नारद जयंती पर विशेष

जयराम शुक्ल

भारतीय वांग्मय को कथारस की स्थिति में लाने का श्रेय जिस किसी एक ऋषि को दिया जा सकता है, वे हैं देवर्षि नारद। वे देव पुत्र हैं, ऋषि मात्र नहीं। एक मात्र देवर्षि हैं। महर्षि, राजर्षि, ब्रह्मर्षि की होड़ में भले ही अनेक हों, नारद अकेले छत्तीस करोड़ देवताओं के ऋषि हैं। अत: उनकी उपस्थिति प्रत्येक जगह अपरिहार्य है, सारे देवों एवं तीन लोकों के हित की उन्हें चिन्ता है। वे वक्त बेवक्त कहीं, किसी देवता के शयनागार तक साधिकार पहुंचकर राय-सलाह कर सकते हैं। पुराणों में हर समस्या में कहीं न कहीं सूत्रधार या संवाददाता के रूप में वे उपस्थित हैं। देव तो देव, नारद को दैत्य, दानव, राक्षस, गंधर्व भी ससम्मान आसन देते हैं। आकाश-पाताल और पृथ्वी लोक तक उनकी आवाजाही है, कहीं कोई रोक-टोक नहीं।

सतयुग, त्रेता, द्वापर की पौराणिक कथाओं में तो नारद हैं ही, कलियुग में भी उनका बराबर हस्तक्षेप रहा है। रामायण और भगवत कथा के प्रेरक होकर उन्होंने वैष्णवी और भागवत-भक्ति का प्रचार भी किया। नारद भक्ति के सूत्रधार है। नारदीय भक्ति योग उनकी वीणा का एकमात्र स्वर है जिसमें हमेशा ‘श्रीमन्नारायण नारायण हरि हरि’ का निनाद ध्वनित होता रहता है। लोक भाषा के आदिकाव्य का नायक देवता नहीं हो सकता। वाल्मीकि संशय में हैं, मानवगुणों से युक्त किसी पुरुष के बारे में जानने के लिए नारद के पास जाते हैं, पूछते हैं- इस समय संसार में गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ व्यक्ति कौन है, समस्त प्रजाओं का हितैषी कौन है। नारद राम के गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं- वह वीरता में विष्णु के समान, देखने में चन्द्रमा के समान प्रिय, क्रोध में कालाग्नि, क्षमा में पृथ्वी के समान हैं। प्रजा के हित में लगे रहते हैं। कथा का आदि सूत्र वाल्मीकि को बताते हैं।

तमाम पुराणों को लिखने के बाद भी व्यास को चैन और शांति नहीं मिली। नारद ने उन्हें श्रीमद्भागवद लिखने की प्रेरणा दी। रास पंचाध्यायी में जीव और भगवान के तादात्म्य की कथा नारदीय भक्ति का सम्यक योग है। किसी का गर्व चूर करना, सर्वशक्तिशाली को भी पटखनी देना, सुखा-दुख में लोगों के साथ होना नारद का स्वभाव है। वे जितेंद्रिय हैं। काम के बाण भी उनको बिद्ध नहीं कर सके। भक्ति साधना से उन्होंने यह सम्भव कर दिखाया।

जितेंद्रिय होने का दर्प उन्होंने सभी से बताया। शिव ने उन्हें सलाह दी कि विष्णु से कभी इस घटना की चर्चा न करना। नारद भला अपनी उपलब्धि को कैसे रोकें। विष्णु को सगर्व कामजित होने की बात बता दी। फिर नारद की जो गति हुई वह आप सबको पता है। नारद ने विष्णु को क्या नहीं कहा- परम सुतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करौं तुम सोई। पर सम्पदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरे इरषा कपट विशेखी। मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरि विष पानि करायहु। लेकिन सीता विरह में व्याकुल राम को वन में देख अपने से अपने शाप से दुखी भी होते हैं।

नारद की वीणा आदिकाल से आज तक बजती रही है, बजती रहेगी। वे हर काल में हैं। हिमवान की कन्या पार्वती की हाथ-रेखा का फल बताते हैं। रानी के दुख का शमन भी करते हैं फिर भी कहने से नहीं चूकते..˜नारद का मैं काह बिगाड़ा.. कि उन्होंने ऐसा भविष्य बताया। भविष्य जानने की चाहत रखने वालों के लिए नारद जैसा ज्योतिषी ही चाहिए।

