोना संक्रमण फैलने का बड़ा कारण है। ऐसा कोई वैज्ञानिक अध्ययन या तथ्य नहीं है कि कोरोना गाय के गोबर से डरता हो।

कोरोना की संभावित तीसरी लहर के बारे में अभी केवल अनुमान ही लगाए जा रहे हैं कि यह कब आएगी, कितनी घातक होगी और उससे निपटने के क्या तरीके होंगे? राहत की बात केवल इतनी है कि यज्ञ करने से कोरोना की तीसरी लहर रुके न रुके, लेकिन मध्यप्रदेश सरकार उसकी आहट पर कान दे रही है। दरअसल कोविड 19 का प्रकोप इतना बहुआयामी है कि संक्रमण समाप्त होने के बाद भी वह मरीज की दूसरे तरीकों से जान ले रहा है। फिर चाहे वह हार्ट अटैक हो या डायबिटीज। इसी में एक है ब्लैक फंगस की बीमारी। समय रहते इसका इलाज न हुआ तो कोविड से बचा मरीज ब्लैक फंगस की भेंट चढ़ जाता है।

मुख्यमंत्री शिवराज ने भोपाल और जबलपुर में ब्लैक फंगस के लिए इलाज के सेंटर खोलने का सामयिक ऐलान किया है। चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग के अनुसार देश की पहली म्यूकोरमाइकोसिस यूनिट मप्र में लगेगी और सरकार इस काम में विदेशी डॉक्टरों की मदद लेगी। यह इलाज भी मुफ्त होगा। यकीनन मप्र ने इस मामले में लीड ले ली है। इसी प्रकार कोरोना के कारण अनाथ हुए बच्चों और परिजनो को 5 हजार रुपये पेंशन, निशुल्क राशन और शिक्षा की सुविधा भी दी जाएगी। यह बहुत अच्छी पहल है।

हालांकि राज्य में कोरोना से जारी लड़ाई में सब कुछ चंगा है, ऐसा भी नहीं है। दूसरी लहर में हमने बहुत कुछ खोया है तो कुछ पाया भी है। शैतानियत के बरक्स इंसानियत के कई चेहरे भी हमने देखे हैं और देख रहे हैं। कोरोना के खिलाफ लड़ाई में असली ताकत यही ‘उम्मीद’ है। आशा करें कि शिवराज सरकार इसी संवेदनशीलता के साथ कोरोना के वास्तविक और वैज्ञानिक उपायों की राह पर ही आगे बढ़ेगी। (मध्‍यमत)
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