राकेश अचल

मध्यप्रदेश के जंगलों में से एक जंगल बक्सवाहा का भी है। बक्सवाहा के जंगल की जान पर बन आयी है। जैसे कस्तूरी का हिरण की नाभि में होना उसके लिए दुखदायी होता है वैसे ही बक्सवाहा के जंगलों में हीरों के अकूत भण्डार का होना उसकी जान का दुश्मन बन गया है। हमारी सरकार 3.42 करोड़ कैरेट के हीरे पाने के लिए बक्सवाहा के जंगलों में युगों से तनकर खड़े 2.15 लाख पेड़ों का क़त्ल कर देने पर आमादा है। हमारी सरकार के लिए सजीव पेड़ों के मुकाबले हीरे ज्यादा महर्वपूर्ण हैं। विसंगति ये कि इन वनों की निगहबानी के लिए संवैधानिक रूप से जिम्मेदार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के सबसे बड़े पर्यावरण प्रेमी हैं और इन दिनों उन्‍होंने रोज एक नया पौधा रोपने का अभियान चला रखा हैं।

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित बक्सवाहा के जंगल दूसरे जंगलों से ज़रा भिन्न हैं। इन जंगलों को मैंने सबसे पहले 53 साल पहले देखा था, तब इन जंगलों को लेकर कोई बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं था। लेकिन आज ये जंगल न केवल बक्सवाहा के लिए बल्कि पूरे बुंदेलखंड और मध्यप्रदेश के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गए हैं। प्रदेश की जनता हीरे निकालने के लिए एक जीते-जागते जंगल की बलि देने के लिए राजी नहीं है। लेकिन सरकार तो फैसला कर चुकी है, केवल एक अदालती बाधा है उसका फैसला भी ग्रीष्ममावकाश समाप्त होते ही आ ही जाएगा।

देश के भूगर्भ में छिपी अपार सम्पदा शुरू से ही मनुष्य के लालच की वजह रही है। लेकिन ईंधन के लिए, धातुओं के लिए भूगर्भ का खनन एक हद तक समझ में आता है किन्तु केवल हीरे निकालने के लिए जंगलों को उजाड़कर खनन करना समझ के बाहर की बात है। हीरों से राजस्व हासिल हो जाएगा लेकिन ये हीरे न किसी के जीवन के लिए जरूरी हैं और न इनकी वजह से कोई जीता या मरता है, फिर जिन्हें हीरे चाहिए वे समरथ हैं। सो वे हीरे लेकर मानेगे, फिर उन्हें जो करना पड़े।

बक्सवाहा के जंगलों से हीरे निकालने का फैसला आज का नहीं है, कोई दो दशक से इस बाबाद आती-जाती सरकारें काम कर रही हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने वर्ष 2002 से 2005 के बीच इन जंगलों में हीरे की तलाश का काम कराया था, जब सर्वे में पता चल गया कि बक्‍सवाहा के जंगल तो हीरों से अटे पड़े हैं तो आनन-फानन ने सरकार ने बिरला समूह की कम्पनी एस्सार माइनिंग कार्पोरेशन से इनका सौदा कर लिया। इस करार के तहत कम्पनी को 383 हैक्टेयर जमीन उत्खनन के लिए मुहैया कराई जाएगी। ये कम्पनी अगले पचास साल में इन जंगलों से 60 हजार करोड़ के हीरे निकाल लेगी। ये रकम कम-ज्यादा भी हो सकती है। मप्र सरकार का तर्क है कि इस धंधे से सरकार को रायल्टी और स्थानीय जनता को रोजगार मिलेगा।

छतरपुर से पहले मध्यप्रदेश का पन्ना जिला भी हीरे की खदानों की वजह से खोखला हो चुका है। यहां हीरे और जवाहर निकलते हैं लेकिन आज तक यहां न कोई स्थाई रोजगार जनता को मिला न पन्ना दूसरे जिलों के मुकाबले समृद्ध हो पाया। मध्यप्रदेश के आर्थिक रूप से सबसे कमजोर जिलों में पन्ना और छतरपुर का शुमार होता है। पांच दशक पहले जो स्थिति इन जिलों की थी आज भी वैसी ही है, हाँ इस इलाके में मिलने वाले हीरे-जवाहर नौकरशाहों और राजनेताओं के लिए जरूर वरदान बन जाते हैं।

बक्सवाहा क्या पूरे बुंदेलखंड में भूजल का संकट है। जमीन पथरीली और कम उपजाऊ है इसलिए यहां समृद्धि तो कभी आई ही नहीं, लेकिन इन जंगलों ने इलाके की दो बड़ी नदियों केन और बेतवा को जीवन जरूर दिया है। एक जमाने में लघु वनोपज स्थानीय जनता की आय का एक जरिया था लेकिन अब उस पर भी एक तरह से रोक लगी हुई है, केवल अवैध कटाई जारी है, जिसे कोई नहीं रोक पाया।

