अजय बोकिल

देश में ऑक्‍सीजन के संकट के कारण होने वाली कोरोना मरीजों की मौतों की संख्या में कुछ कमी जरूर आई है, लेकिन दवाओं की कालाबाजारी बदस्तूर जारी है। दूसरी तरफ वैक्सीन लगाने और उन्हें समय पर पर्याप्त संख्या में उपलब्ध कराने को लेकर पूरे देश में बड़े पैमाने पर मारामारी शुरू हो गई है। 18 वर्ष से ऊपर वाले सभी लोगों को कोविड वैक्सीन उपलब्ध कराने की मुख्य जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है, लेकिन वह इस संकट के जवाब में केवल आंकड़े देकर पल्ला झाड़ रही है कि वैक्सीन की कहीं कोई कमी नहीं है। अगर कहीं कोई दिक्कत नहीं है तो राज्य सरकारें (जिनमें भाजपा शासित राज्य भी शामिल हैं) वैक्सीन की अपर्याप्त आपूर्ति को लेकर क्यों हल्ला मचाए हुए हैं?

हकीकत में इन सरकारों को अपने लोगों को जवाब देना मुश्किल हो रहा है। वैक्सीन की यह समस्या बहुस्तरीय है। पहला तो जितनी जरूरत है, उसकी तुलना में बहुत कम वैक्सीन आपूर्ति हो पा रही है। दूसरे, वैक्सीन उपलब्ध न होने के कारण कई टीकाकरण केन्द्र बंद करने पड़ रहे हैं। तीसरे, कोविन एप पर रजिस्ट्रेशन के लिए भारी मारामारी है। लोगों को टीकाकरण स्‍लॉट बहुत मुश्किल से मिल रहा है। इन शिकायतों के बाद चार अंकों का वाले सिक्योरिटी कोड की व्यवस्था भी लागू की गई, लेकिन वैक्सीन लगवाने और जल्द लगवाने वालों की संख्या इतनी ज्यादा है ‍कि यह एप भी फेल हो रहा है।

एक विसंगति यह है कि 45 से ऊपर वालों के ज्यादातर स्‍लॉट्स खाली पड़े हैं, लेकिन 18 से ऊपर वालों का नंबर ही लगना मुश्किल है। सरकार इन खाली स्‍लॉट्स को 18 प्लस वालों को आवंटित क्यों नहीं कर देती? ताकि दबाव कम हो। दरअसल कोरोना की दूसरी लहर में मेडिकल सिस्टम चरमराने के बाद आम आदमी को वैक्सीन से ही थोड़ी आस है, लेकिन उसका सिस्टम भी कब सुधरेगा, कोई नहीं जानता।

पिछले माह मैंने इसी स्तम्भ में लिखा था कि केन्द्र सरकार ने जल्दबाजी में 18 से अधिक उम्र वालों के लिए राष्ट्रीय टीकाकरण चालू करने की घोषणा तो कर दी है, लेकिन यह पु्ख्ता तैयारियों के बिना शुरू किया गया अभियान है। लिहाजा अफरा-तफरी मचना तय है। दुर्भाग्य से वही हो भी रहा है। लोग घंटों लाइनों में खड़े हो रहे हैं, उसके बाद वैक्सीन खत्म की सूचना के साथ निराश घरों को लौट रहे हैं। यह स्थिति मुफ्त टीकाकरण की है। सरकार ने निजी अस्पतालों को भी ज्यादा पैसे लेकर टीकाकरण की इजाजत देने की बात कही थी, लेकिन मप्र जैसे राज्यों में वह काम शुरू ही नहीं हुआ है।

निजी अस्पतालों का कहना है कि उन्हें वैक्सीन मिले तब तो लगाएं। जाहिर है कि जो लोग पैसे देकर वैक्सीन लगवा सकते हैं, वो भी उसी लाइन में लगे हैं, जो सबके लिए है। इसकी वजह से वैक्सीनेशन पर दबाव और बढ़ गया है। उधर केन्द्र सरकार का दावा है कि भारत कोविड 19 वैक्सीन की 17 करोड़ डोज देने वाला दुनिया का सबसे तेज देश बन गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 18-44 उम्र समूह में 20 लाख 31 हजार 854 लोगों को पहली खुराक तो 45 से 60 वर्ष के समूह में 5 करोड़ 51 लाख 79 हजार 217 को पहली खुराक और 65 लाख 61,851 को दूसरी खुराक दी गई है।

आंकड़े अपनी जगह हैं, लेकिन राज्यों द्वारा अपेक्षित मात्रा में वैक्सीन मिलने और इसकी कीमतों में भेदभाव की शिकायतों को लेकर दायर याचिकाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की जमकर खिंचाई की थी। शीर्ष अदालत ने सरकार से पूछा था कि आखिर उसकी वैक्सीन नीति है क्या? लेकिन केन्द्र ने अदालत में जो हलफनामा दिया है, उसे देखकर लगता है कि कहीं कुछ ज्यादा बदलने वाला नहीं है। जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक केन्द्र ने सर्वोच्च न्यायालय में दिए हलफनामे में कहा कि ‘सरकार की वैक्सीन नीति ‘न्‍यायसंगत, गैर-भेदभावपूर्ण और दो आयु समूहों (45 से अधिक और नीचे वाले) के बीच एक समझदार अंतर कारक पर आधारित है। यह नीति संविधान सम्मत तथा विशेषज्ञों, राज्य सरकार और वैक्सीन निर्माताओं के साथ पर्याप्त चर्चा के बाद बनी है।

