राकेश दुबे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 नवंबर को रोजगार मेले के तहत 71000 नवनियुक्त आवेदकों को नियुक्ति पत्र दिया। यह कार्यक्रम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुआ। इसके साथ ही देश में अलग-अलग 45 जगहों पर नियुक्ति पत्रों की हार्डकॉपी बांटी गई। आंकड़ों में तस्वीर उलटी है, जो भारत जैसे एक विकासशील देश के लिए गंभीर बात हैं।

भारत में कुल कामकाजी जनसंख्या का केवल 46 प्रतिशत हिस्सा काम करने का इच्छुक है। यह डाटा किसी और का नहीं अन्तर्रष्ट्रीय श्रम संगठन का है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी के आंकड़े तो और ज्यादा चौंकाते हैं। फरवरी, 2020 में, कोविड-19 से पहले, सिर्फ 44 प्रतिशत लोग काम करना चाहते थे। अक्तूबर, 2020 में यह संख्या गिरकर 40 प्रतिशत रह गई।

इसका मतलब काम करने लायक भारतीयों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा या तो कमाई वाले रोजगार में लिप्त नहीं है या फिर करना ही नहीं चाहता। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि कामकाजी आयु वर्ग की बहुत कम भारतीय महिलाएं नौकरीपेशा होना चाहती हैं।

अन्तर्रष्ट्रीय श्रम संगठन का डाटा हमें बताता है कि 1990 से 2006 के बीच कामकाजी वर्ग की लगभग 32 प्रतिशत महिलाएं श्रमशक्ति में भागीदार थीं जिसका सीधा अर्थ, या तो उनके पास सवैतनिक काम था या फिर वे इसे तलाश रही थीं। 2019 तक यह अनुपात गिरकर महज 22 प्रतिशत रह गया।

सीआईएमई डाटा और भी कम संख्या बताता है, इसके मुताबिक फरवरी, 2020 में, कोविड लॉकडाउन से पहले, कामकाजी महिला आयु वर्ग का सिर्फ 12 प्रतिशत हिस्सा या तो रोजगार सहित था या ढूंढ़ रहा था और अक्‍टूबर माह में यह आंकड़ा और गिरावट के बाद 10 प्रतिशत रह गया। चीन से तुलना करें तो वहां कामकाजी आयु वर्ग की 69 प्रतिशत औरतें श्रमशक्ति का हिस्सा हैं।

दुर्भाग्य यह कि, अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ भारतीय श्रमशक्ति में महिलाओं की इतनी कम भागीदारी की व्याख्या करते वक्त इसको हमारी बढ़ती अमीरी से जोड़ रहे हैं। इनका कहना है कि परम्परा के अनुसार भारतीयों को अपनी महिलाओं का घर से बाहर जाकर काम करना पसंद नहीं, लेकिन जब पैसा जरूरत बन जाए तो कोई और विकल्प भी नहीं होता।

वे कहते हैं- जैसे-जैसे भारतीय लोग गरीबी से उठने लगे, महिलाओं ने घर से बाहर निकलकर काम करना बंद कर दिया और गृहिणी बनने को प्राथमिकता देने लगीं। बढ़ती समृद्धि से गरीबों में ‘संस्कृति के प्रति चेतना’ बढ़ने लगती है, जैसे-जैसे वे आय का उच्चतर स्तर पाने लगते हैं, वैसे-वैसे उनकी महिलाएं अधिक रूढ़िवादी होने लगती हैं।

दो और बाते हैं। पहली, ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जो सिद्ध करता हो कि आय के एकदम निचली श्रेणी के परिवारों की आमदनी वर्ष 2005-06 के बाद बढ़ी हो| बल्कि तथ्य यह बताते हैं कि हालत उलटे बदतर होती गई। दूसरी, यदि बहुत कम महिलाएं नौकरीपेशा होना चाहतीं, तब तो फिर बाकियों के लिए रोजगार पाना बहुत आसान हो जाता।