इस बार सरकार के फैसले के खिलाफ स्थानीय जनता खड़ी हुई है। कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने भी बक्सवाहा के जंगलों को उजड़ने से बचने का आंदोलन आरम्भ किया है, लेकिन ये आंदोलन स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा के ‘ चिपको आंदोलन’ जैसे प्रभावी बन पाएंगे या नहीं, अभी नहीं कहा जा सकता। हीरे निकालने के लिए बक्सवाहा के जंगल कितने पेड़ों की बलि देंगे ये भी साफ़ नहीं है। कभी सरकार कहती है की एक लाख पेड़ काटेंगे तो कभी कहती है 2.15 लाख, लेकिन लोग कहते हैं की कम से कम चार लाख पेड़ काटे जाने की योजना है।

मध्यप्रदेश का नसीब है कि यहां देश का सबसे बड़ा वन क्षेत्र आज भी मौजूद है। देश में कोई 7 लाख वर्ग किमी वन क्षेत्र है इसमें से 77414 किमी मध्यप्रदेश में है। अरुणाचल दूसरे और छत्तीसगढ़ तीसरे स्थान पर आता है। अवैध वन कटाई की वजह से भाजपा के दो साल के आखरी के शासनकाल में (2015 से 2017 ) 48 वर्ग किमी वन क्षेत्र कम हुआ है लेकिन किसी को कोई फ़िक्र नहीं है। म.प्र. में वनों का घनत्व राज्य में एक समान नहीं है। बालाघाट, मण्डला, डिण्डोरी, बैतूल, सिवनी, छिंदवाड़ा शहडोल, हरदा, श्योपुर, सीधी जिलों में घने वन दिखाई देते हैं। राज्य के ज्यादातर वन दक्षिणी और पूर्वी इलाके में बसे हुए हैं। श्योपुर और पन्ना उल्लेखनीय अपवाद रहे हैं।

स्थानीय जनता को अपने जंगल चाहिए और सरकार को हीरों से रायल्टी। स्थानीय जन कहते हैं कि वनों की कटाई के बाद यहां बीहड़ बनने का रास्ता साफ हो जायेगा,  आने वाली पीढ़ी चंबल के बाद बुंदेलखंड के बीहड़ को देखने तैयार होगी। यहां बहने वाली नदियां जंगल कटने के बाद लुप्त हो जायेंगी, क्योंकि जंगल हैं, तो पानी है, और पानी ही जीवन का आधार हैं। धीरे-धीरे बीहड़ के बाद यह क्षेत्र रेगिस्तान बनने की ओर अग्रसर हो जायेगा। जंगल नहीं होगा तो मिट्टी का कटाव होगा और यही प्रक्रिया दशकों चलने के बाद बीहड़ बन कर सामने आयेगी। पर्यावरण विज्ञान की दृष्टि से बीहड़ बनना रेगिस्तान बनने की शुरुआत मानी जाती है। यहां के जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो जायेंगे, उन्हें उसी तरह बेसहारा छोड़ने की तैयारी है, जैसे कोई कुकर्मी पुत्र अपने माँ-बाप को घर से बेघर कर देता है।

बुंदेलखंड की मांग का सिन्दूर समझे जाने वाले बक्स्वाहा के वनों को उजाड़ने का फैसला कर चुकी सरकार का विरोधाभास देखिये कि दूसरी तरफ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जन-जन के सहयोग से प्रदेश के हरित क्षेत्र में वृद्धि कर पर्यावरण को स्वच्छ और प्रकृति को प्राणवायु से समृद्ध करने के उद्देश्य से ‘अंकुर’ कार्यक्रम आरंभ किया गया है। कार्यक्रम के अंतर्गत पौधरोपण के लिए जन-सामान्य को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से पौधा लगाने वाले चयनित विजेताओं को प्राणवायु अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा। मुख्यमंत्री चौहान खुद अपने सरकारी बंगले में हर हफ्ते एक पौधा लगाते हैं।

हमारा अनुभव कहता है कि बक्स्वाहा के जंगलों को अब न तो कोई अदालत बचाएगी और न कोई अन्य संस्थान। इन जंगलों को स्थानीय जनता ही बचा सकती है। दुर्भाग्य ये है कि स्थानीय सांसद भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष हैं और इन जंगलों की संभावित बलि को लेकर अब तक मौन हैं। इस क्षेत्र की पूर्व सांसद और मध्‍यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती ने भी बक्सवाहा के लिए अपना मुंह नहीं खोला है।

बक्सवाहा के जंगल न बचे तो जान लीजिये कि आने वाले वर्षों में विश्व प्रसिद्ध खजुराहो के मंदिर भी समाप्त हो जायेंगे और केन-बेतवा नदियाँ भी। एक वीराना पसर जाएगा इस इलाके में। सरकार को अगर हीरे निकलवाकर रायल्टी कामना ही है तो पहले उसे प्रदेश में कम से कम दस लाख नए पौधे लगाकर उनके बड़े होने के लिए एक दशक तक इन्तजार करना चाहिए। हीरे कोई कोरोना की दवा नहीं है जो आज ही सबकी जरूरत है। (मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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