डॉ. जानकी पांडेय

आज फिर दीनानाथ जी टक-टकी लगाए घर की बालकनी से बाहर की तरफ सूनी पड़ी सड़क को निहार रहे थे। बार-बार मन बाहर जाने के लिए बेताब होता लेकिन लॉकडाउन एवं कोरोना का भय पैरों को अंदर समेटने को मजबूर कर देता। यह वही सड़क थी जहाँ दिन भर लोगों का आना-जाना लगा रहता था। बालकनी में बैठे-बैठे उनका मन अपने बीते दिनों में भटकने के लिए मजबूर हो गया था। दो बेटों और एक बेटी के पिता, उच्च-शिक्षा विभाग में सरकारी नौकरी। ऊपर से सुन्दर, सुशील, समझदार पत्नी। वह अपने आप को दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान समझते थे।

धीरे धीरे समय बीतता गया। दोनों बेटों और बेटी की शादी हो गयी। बच्चे पढ़ने में अच्छे थे। उनको मन मुताबिक नौकरी मिल गयी थी। रिटायरमेंट के बाद जो भी फण्ड मिला उससे उन्होंने अपने लिए दो कमरे का छोटा सा मकान खरीद लिया था। अभी दो साल पहले की ही बात है, दोनों बेटे-बहू ऑस्ट्रेलिया से छुट्टियां मनाने अपने घर गुरुग्राम आये हुए थे। रात के समय खाने की टेबल पर बड़ी बहू ने अचानक ही बोल दिया था- ‘’पापाजी आपने इतने सालों तक सरकारी नौकरी की फिर यह दड़बे जैसा घर क्यों खरीदा?’’ अपनी पत्नी की हाँ में हाँ मिलाते हुए बड़ा बेटा भी बोल दिया था- ‘’हाँ पापाजी, मैं तो पहले ही यह घर लेने से मना कर रहा था लेकिन आप किसी की सुनते कहाँ हैं।‘’ इससे पहले कि दीनानाथ जी कुछ बोलते, छोटी बहू किचन में रोटियां सेंकते हुए बोल पड़ी थी- ‘’इसीलिए इंडिया आने पर ज्यादा से ज्यादा समय मैं मायके में बिताना चाहती हूँ। इस दो कमरे के घर में मेरा दम घुटता है।‘’ अपने ही बेटे बहुओं की बातों से आहत उनके चेहरे को उनकी पत्नी से ज्यादा भला और कौन पढ़ सकता था। उस दिन बड़ी मुश्किल से खाना ख़त्म करने के बाद दीनानाथ जी ड्राइंग रूम में पड़े सोफे पर लेट गए थे। लेटे-लेटे वे अतीत के सपनों में खो गए।

अपनी शुरुआती जिंदगी के वे सुनहरे पल जिनके सहारे वह अपनी जिंदगी खुशी-खुशी व्यतीत कर रहे थे, एक ही झटके में चकनाचूर हो गये थे। कितने खुशनसीब पल थे जब बड़े बेटे का जन्म हुआ था। दिन भर बधाइयों का तांता लगा हुआ था। पूरे मोहल्ले में उन्होंने मिठाइयां बटवायीं थी। समय बीतता गया। वे तीन बच्चों के पिता बन चुके थे। बच्चों की पढाई में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बड़ा बेटा इंजीनियर बन गया था और छोटा बेटा फार्मेसी की डिग्री लेकर एक फार्मा कंपनी में जॉब कर रहा था। दोनों शादी के बाद ऑस्ट्रेलिया शिफ्ट हो गए थे। बेटी की शादी एक संपन्न परिवार में करके अपनी जिंदगी पत्नी के साथ हंसी-खुशी बिता रहे थे।

जिंदगी के इस पड़ाव में भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। कोरोना के कारण पत्नी का आकस्मिक निधन हो गया। फ्लाइट्स बंद होने के कारण बेटे-बहुओं ने वर्चुअली ही शोक प्रकट कर दिया था। हाँ बेटी जरूर आयी थी, लेकिन वह भी जल्दी ही वापस चली गयी थी। मोहल्ले के सीनियर सिटिज़न्स ने उन्हें सीनियर सिटीजन ग्रुप का सदस्य बना लिया था। धीरे-धीरे दोस्तों के बीच उनका समय अच्छा बीतने लगा था। लेकिन कोरोना की दूसरी लहर ने उनकी दिनचर्या को बदलकर रख दिया था। रोज मॉर्निंग वॉक पर जाने वाले दीनानाथ जी घर में कैद होकर रह गए थे। घर का दरवाजा सिर्फ अखबार और दूध लेने के लिए ही खुलता था। मेड ने भी कोरोना के कारण आना बंद कर दिया था।

बालकनी में बैठे-बैठे दीनानाथ जी सोच रहे थे, कहने को तो भरा-पूरा परिवार है पर कोई पास नहीं है। बीमार भी पड़ जाऊँ तो कोई देखनेवाला नहीं है। बेटे-बेटी कभी-कभी फ़ोन करके हाल-चाल ले लेते हैं। बड़े बेटे ने तो एक दिन वसीयत के बारे में भी पूछ लिया था। उस रात वे सो नहीं पाए थे। सुबह जब अखबार पढ़ रहे थे तब उनकी निगाह एक इश्तिहार पर पड़ी। बैंक के एक रिटायर्ड अधिकारी ने एक विज्ञापन दिया था- जीवन साथी चाहिए, पेंशनभोगी 70 वर्षीय विधुर के लिए। यह पढ़ते ही उनके दिमाग में एक विचार आया था। क्यों न वे भी इस तरह का विज्ञापन देकर अपने लिए एक साथी की तलाश करें। पर इतना बड़ा फैसला लेना उनके लिए आसान नहीं था। परिवारवाले, रिश्ते-नातेदार क्या कहेंगें? किससे राय लें। एक पुराने सहकर्मी को फ़ोन कर अपनी दुविधा बताई। सुझाव मिला की इसमें कोई हर्ज नहीं है। यदि अकेलेपन को दूर करने के लिए कोई साथी मिल जाये तो जिंदगी के बाकी दिन अकेले तो नहीं काटने पड़ेंगे। कुछ सोच-विचार कर उन्होंने फ़ोन मिलाया और अखबार में विज्ञापन के लिए मैटर भेज दिया था।

लॉकडाउन अब भी जारी है… शहर का भी और दीनानाथ जी का भी। दोनों को इंतजार है जिंदगी के अनलॉक होने का…