अरविंद तिवारी

कल रात से आज सुबह तक राजकुमार केसवानी पर बहुत कुछ लिखा गया। आज के अखबारों में उन पर जो छपा है, वह यह बताता है कि वह कितने बड़े पत्रकार थे, कितने अच्छे इंसान थे और पत्रकारिता से हटकर भी एक अलग जिंदगी जीते थे। उनका एक अलग संसार था और उसमें वह रच बस जाते थे। वे यारों के यार थे। महफिल सजाने में उन्हें बहुत आनंद आता था। पत्रकारिता में भी जिस विषय को वे छूते थे उसमें कोई उनकी उंगली नहीं पकड़ पाता था।

आज सुबह 9 बजे के करीब इंदौर भास्कर में हमारे साथ सालों काम करने वाले सुभाष सातलकर का फोन आया… मैं कुछ कहता इसके पहले ही उन्होंने कहा ‘अरविंद भाई अपना टाइगर तो चला गया।‘ वे सचमुच टाइगर थे। मुझे बहुत कम समय उनके साथ काम करने का मौका मिला, लेकिन बहुत कुछ सीखने को मिला। संपादक क्या होता है और कैसे उसके सामने मैनेजमेंट नतमस्तक रह सकता है यह उन्होंने ही साबित करके दिखाया। वे लाभ-शुभ का गणित देख कर काम करने वाले संपादक नहीं थे। अखबार मालिकों और उनके खासमखास लोगों को कैसे लाइन लेंथ में रखा जाए, यह वे बहुत अच्छे से जानते थे। वह मैनेजमेंट के लिए कहते थे यह सेठिये हमारे माई बाप थोड़ी हैं। अखबार मालिकों से वे सिर झुका कर बात करने की बजाए आंख में आंख डाल कर बात करते थे।

अनेक यादें हैं केसवानी जी से जुड़ी हुईं। इन्हें यहां समेटना बहुत मुश्किल है। 1-2 वाकिये जरूर बताना चाहूंगा। संकट में आने के बाद जनक गांधी उन दिनों रमेश अग्रवाल जी के बहुत नजदीकी हो गए थे। डॉ. भरत अग्रवाल इन दोनों के बीच की कड़ी थे। मैंने बास्केटबॉल ट्रस्ट की एक खबर लिखी, सारे दस्तावेज साथ में संलग्न कर केसवानी जी को सौंपी और कहा सर एक बार मैनेजमेंट में किसी से बात जरूर कर लीजिएगा। मुझे घूर कर देखते हुए उन्होंने कहा अरे अरविंद यदि मुझे ही किसी से पूछना पड़ा तो फिर मेरे संपादक रहने का क्या मतलब। उन्होंने दमदारी से वह खबर छापी अगले दिन सुबह जब मैनेजमेंट के फोन घन-घनाए तो उन्होंने कहा हां यह खबर मैंने ही छापी हैं। सुबह की मीटिंग में जब वे आए तो बोले अरविंद बवाल मच गया है, पर निपट लेंगे। इस खबर को भास्कर में उनके विरोधियों ने भुनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी पर वह अपने स्टैंड पर बरकरार रहे।

इंदौर में संपादक रहते हुए उन्होंने भास्कर को एक अलग कलेवर दिया। सोमवार का जो अखबार उन दिनों निकलता था उसने भास्कर को एक अलग पहचान दिलवाई। खबरों को लेकर केसवानी जी बहुत जज्बाती थे जितनी मेहनत रिपोर्टर करता था, उससे ज्यादा ताकत वे उसकी खबर को हाईलाइट करने में लगा देते थे और जब वह खबर छपती थी तो रिपोर्टर के प्रोफाइल में एक बड़ी उपलब्धि दर्ज हो जाती थी। ऐसे-ऐसे स्टोरी आईडिया उन दिनों उन्होंने अपनी टीम को दिए कि जब खबरें अखबार में छपीं तो रिपोर्टर को देशव्यापी पहचान मिली। यदि रिपोर्टर की खबर के साथ डेस्क कभी इंसाफ नहीं कर पाती थी तो फिर केसवानी जी के तेवर देखने लायक होते थे।

नए पत्रकारों को आगे बढ़ाने में उनकी बहुत रुचि रहती थी। एक छोटा सा उदाहरण है। सालों पहले चुनाव का टाइम था। अमेरिकन कॉउंसिलेट से ऑफिसर्स बात करने आये थे। उनके पास चुनिंदा पत्रकारों के नाम थे, जो उन्होंने अपने स्तर पर खोजबीन के बाद तय किये थे। निसंदेह उनमें केसवानी जी का नाम था वहीं फील्ड के उन पत्रकारों के नाम थे जो निष्पक्षता से काम करने में पहचान रखते थे। भोपाल के जहांनुमा होटल में ब्रेकफास्ट मीटिंग थी। केसवानी जी मन से कितने उदार थे ये उस वक्त जानने को मिला जब उन्होंने एक जूनियर महिला पत्रकार की ओर इंगित करते हुए कहा- ये ज्यादा घूम रही हैं- हमारी राय तो ठीक है, लेकिन इनकी ओपिनियन को आप इग्नोर मत कीजिएगा।

