राकेश अचल

सुरसा के मुंह की तरह भारत में पांव पसार रहे कोरोना की मुश्कें कसने के लिए भारत सरकार ने देर से ही सही लेकिन जो भी कदम उठाये हैं उनका स्वागत किया जाना चाहिए। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के प्रचार में उलझी केंद्र सरकार नींद से देर से जागी लेकिन जागी। उम्मीद की जाना चाहिए कि यदि सरकार के फैसलों पर पूरी ईमानदारी से काम किया गया तो कोरोना के प्रसार को रोकने में काफी मदद मिलेगी।

आपको याद होगा कि मैंने बहुत पहले देश में टीकाकरण के लिए आयु सीमा 45 से घटाकर 18 वर्ष करने की बात उठाई थी, क्योंकि ऐसा मैंने अमेरिका में होते देखा था। देश में टीकों की खुराक की किल्लत रोकने की वजह से सरकार ने पहले दूसरे टीके की मियाद में जो अवैज्ञानिक हेरफेर किया था उसे भी अब शायद सुधार लिया जाएगा क्योंकि अब देश में एक और जहां कोरोना के टीकों का दान रोका गया है वहीं दूसरी और कोरोना का निर्यात भी रोका गया है। विलायती टीकों को भारत भेजने की अनुमति भी दी जा रही है और सबसे बड़ी बात टीका बनाने वाली कंपनियों को दो माह की जरूरत के टीकों के हिसाब से सौ फीसदी भुगतान पेशगी कर दिया गया है।

केंद्र सरकार ने सियासत के चलते शुरू में जो गंभीर गलतियां कीं उन पर परदा तो डाला जा सकेगा साथ ही वास्तव में जनता को राहत भी मिलेगी। टीकाकरण अभियान में केंद्र पर दूसरे दलों द्वारा शासित राज्य सरकारों ने पक्षपात का आरोप लगाया है। ये स्वाभाविक भी है और इसमें सच्चाई भी है किन्तु अब लगता है कि व्यवस्था की रेल पटरी पर आ रही है सुकून देने वाली खबर ये है कि दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान में किसी तरह कि रुकावट न आए इसके लिए केंद्र सरकार ने भारत में टीका बनाने वाली कंपनियों सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक को दो महीने का 100 फीसदी एडवांस का भी भुगतान कर दिया गया है।

खबरों के मुताबिक,  केंद्र सरकार ने दोनों कंपनियों को कुल 4 हजार 500 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान किया है। सरकारी सूत्र बताते हैं कि कोविशिल्ड का उत्पादन करने वाले सीरम इंस्टीट्यूट के लिए 3,000 करोड़ रुपये और कोवैक्सिन का उत्पादन करने वाले भारत बायोटेक के लिए 1500 करोड़ रुपये दिए गए हैं। बता दें कि पिछले हफ्ते केंद्र ने भारत बायोटेक की बेंगलुरु फैसिलिटी के लिए भी 65 करोड़ रुपये के अनुदान को मंजूरी दी थी।।

आपको याद होगा कि हाल के हफ्तों में राज्यों में वैक्सीन के स्टॉक घट जाने से सरकार की चिंता बढ़ी हुई है। पंजाब के पास तो केवल तीन दिन का ही स्टॉक है। इधर,  आंध्र प्रदेश से खबर आई कि राज्य में वैक्सीन का स्टॉक पूरी तरह से खत्म है। वहीं इस महीने की शुरुआत में महाराष्ट्र में वैक्सीन की कमी के चलते मुंबई और पुणे सहित 100 से अधिक टीकाकरण केंद्र मजबूरन बंद करने पड़े। हालांकि,  केंद्र जोर देकर कहता रहा है कि वैक्सीन के स्टॉक में कोई कमी नहीं है।