शास्त्र और पुराणों में नारद ज्ञान, भक्ति और कर्म के समन्वयक हैं। वे सम्वदिया भी हैं, लेकिन पेड नहीं है। हर सम्वाद तीसरे चौथे व्यक्ति तक जाते-जाते मूल सम्वाद से अलग हो जाता है, यह व्यक्ति की रुचि और प्रकृति पर निर्भर करता है। नारद को लोक ने शास्त्र से भिन्न समझा। नारद लोक का मुहावरा है। उनको इधर का इधर और उधर का इधर करने वाला, परस्पर लड़ाने वाले के रूप में जाना। लोक की मान्यता है कि नारद स्वभावत: कलह प्रिय पात्र हैं- जा दिन नारद कछू न पामा। हाड़ फेंकि दुइ कुकुर लड़ामा। वे कंस को देवकी के आठवें गर्भ का गणित इस तरह पढ़ाते हैं कि कंस आठवें संतान तक प्रतीक्षा नहीं करता। पहले गर्भ से ही हत्या करना शुरू कर देता है।

नारद से संबंधित शास्त्रों और लोक में अनेक कथाएं हैं। वे निरंतर चलने वाले ऋषि है। अपना अभीप्सित कहने के बाद वे क्षण भर भी समय बर्बाद नहीं करते। नारद राय देते भी हैं, राय स्वीकारते भी हैं। यूं उनके आराध्य नारायण (विष्णु) हैं लेकिन ब्रह्मा और शिव भी उनको आदर देते हैं। शास्त्र की राय से हटकर लोक में भी उनकी राय के अनेक रोचक प्रसंग हैं। नारद दस पन्द्रह पल (मिनट) से अधिक कहीं नहीं रुकते, उनके शापित होने की कथा को लोक कुछ इस प्रकार कहता है- कैलाश पर्वत पर निवास करते शिव अपने परिवार के साथ मस्त हैं। मनोरंजन के लिए पांसे का खेल है। वही पांसा जिसकी एक चाल ने महाभारत की भूमिका रची। शिव की टीम में चार व्यक्ति है, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और वे स्वयं। शिव के साथ कार्तिकेय और पार्वती के साथ गणेश की जोड़ी बनी।

खेल में शिव हारते रहे और हर बार उनका बैल, कार्तिकेय का मोर पार्वती जीत लेतीं। कैलास भी जीत लेतीं। शिव भोले थे, पर दुखी थे। एक दिन विष्णु के पास पहुंचे। त्रैलोक्यनाथ ने शिव का उदास चेहरा देखा। नारद भी बैठे थे, भ्रमण से लौटे थे। विष्णु ने कहा क्या बात है भोलेनाथ! आप कुछ उदास क्यों हैं। शिव ने बताया कि मैं पार्वती से लगातार हार रहा हूं। मेरा अहं आहत है क्या करूं। विष्णु और नारद दोनों हंस पड़े बोले दुखी न हो हम दोनों मदद करेंगे। यह पुरुष-अस्मिता का सवाल है- चलो मैं पासा बन जाता हूं, नारद गोट बन जायेंगे। जो भी दांव मांगकर आप पांसा फेंकेंगे मैं उलटकर वहीं हो जाऊंगा। नारद ने कहा यदि एक दो घर आगे पीछे भी बात होगी मैं सरक कर मार के स्थान पर पहुंच जाऊंगा।

जल्दी-जल्दी बिसात बिछी। गणेश नहीं थे। पार्वती ने प्रतीक्षा करने की बात कहीं। शिव ने कहा आप गणेश का दांव भी फेंकती चलना। खेल शुरु हुआ, नारद और विष्णु ने अपना वचन निभाया। कुछ ही क्षण में पार्वती सब कुछ हार गयीं। तभी गणेश आ गए, उन्होंने ध्यान से देखा, स्थिति समझकर बोले- मां तुमसे छल किया गया। मारे डर के विष्णु और नारद हाथ जोड़कर पार्वती से क्षमा मांगने लगे। पार्वती ने शाप दिया- विष्णु से कहा जिस पत्‍नी को हराने के लिए आपने यह किया अपनी पत्‍नी के लिए आप वन-वन भटकेंगे। नारद को कहा कि पांसे की गोट कभी स्थिर नहीं रहती आप भी निरंतर भागते रहेंगे। कहीं ठिकाना नहीं होगा। शिव को भी पार्वती ने नहीं बख्शा बोली जिस स्त्री को हराने के लिए आपने इतना प्रपंच रचा। उससे आप कभी जीत नहीं पायेंगे, वह सदा आपके सिर पर सवार रहेगी। गंगा शिव के सिर पर बैठी है।(मध्‍यमत)
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