जब उन्हें इंदौर का संपादक बनाया गया तो कई लोग चौंक पड़े। बोले यह कैसे चला पाएंगे इस प्राइम एडिशन को। श्रवण गर्ग के कार्यमुक्त होने के एक महीने पहले केसवानी जी इंदौर आ गए थे। वह रोज शाम श्रवण जी के केबिन में आकर बैठ जाते थे और कामकाज समझते थे। टीम से काम लेने का श्रवण जी का एक अलग अंदाज था, जो केसवानी जी के मिजाज से मेल नहीं खाता था। एक दिन जब डिनर के लिए जा रहे थे तो मुझसे बोले बाहर आओ कुछ बात करना है। बोले यार यह श्रवण क्यों अपने स्टाफ को इतना तलते हैं। ऐसे ही काम लेते हैं क्या ये? और बहुत कुछ बात हुई, बात खत्म करते-करते बोले अरविंद मैं तो ऐसे काम कर नहीं पाऊंगा।

जब उन्होंने संपादक का दायित्व संभाला तो पहला काम अपनी टीम को तनाव मुक्त्त करने का किया। हर महीने में संपादक की टीम की एक मीटिंग करते, तमाम मुद्दों पर खुली चर्चा होती, अच्छे काम की तारीफ करते और जो कमी रह जाती उस पर नाराजगी भी जताते थे। लेकिन बैठक के अंत में पूरी टीम को वे दफ्तर में ही लंच करवाते थे और इसका भुगतान वे अपने पर्स से करते।

खाने और खिलाने के वे बेहद शौकीन थे। उनके चेंबर में छोटे-छोटे डिब्बों में 8-10 तरह का नमकीन हमेशा रहता था। जब नमकीन खत्म होने को होता तो वह मुझसे, सुभाष सातालकर से या अनिल त्यागी से कहते अरे मियां थोड़ा नमकीन मेरे लिए भी ले आना। कई बार वह अनिल त्यागी की टेबल पर आ जाते और मेरी ओर इशारा करके कहते आज तुम्हारा खजाना खोलो भाई और वहीं पर फिर 10-15 मिनट गपियाते हुए नमकीन का आनंद लेते।

भास्कर के संपादकों की टीम के साथ एक बार वे विदेश दौरे पर गए। उस दौर में विजय शंकर मेहता को प्रबंधन में इंदौर में तैनात किया और कहा जब तक वह लौट कर नहीं आते हैं आप अखबार का काम देखें। मेहता जी उन्हीं के चेंबर में बैठकर अखबार संभालते। जब केसवानी जी लौट कर आए हैं तो उनके चेंबर के बाहर ड्यूटी देने वाले प्यून शंकर से उन्होंने पूछा मेहता जी कहां बैठते थे। नादान शंकर ने संपादक की कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा सर यहां पर… इतना सुनना था की उनका पारा चढ़ गया और ऑपरेटर काले जी से कहा मेरी मेहता जी से बात कराओ… जैसे ही फोन कनेक्ट हुआ उसके बाद उन्होंने मेहता जी को जो कुछ कहा उसका उल्लेख यहां करना उचित नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार रमन रावल उनके बड़े घनिष्ठ मित्र थे। सालों पुराने संबंध थे दोनों के। लेकिन जब वह संपादक बन कर आए तब ना जाने क्यों उनकी रावल जी से पटी नहीं। रमणजी उस समय न्यूज एडिटर थे और सिटी का काम देखते थे। दोनों अभिन्न मित्रों के बीच दफ्तर में तल्खी देख हम लोग भी चौंक पड़ते थे।

एक बार वह भास्कर के प्रतिनिधि के रूप में अनिल महाजन के साथ आसाराम बापू का सम्मान करने गए। इसके पीछे प्रबंधन का मकसद गुजरात से जल्दी शुरू होने वाले दिव्य भास्कर के लिए आसाराम से एक नियमित कॉलम लिखवाना था। चूंकि प्रबंधन चाहता था इसलिए अपने स्वभाव के विपरीत केसवानी जी मन मारकर वहां गए। एक फोटो जर्नलिस्ट साथी ने मुझे उस मौके के फोटो उपलब्ध करवाएं जो मैंने उन्हें दिए तो मुझे घूरकर देखते हुए बोले अरे यार मैं क्या करूंगा इन फोटो को फेंको इनको। मैंने भी फोटो फाड़कर फेंक दिए।