देश में कोरोना के उपचार की कोई प्रामाणिक व्यवस्था तो पहले से ही नहीं है ऊपर से आपदा को लाभ के अवसरों में बदलने में दक्ष लोगों ने इस इलाज के नाम पर चौतरफा लूट मचा दी। दवाओं की चोरी, कालाबजारी, जमाखोरी एक साथ शुरू कर दी गयी। ऑक्सीजन की मांग बढ़ते ही अफरातफरी मच गयी जबकि दूसरी तरफ उदारमना उद्योगपतियों और स्वयंसेवी संस्थानों ने ऑक्सीजन की आपूर्ति में उल्लेखनीय योगदान दिया। व्यवस्थाएं चाक-चौबंद करना आसान काम नहीं है। लॉकडाउन से भी कोई बात बनना नहीं है उलटे अफरातफरी ही मचने वाली है। लॉकडाउन के मुद्दे पर तो हमारे उत्तर प्रदेश की सरकार और उच्च न्यायालय तक में टकराव की नौबत आ गयी है।

आज जरूरत इस बात की है कि कोरोना के आतंक को कम करने के लिए पहले तो अफवाहों को सख्ती से रोका जाये। समाचार माध्यम कोरोना के कारण होने वाली मौतों को दिखा-दिखाकर अपनी टीआरपी बढ़ाने का लोभ छोड़ें। मरीजों को उचित चिकित्सीय सलाह के लिए हेल्पलाइन नंबर बढ़ाये जाएँ ताकि अस्पतालों पर दबाव कम हो। मैं इन दिनों उस अमेरिका में हूँ जिसने कोरोना में सबसे अधिक कुर्बानी दी है, लेकिन यहां सबसे ख़ास बात ये है कि इस समय कोरोना को लेकर भारत जैसा आतंक नहीं है। यहां भी दूसरी लहर है लेकिन सब कुछ खरामा-खरामा चल रहा है। बिना उत्सव के टीकाकरण का काम जारी है। अखबारों में कोई अपनी बांह नंगी किये तस्वीरें खींचने के लिए उतावला नहीं है। टीके की इतनी खुराकें उपलब्ध हैं कि कहीं कोई मारामारी नहीं है।

अमेरिका ने सतर्कता और समझदारी से काम लिया। उसने दो टीके विकसित किये लेकिन उन्हें न बाजार में बेचा न विदेशों को दान किया। पहले अपने देश की जरूरतों को सबसे ऊपर रखा। मुझे लगता है कि इस मामले में हमसे गलती हुई। हमने तो बिहार विधान सभा चुनावों के समय से ही जब टीके का कहीं कोई आता-पता नहीं था सियासी इस्तेमाल करने की अभद्र कोशिश शुरू कर दी थी। बाद में जो कुछ हुआ उसके लिए सरकार के खूब लत्ते लिए जा चुके हैं इसलिए उन बातों को दोहराने की जरूरत नहीं है।

कोरोना प्रतिरोध के अभियान में अब जन प्रतिनिधियों ने भी अपना रुख बदला है। विधायक, सांसद अपनी-अपनी स्वेच्छानुदान निधि का पैसा कोरोना के इलाज पर और अन्य संसाधन जुटाने पर खर्च कर रहे हैं। महाराष्ट्र में भाजपा ने जरूर फिर से गलती की है, इसे केंद्र समय रहते सुधार सकता। आज जरूरत इस बात की है कि कोरोना के टीके तब तक खुले बाजार में न लाये जाएँ जब तक कि सरकार इस बात से संतुष्ट न हो जाये कि अधिकांश आबादी को टीका मिल चुका है और केवल वे ही लोग रह गए हैं जो खरीदकर टीका ले सकते हैं।

भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े पोलियो टीकाकरण अभियान का अनुभव है, इसलिए कोरोना टीकाकरण अभियान के नाकाम होने की कोई गुंजाइश नहीं है। रोटरी, लायंस क्लब जैसी संस्थाएं इस काम में सरकार का हाथ बंटाने के लिए आगे आएं तो काम कम समय में पूरा हो सकता है। हमारे देश में युवाओं की संख्या का प्रतिशत दुनिया में सबसे ज्यादा है इसलिए उन्हें भी सुरक्षा चक्र में शामिल कर सरकार ने समझदारी की है। अब टीकाकरण को एक अनिवार्य राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाकर निजी अस्पतालों को भी इसमें शामिल किया जाये। ये निजी अस्पताल बिना बेईमानी के जनता को निशुल्क टीके लगाएं,  सरकार ज्यादा से ज्यादा निजी चिकित्सा संस्थानों को टीकाकरण के लिए जरूरी खर्च मुहैया करा सकती है। टीका गांव-गांव, गली-गली तक पहुंचना चाहिए। (मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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