राकेश दुबे

यह अनुमान ग़लत था कि ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अल कायदा गुट दुनिया भर में लगातार बिखरता जा रहा है। हक़ीक़त में वक्त के साथ पाकिस्तान में अन्य आतंकी गुट उभरते गए, जिनके निशाने पर भारत तो था ही। यहां तक कि बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना के निकट सहयोग से ग्वादर बंदरगाह परियोजना बना रहे चीन को स्थानीय नागरिकों का कोपभाजन होना पड़ा। वैसे इस समूचे उप-महाद्वीप में अभी भी दो बड़े सशस्त्र एवं कट्टर इस्लामिक आतंकी गुट सक्रिय हैं, एक है अफगान तालिबान और दूसरा है इसका पश्तून हमबिरादर तहरीक-ए-तालिबान ऑफ पाकिस्तान (टीटीपी)।

ये दोनों गुट आईएसआई के निकट सहयोग से शुरू हुए और अब दोनों ही आईएसआई से खफा और खिलाफ हैं। टीटीपी का प्रभाव क्षेत्र पाकिस्तानी खैबर पख्तूनवा के कबायली अंचल में अधिक है, हालांकि कुछ संख्या पाकिस्तान के उत्तर बलूचिस्तान इलाके में भी है। सीमांत और उत्तर के जनजातीय इलाके में टीटीपी के बढ़ते प्रभाव के पीछे अफगान तालिबान का हाथ पीठ पर होना है और इससे पाकिस्तानी सरकार चिंतित और नाराज है। अनुमान है कि पिछले तीन महीनों में टीटीपी ने इस्लामाबाद में आत्मघाती हमले सहित लगभग 140 आतंकी वारदातें की हैं। फिलहाल पाकिस्तान-टीटीपी के बीच शांति वार्ता की संभावना क्षीण है।

पाकिस्तान के गृहमंत्री राणा सनाउल्लाह ने एक साक्षात्कार में कहा कि अगर अफगान सरकार टीटीपी पर कड़ी कार्रवाई नहीं करेगी तो पाकिस्तान उन्हें खुद निशाना बनाने से गुरेज नहीं करेगा। पाकिस्तान का मानना है कि अफगानिस्तान और उसके अपने कबायली इलाके में टीटीपी के तकरीबन 7-10 हजार लड़ाके हैं। उधर, अफगानिस्तान के उपप्रधानमंत्री अहमद यासीर ने पाकिस्तानी धमकी का लगभग मखौल उड़ाते हुए, ऐसा करने पर, गंभीर अंजाम भुगतने की चेतावनी दे डाली।

आगे और चिढ़ाने की खातिर 17 दिसम्बर, 1971 के दिन, बांग्लादेश युद्ध में, भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते पाकिस्तानी जनरल एएके नियाज़ी की फोटो ट्वीटर पर उन्‍होंने साझा कर डाली। टीटीपी के उद्भव के लिए और कोई नहीं बल्कि खुद पाकिस्तान जिम्मेवार है क्योंकि अपनी भूमि पर उसने जिन अफगान तालिबान की मेजबानी की, हथियार, उपकरण और सिखलाई देकर सुसज्जित किया, उन्होंने ही अपने पाकिस्तानी पश्तून भाइयों को तैयार किया है। अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के पलायन के बाद कुछ तालिबान नेता सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर हैं।

अभी तक पाकिस्तान तालिबान को अपना समर्थन देने के लिए मानता आया है कि काबुल की सत्ता में उनकी मौजूदगी से भारत के विरुद्ध सामरिक बढ़त रहेगी। यह नीति तब से जारी है जब आईएसआई की मदद से तालिबान आतंकी इंडियन एयरलाइंस की उड़ान आईसी-814 को अपहृत कर काबुल ले गए थे। हालांकि भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं दी है, लेकिन मेडिकल और अन्य मानवीय सहायता प्रदान कर यथेष्ट व्यावहारिक संबंध कायम कर रखा है, इसके लिए काबुल में एक दफ्तर समन्वय कर रहा है।

रूस और चीन की तरह भारत ने भी तालिबान के साथ संबंधों को लेकर विपरीत या नुक्ताचीनी वाला रुख नहीं अपनाया। उम्मीद है आगे भी भारत अफगान लोगों के लिए मानवीय सहायता के तहत भोजन, मेडिकल और आर्थिक मदद जारी रखेगा, किंतु तमाम पहलू ध्यान में रखकर। पाकिस्तान अब सीधे-सीधे टीटीपी लड़ाकों पर हमले की धमकी दे रहा है, जाहिर है यह चेतावनी अमेरिका की शह और मदद से है। लेकिन यह हरकत ड्यूरंड सीमारेखा के आरपार के पश्तूनों में पाकिस्तानी सेना का मुकाबला करने में एका बनाने का इंतजाम कर देगी। अनुमान है कि पिछले साल आपसी सशस्त्र संघर्ष में 374 पाकिस्तानी फौजी और 365 टीटीपी लड़ाके मारे गए हैं।

पाकिस्तान और अमेरिकी सरकारों द्वारा अफगानिस्तान की भू-राजनीतिक विषय की ओर ही ध्यान ज्यादा रखने से आम नागरिकों की हर रोज बढ़ती मुश्किलें गौण हो चुकी हैं, जबकि अमेरिका, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और अन्य मित्र राष्ट्र जैसे कि सऊदी अरब और चीन की मदद के बावजूद पाकिस्तान दिवालिया होने की ओर लगातार बढ़ रहा है। पाकिस्तान के अनुभवी और चतुर वित्तमंत्री इशाक डार, जो पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के भी पसंदीदा हैं, अपने भद्र काबीना सहयोगी और योजना मंत्री एहसान इकबाल के साथ करीबी तालमेल बनाते हुए देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए यथार्थवादी नीतियां बरत रहे हैं।

पाकिस्तान सऊदी अरब से 3 बिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता मिलने की आस लगाए बैठा है। लेकिन यह तमाम उपाय भी दीर्घ-काल में कम ही प्रासंगिक होंगे जब तक कि पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की सख्त शर्तों का पालन न करे। यदि अब भी पाकिस्तान का प्रबंधन माकूल न रहा, तो विदेशी मुद्रा भंडार से भुगतान करना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

जहां अमेरिका को पाकिस्तान का टीटीपी और तालिबान के अड्डों पर हमला करना रास आएगा वहीं तालिबान अपने हमबिरादरों पर पाकिस्तानी थलीय या हवाई हमले होते देख मुंह नहीं फेरने वाला। इसी बीच, लगता है शाहबाज़ शरीफ़ के नेतृत्व वाली सरकार पर लोगों का भरोसा उठने लगा है। हालांकि पाकिस्तान धीरे-धीरे अपने वर्तमान आर्थिक संकट से उबर सकता है, परंतु शाहबाज़ शरीफ़ सरकार को कड़े आर्थिक निर्णय लेने की जरूरत पड़ेगी, जिसका नतीजा इस साल के अंत में होने वाले आम चुनाव में महंगा पड़ सकता है।

सऊदी अरब और अन्य मुल्कों द्वारा माली सहायता के आश्वासन के बावजूद शाहबाज़ शरीफ़ सरकार के लिए आगामी दिन मुश्किल भरे होने वाले हैं। सत्ताधारियों द्वारा इमरान खान को आगामी चुनाव लड़ने के अयोग्य करार देने के प्रयासों के परिणामवश स्थिति और बिगड़ेगी।(मध्यमत)
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