लेकिन हकीकत एकदम उलट है– सीएमआईई के अक्‍टूबर माह के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि महिला बेरोजगारी दर बहुत अधिक, लगभग 30 प्रतिशत है, जो कि पुरुषों की 8.6 प्रतिशत दर से लगभग 3 गुणा से भी ज्यादा है। इसका मतलब कि कामकाजी आयु वर्ग में प्रत्येक 100 महिलाओं में केवल 10 रोजगार की तलाश करती हैं और उनमें केवल 7 को ही सवैतनिक नौकरी मिल पाती है।

हकीकत में, महिलाएं इसलिए नौकरी नहीं ढूंढ़ती क्योंकि वे पाने की आस खो चुकी हैं। इसके विपरीत जब वे गृहिणी बन जाती हैं तो पारिवारिक आय गिर जाती है, लिहाजा घरेलू खर्च में कटौती करनी पड़ती है। यह स्थिति महिला रोजगार के लिए दोहरी मार है।

निम्न मध्यवर्ग परिवार में यदि कोई औरत घर से बाहर जाकर नौकरी करती है तो हो सकता है घरेलू कामों में मदद के लिए अल्प-कालिक नौकर-सहायक रख ले। लेकिन जब वह खुद नौकरी में न हो तो सबसे पहली मार घरेलू नौकर के रोजगार पर पड़ेगी। अक्सर यह बेरोजगार हुई महिला है, जिससे आगे बेरोजगारी बढ़ती है।

दूसरी ओर पुरुषों का क्या हाल है? 2019 में, कोविड की आमद से पहले, आईएलओ के आंकड़े के अनुसार भारतीय पुरुष कामकाजी आयुवर्ग का 73 प्रतिशत, श्रमशक्ति में भागीदार था| सीएमआईई का पुरुष श्रमशक्ति डाटा बताता है कि 2019 के मध्य तक आंकड़ा 72-73 प्रतिशत के बीच रहा, जो कि अक्‍टूबर 2022 में घटकर 66 प्रतिशत रह गया।

कोविड दुष्काल से पहले, फरवरी 2020 से अक्‍टूबर, 2022 के बीच भारत में कामकाजी पुरुष जनसंख्या में 4.6 करोड़ का इजाफा हुआ था। लेकिन श्रमशक्ति में भागीदारी पहले जितनी रही, लिहाजा अतिरिक्त 3.3 करोड़ पुरुष नौकरी तलाश रहे थे। चूंकि नौकरियों की गिनती में केवल 13 लाख की वृद्धि रही, नतीजतन लगभग 3.2 करोड़ पुरुष बेरोजगार रहे।

इन आंकड़ों की सबसे संभावित व्याख्या यह हो सकती है कि भारत में गरीबों के लिए जिस किस्म के रोजगार उपलब्ध हैं, वह करने की शारीरिक सामर्थ्य उनमें नहीं है। देश में कुल रोजगार का लगभग तीन-चौथाई भाग कृषि, निर्माण और व्यापार क्षेत्र से है। इन तीनों में ही वेतन बहुत कम है और दो में तो मेहनत कमरतोड़ करनी पड़ती है।

यूरोप का अध्ययन बताता है कि यदि एक किसान आठ घंटे काम करे तो लगभग 4500 कैलोरी खर्च करता है, जबकि इसी अवधि में निर्माण कार्य में लगे मजदूर को 4000 कैलोरी की जरूरत है। भारत में निर्माण कार्य अधिक श्रमसाध्य है और इसके लिए कहीं ज्यादा खुराक-ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। यह मात्रा ग्रामीण अंचल के भारतीयों के लिए खाद्य विशेषज्ञों द्वारा अनुशंसित 2400 कैलोरी से कहीं अधिक है।

खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) का अनुमान है कि 16 प्रतिशत भारतीय कुपोषण का शिकार हैं, अर्थात‍् श्रमशक्ति में लगे गरीबों की बड़ी संख्या को सख्त मेहनत के अनुपात में जितनी कैलोरी की अनुशंसा विशेषज्ञ करते हैं, उसका आधा भी नहीं मिलता। वे किसी तरह मुफ्त के राशन या अन्य सरकारी अथवा गांववालों की मदद पर जी रहे हैं। यह एक दुष्चक्र है| जिसे टूटना चाहिए।
(मध्यमत)
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