ब्रजेश राजपूत

मुझे अपनी पुलिस की नौकरी में होने पर उस दिन पहली बार पछतावा हुआ। जब मैंने उस अपनी बिटिया जैसी दिखने वाली बेटी पर ही डंडा चला दिया। ये हमारे पुराने मित्र थे जो इंदौर पुलिस में डीएसपी हैं और लंबे समय बाद उज्जैन में मुझे मिले तो कमरे में चाय पीते पीते ये अफसोस जता गये। और सुना गये अनसुना किस्सा।

उस दिन इंदौर में पीएससी दफ्तर के बाहर पढे लिखे बेरोजगार छात्र छात्राओं का प्रदर्शन था। हम पुलिस हमेशा की तरह बिना किसी भाव के प्रदर्शनकारियों की निगरानी में खडे थे। मैं भी उस दिन मौके पर था हमारी मांगे पूरी करो के नारों के बीच करीब पांच सौ लोग पीएससी के पुराने रिजल्ट जारी करो और नयी भर्ती लाओ के नारे लगा रहे थे। हम भी अपने विश्वविद्यालय में ऐसे ही धरने प्रदर्शन करते थे तो मुझे पुराने दिन याद आ रहे थे। मगर उस भीड़ में मेरा ध्यान खींच रही थी लंबे काले बालों वाली वो लडकी। जिसके नैन नक्श हूबहू मेरी बेटी छुटकी जैसे ही थे। जो इन दिनों दिल्ली में पढ रही है।

सर पानी ले लीजिये हमारे ड्राइवर ने ठंडे पानी की बोतल जब मुझे दी तो मैं उसे लेकर उस लड़की के पास गया और कहा लो बेटा पानी पियो बहुत गर्मी है। उसने मुस्कुराकर थैंक्यू अंकल कहा। अब मैंने उससे बात शुरू कर दी। उसने बताया कि वो रायसेन जिले के सिलवानी कस्बे में किसान परिवार की है और पिछले कुछ साल से इंदौर में पढ रही है। स्कूल में अच्छे नंबर आये तो पिता जी से जिद कर इंदौर आ गयी पढने। पीएससी की 2019 की परीक्षा में प्री और मेंस निकाला था इंटरव्यू की तारीख का इंतजार है। फिर 2020 में पीएससी का प्री दिया, पास कर मेंस दिया मगर अब तक उसका रिजल्ट भी नहीं आया तो 2021 में फिर पीएससी प्री दिया और उसका भी रिजल्ट रूका है। बोली तीन साल में तीन परीक्षा दी तीनों में पास मगर अब ओवर एज होने के कगार पर हूं। घर वाले भी अब मेरे कॉरियर की नहीं मेरी शादी की चिंता करते हैं।

कहां प्रशासनिक अधिकारी बनने के सपने इतने सालों में संजोये थे मगर धूप में धक्के खा रहे हैं। कब आप लाठी डंडे मारकर भगा दोगे कोई भरोसा नहीं। कोई सुनवाई नही है हम पढे लिखे काबिल छात्र छात्राओं की। उस पर हम किसी वर्ग कोटे में नही आते तो और दिक्कत है। आप बताइए क्या करें कितने सालों तक पीएससी ही देते रहें।यदि पास नहीं होते तो मन मानकर घर बैठ जाते मगर हम मेहनत से परीक्षा पास कर रहे हैं, पर सरकार नौकरी नहीं दे पा रही। ऐसे में ये सब ना करें तो क्या करें बताइये। ये उस लडकी का सुलगता सवाल था जो उसने मुझ पर उछाल दिया था। हडबडाकर मैंने कहा बेटा तुम्हारी बात एकदम सही है, मगर ऐसे विरोध प्रदर्शन से क्या हासिल होगा।

अंकल आप अपनी बेटी से कहते हो पढो मैंने पढ़ाई की अब रिजल्ट नहीं आ रहे तो अपने हक के लिये कुछ तो करना होगा। पीएससी दफ्तर के सामने प्रदर्शन करते हैं तो आप कहते हैं भोपाल जाओ, वहां भी हम सब मामा मुख्यमंत्री के पास भी गये थे, मगर दरवाजे से ही खदेड दिये गये। अच्छा आप यूं समझिये कि आप मेरे पापा हैं, आपने मुझे पेट काटकर पढाया लिखाया और अब इंदौर भेज दिया पढने, मैंने भी मेहनत की। ग्रेजुएशन किया। फिर पीएससी दी, प्रिलिम्स निकाला, मेंस निकाला अब नौकरी कब मिलेगी कोई बताने वाला नहीं है। ये सरकार हमारी काबिलियत की नहीं धीरज की परीक्षा ले रही हैं। आप मेरे पापा के तौर पर क्या सोचते हैं। बोलिये।

नहीं ये तो गलत है, यदि परीक्षा ली है तो तय समय पर रिजल्ट आना होगा ये मैं बोल गया। वो होशियार लडकी फिर बोली यदि सरकार आरक्षण के नियमों में फंसने पर नगरीय और पंचायत चुनावों के लिये रास्ता निकाल लेती है तो हम बेरोजगारों के लिये क्यों नहीं ऐसा करती। क्योंकि अब नेताओं के बच्चे सरकारी नौकरियों के लिये भर्ती परीक्षा नहीं देते सीधे चुनाव लड़कर सरकार में शामिल हो जाते है। समझे आप। अंकल हमें आप के बेटे-बेटी समझ कर सहानुभूति रखिये और प्रदर्शन करने दीजिये।

उस लडकी की बातें सुन कर मेरे दिमाग के तार हिल गये और मैं दूर खडा हो सोचने लगा कल को मेरी बेटी भी पढने और परीक्षा पास करने के बाद यही सवाल पूछेगी तो क्या कहूंगा। मगर ये क्या.. अचानक ही बदहवासी का आलम बन गया। कुछ प्रदर्शनकारी छात्र दफ्तर परिसर में घुसने लगे ऐसे में पुलिस के डंडे चल उठे। मैं भी उलटे पैर भागा और जो पहला डंडा एक लड़के पर घुमाया ही था कि सामने कोई लडकी आ गयी और वो उसे जा लगा। मगर ये क्या.. ये तो वही लड़की थी जो थोडी देर पहले मुझे पापा समझ कर परेशानियां बता रही थी। डंडे की चोट खाने के बाद आंसू भर कर उसने मुझे भरपूर नजरों से देखा। उसकी नजरें शायद यही बोल रही थी, क्या पापा आप भी अपनी ही बेटी को मार रहे हैं। उस दिन के बाद से मेरा मन नहीं लग रहा है, सोचता हूं इन पढे लिखे बेरोजगार काबिल बच्चों का क्या कसूर है।
(लेखक की सोशल मीडिया पोस्‍ट से साभार)
फोटो प्रतीकात्‍मक है