दो चार महीने बाद अचानक एक दिन मेरी टेबल पर आए और बोले वह फोटो कहां है। मैंने कहा सर मैंने उसी समय फाड़ दिए थे, बोले मैं कुछ नहीं जानता मुझे अभी चाहिए वह फोटो। मैं भी सक्क रह गया उनका यह अंदाज देखकर। उन दिनों इंदौर के सारे फोटोग्राफर भारत स्टूडियो के कंप्यूटर में अपने फोटो सेव रखते थे। मैंने भास्कर के फोटो जर्नलिस्ट संदीप जैन को वहां भेजा और संभावित तारीख बताते हुए कहा चाहे कुछ भी हो यह फोटो आज लाना ही है, किस्मत अच्छी थी कि वह फोटो मिल गए और आधे घंटे बाद ही संदीप ने मुझे लाकर दे दिए। मैंने जब यह फोटो उनकी टेबल पर ले जाकर रखे तो उनका चेहरा देखने लायक था। मैं आज तक समझ नहीं पाया की आखिर ऐसा उन्होंने किया क्यों।

भास्कर इंदौर में हमारा साथ बहुत कम समय का रहा। अपनी मर्जी के मुताबिक काम करने वाले केसवानी जी एहसास हो गया था कि यहां कुछ लोग अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए उन्हें निपटाने में लग गए हैं। यह लोग सुधीर जी के कान भरने लगे थे। शाम को वे केसवानी जी के साथ उनके केबिन में बैठते और रात को मैनेजमेंट को डाक लगाने लगते। उस दौर में मैनेजमेंट के कुछ नजदीकी लोग इंदौर संस्करण में अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते थे और केसवानी जी के रहते ऐसा संभव नहीं था।

एक दिन अचानक उन्होंने अपना इस्तीफा सुधीर जी को फैक्स किया और दफ्तर से चले गए। जिस समय उन्होंने फैक्स किया था तब भोपाल भास्कर के मेरे एक साथी अपनी एक खबर से संबंधित फैक्स के इंतजार में मशीन के पास ही खड़े थे। जैसे ही उन्होंने केसवानी जी के इस्तीफे का फैक्स देखा मुझे फोन कर कहा आप के संपादक ने तो इस्तीफा दे दिया है। मैंने सर को फोन लगाया और कहा सर आपने तो इस्तीफा दे दिया तो वह भौंचक रह गए। बोले, तुम्हें कैसे पता चला। मैंने यह तो उन्हें नहीं बताया पर वह बोले बहुत हो गया था अरविंद नौकरी करो तो शान से करो और जब अपने मिजाज से मेल न खाए तो खुद ही छोड़ दो।

मुलाहिजा पालना उनकी फितरत नहीं थी। हर बड़ा शख्स उनसे सोच समझकर और उनका मिजाज देखकर ही बात करता था। वे किसी को बख्शते नहीं थे, चाहे वह कितना ही बड़ा आदमी क्यों ना हो। वे सालों तक भोपाल में भास्कर के मैगज़ीन एडिटर रहे। तब दफ्तर के गलियारों में उनके किस्‍से गूंजते रहते थे। उनके साथ काम करने वाले अक्सर बयां करते रहते थे कि केसवानी जी ने किस संपादक, किस स्टेट एडिटर की जमकर लू उतारी है। वे बरसों तक कॉलम लिखते रहे लेकिन अपनी शर्तों पर। किसी ग्रुप एडिटर ने फितरत के साथ इसे बंद करवाने की कोशिश भी की। लेकिन पब्लिक डिमांड ऐसी थी कि वे कुछ नही कर पाए।

मेरे डिजिआना न्यूज ज्वाइन करने की खबर जब उन्हें मिली तो बहुत खुश हुए और बोले, अब यहां लंबी पारी खेलो। कुछ महीने पहले जब उनसे बात हुई तो बेटे रौनक के लिए मुझसे कुछ संभावनाएं टटोलने को कहा। बोले अब इसे इंदौर में ही सेटल करना है। इंदौर में उनके दोस्तों की लंबी फेहरिस्त है। प्रकाश पुरोहित, रमण रावल, सुरेंद्र संघवी, डॉक्टर विनोद भंडारी और कई। पर हर जगह वे अपने दायरे में ही रहते थे।

सर, आप का अचानक इस तरह छोड़कर चले जाना मेरे लिए बड़ा व्यक्तिगत नुकसान है। जब भी मैं संकट में रहा या जब भी मुझे राय मशवरे की जरूरत थी आपने मेरा मार्गदर्शन किया। मुझे याद है जब आप स्टार न्यूज के मध्यप्रदेश के सर्वेसर्वा थे और मैं भास्कर में सिटी रिपोर्टर था। तब आपने मुझसे कहा था अरविंद स्टार न्यूज के लिए काम करो, एक खबर के ₹5000 दिलवाउंगा। साथ-साथ यह भी बोले कि देख लेना मुझे तो कोई दिक्कत नहीं है लेकिन कहीं श्रवण आपत्ति ना ले।

आप हमारी शान थे। आपने मध्य प्रदेश की पत्रकारिता को विश्व के मानचित्र पर एक अलग पहचान दिलाई। आपका काम, आपके संबंध और आपका बहुआयामी व्यक्तित्व आगे भी हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा। सर अफसोस है, अब हमसे आपस की बात करने वाला कोई नहीं रहा। केसवानी जी अब आपको हमारा
जय जय!