सरकार ने साफ कहा कि इस नीति में किसी अदालती हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। कोरोना महामारी के मामले में कार्यपालिका के पास जनहित में फैसले लेने का अधिकार है। इसके पूर्व वैक्सीन नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा था ‍कि जिस तरह केन्द्र सरकार की वैक्सीन नीति को बनाया गया है, उससे प्रथम दृष्टया जनता के स्वास्थ्य के अधिकार को हानि पहुंचेगी, जो संविधान के अनुच्छेपद 21 का एक अभिन्न तत्व है।

सरकार का कहना है वैक्सीन की दो और तीन स्तरीय मूल्य नीति में कहीं कोई गड़बड़ नहीं है। टीके के लिए आम लोगों को कोई भुगतान नहीं करना है। लेकिन यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है कि जब दोनो टीका कंपनियां केन्द्र सरकार को मात्र 150 रुपये में एक डोज दे रही हैं, जो कि सबसे सस्ता रेट है, तब केन्द्र सरकार खुद ही सारी वैक्सीन खरीदकर राज्यों और निजी अस्पतालों को क्यों नहीं दे देती? जब कंपनियां 150 रुपये में वैक्सीन देकर भी घाटे में नहीं हैं तो उन्हें राज्यों और निजी अस्पतालों को ज्यादा भाव में क्यों वैक्सीन देना चाहिए? यदि केन्द्र सरकार खुद ही सारी वैक्सीन खरीदकर राज्यों और निजी अस्पतालों को सप्लाई करे तो शायद अफरा-तफरी और शंका का माहौल कम हो। लेकिन ऐसा होने की संभावना नहीं है, इसके पीछे क्या ‘खेल’ है, यह समझने की बात है।

जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वो ऊंचे दामों पर भी वैक्सीन लगवाने को तैयार हैं परंतु उन्हें भी वैक्सीन नहीं‍ मिल पा रही है। ज्यादातर टीकाकरण केन्द्रों पर दिन में सौ से ज्यादा टीके लग नहीं पा रहे हैं, क्योंकि वैक्सीन उपलब्ध नहीं हैं। कब आएगी, यह निश्चित तौर पर बताने की ‍स्थिति में भी कोई नहीं है। जवाब यही ‍मिलता है कि ऑर्डर दिया हुआ है, आएगी तब लगेगी। नतीजा यह है कि टीकाकरण केन्द्रों पर भीड़ बढ़ती जा रही है। यह वो अनचाही स्थिति है, जिससे वही कोरोना फिर तेजी से फैलने की आशंका है और जिसे काबू में करने के लिए लोगों को वैक्सीन लगाई जा रही है।

एक संतोषजीवी तर्क हो सकता है कि भइया इतने बड़े अभियान में कुछ तो गड़बडि़यां होंगी ही। मान लिया, लेकिन यहां बुनियादी सवाल यह है कि अगर जरूरत के मुताबिक देश में वैक्सीन उपलब्ध नहीं थी या नहीं है तो 18 साल की उम्र के सभी लोगों के लिए टीकाकरण एकदम शुरू करने की क्या जरूरत थी? हड़बड़ी में यह फैसला क्यों किया गया? अगर वैक्सीन उपलब्धता के हिसाब से इसे भी चरणों में किया जाता तो शायद इतना बवाल नहीं मचता। केन्द्र सरकार ये आंकड़े तो जारी करती है कि हर दिन कितने लोगों को टीके लगे, लेकिन यह संख्या नहीं बताती कि किस राज्य से वैक्सीन की कितनी मांग आई है और हर दिन उसे कितनी सप्लाई की जा रही है तथा कितनी उसे मिल गई है। उसी प्रकार हर टीकाकरण सेंटर से यह जानकारी पहले ही मिल जाए कि वैक्सीन की उपलब्धता के हिसाब से आज कितने लोगों को ही टीका लग सकेगा तो शायद इतनी अफरातफरी न मचे।

एक समस्या और है। वैक्सीन को लेकर लोगों में अंधविश्वास और डर अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। तमिलनाडु जैसे राज्य में सुशिक्षित लोग भी वैक्सीन लगवाने से घबरा रहे हैं, वहां टीकाकरण की गति बहुत धीमी है, जबकि केरल जैसे राज्यों में वैक्सीन को जाया होने से बचाने का अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। इधर मध्यप्रदेश जैसे राज्य में गांवों में लोग कोरोना से ज्यादा वैक्सीन से डर रहे हैं। उनमें कोरोना की दूसरी लहर को लेकर कोई जागरूकता नहीं है। एक आम गलतफहमी है कि कोरोना से नहीं मरे तो वैक्सीन लगवाने से मर जाएंगे। ये लोग गांवों में मेडिकल स्टाफ व पुलिस को भी नहीं घुसने दे रहे। स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। एक समस्या यह भी है कि कई टीकाकरण सेंटरों पर कुछ लोग स्‍लॉट बुक होने के बाद भी नहीं पहुंच रहे हैं, जिससे टीके बेकार हो रहे हैं। इसे भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

हैरानी की बात यह भी है कि विपक्ष अब कोरोना चिकित्सा नीति और टीकाकरण नीति के मामले में ‘एक देश-एक नीति’ की मांग कर रहा है, वहीं तमाम दूसरे मुद्दों पर ‘एक देश-एक नीति’ की पैरोकार मोदी सरकार इस मामले में विकेन्द्रित नीति को अपना रही है, ऐसा क्यों है, इसके पीछे व्यावहारिक तकाजे हैं, राजनीति है या फिर सरकार की लाचारी है, इसका खुलासा भी जल्द होगा। तब तलक आप ऊपर वाले पर भरोसा रखिए!(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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