राकेश दुबे

देश और राज्यों की सरकारें यूरोपियन यूनियन के देशों में अप्रवासी भारतीयों की अधिक गिनती होने से खुश हैं। अप्रवासी भारतीयों की संख्या हर दिन बढ़ रही है है। इटली के राजदूत के इस तमगे के बाद तो सरकार के पांव जमीन पर नहीं ठहर रहे हैं कि “भारतीय कामगारों का योगदान इटली की आर्थिकी में अभिन्न है, खासकर कृषि और डेयरी क्षेत्र में।“ ऐसी ही बातें अन्य देशों से भी आती है। देश और राज्यों की सरकारों से प्रश्न यह है कि भारत से इतना पलायन क्यों? और देश में रोजगार के हालात कब सुधरेंगे?

सिर्फ इटली में अप्रवासियों की संख्या में दस गुणा से अधिक वृद्धि हुई है, जो कि वर्ष 1991 में महज 20 हजार से बढ़कर इस साल 2.1 लाख हो चुकी है। भारतीयों का पलायन इटली के अलावा कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूके, यूएसए इत्यादि देशों की ओर भी हो रहा है। वीसा चाहने वालों की लंबी पंक्ति दूतावास के बाहर और लंबी होती जा रही है और यह रोज का मंजर है।

यही हाल अन्य देशों में जाने की हसरत का है। देश में विदेश अपने उप-दूतावास का विस्तार इसलिए कर रहे हैं ताकि वीसा संबंधी काम जल्द निपट सकें। यहां सरकार से सवाल करना प्रासंगिक होगा कि देश के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बनाने के मामले में उसने क्या किया है। विदेशों की ओर हो रहा पलायन वापसी करवाने के वादों का क्या हुआ?

विदेशों को लगी दौड़ न केवल देश के लिए बहुत बड़ी आर्थिक हानि है, बल्कि हमारी युवा शक्ति और भविष्य के खतरे को भी इंगित करने वाली है, क्योंकि युवाओं को यहां पर कोई आस नज़र नहीं आ रही है। रोजगार सीमित हैं। पहले विदेशों का रुख अधिकांशतः किसानों के बच्चे करते थे, जो सिकुड़ते खेतों और कमाई के विकल्‍पों के मद्देनज़र पलायन करने लगे। आज कारोबारी, व्यापारी और यहां तक कि नौकरीपेशा तबके के बच्चे भी पश्चिमी देशों की ओर जाने लगे हैं।

इस लगातार बढ़ते घाटे को थामने का उपाय रोजगार के अच्छे अवसर बनाना है। यह काम या तो सरकारी नौकरियों के जरिए या फिर निजी क्षेत्र में काम-धंधे पैदा करके होगा। इनमें भी ज्यादा संभावना निजी क्षेत्र में है। इसलिए सवाल जो होना चाहिए वह यह है कि इसके लिए किया क्या जा रहा है? सूक्ष्म, लघु, छोटे, मध्यम एवं विशाल उद्योग-कारोबार को पनपने के लिए मुफीद माहौल कैसे बनाया जा रहा है?

यहां बात केवल सरकार से मिलने वाले फंड की नहीं है बल्कि सरकार की भूमिका बतौर माहौल प्रदाता अधिक है। देखना होगा कि यह कितना निवेश का स्वागत वाता और कितना उत्साहित करने वाला है?  विदेशी सरकारों द्वारा निवेशकों के लिए पलक-पांवड़े बिछाने की असंख्य कहानियां हम सुनते हैं। यह इसलिए क्योंकि वे जानते हैं कि पीछ-पीछे रोजगार के अवसर खुद-ब-खुद पैदा होंगे और उनके समाज में खुशहाली आएगी।

भारत में हम मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के लिए सारे गुणा-भाग करने में बहुत निपुण हैं। पर क्या किसी ने रोजगार और जिलावार या क्षेत्रवार निवेश लाने की जहमत की है? या फिर इसकी अहमियत ही नहीं है? सरकारें अप्रवासी भारतीयों का राज्य एवं केंद्र स्तरीय सम्मेलन आयोजित करती है पर नतीजे नहीं आते। क्यों?

‘केवल जुबानी-कलामी बातें और ठोस नीति कुछ नहीं’ वाले ये आयोजन महज मीडिया कवरेज पाने तक सीमित रहते हैं। आज, देश में नया निवेश तो क्या आना, उलटे अप्रवासी यहां की अपनी सम्पत्तियां बेचने में लगे हैं। जब इटैलियन राजदूत को पंजाब के साथ खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी फार्मिंग, कृषि मशीनरी और कोल्ड चेन पैकिंग के क्षेत्र में संयुक्त उपक्रम करने में असीम संभावनाएं दिखाई दे रही हैं तो क्या देश की सरकार में किसी को यह सुनाई नहीं दे रहा? क्या इस पर काम करने के लिए कोई योजना बनी है?

भारत में तकरीबन कई विदेशी कंपनियां हैं, अधिकांशतः महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, दिल्ली और कर्नाटक में। मध्यप्रदेश सहित अन्‍य राज्‍यों में क्यों नहीं? इसका जवाब चाहिए। इटैलियन राजदूत के विचारों को इतने विस्तार से बताने का कारण केवल उस पैमाने की महत्ता गिनाना है जिसमें विशालकाय ऑस्ट्रेलिया-कनाडा का निवेश और मानव संसाधन के जरिए संयुक्त उपक्रमों को बढ़ावा देने वाली सरकारों को जोड़ लिया जाए तो कितना हो सकता है।

केंद्र सरकार ने करोड़ों नौकरियां देने का वादा किया था। यह तमाम नौकरियां अब कहां गईं? कई राज्यों में सशस्त्र बलों में भर्ती होने की रिवायती रोजगार संभावना भी नाकाफी है। इन राज्यों के युवा विदेश का रुख करने लगे हैं। एक सांसद महुआ मित्रा ने राष्ट्रीय सांख्यिकी विभाग के आंकड़ों का हवाला देते हुए संसद में कहा है कि अक्तूबर माह में देश का औद्योगिक उत्पादन 4 प्रतिशत घटा है जोकि पिछले छह महीनों का न्यूनतम है और विनिर्माण क्षेत्र, जो आज भी रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है, इसमें भी 5.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है।

महुआ ने हमारे सामाजिक ताने-बाने के एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र के आंकड़ों के हवाले से कहा कि लगभग 2 लाख लोगों ने 2022 के पहले 10 महीनों में भारतीय नागरिकता त्याग दी है। जबकि पिछले नौ साल के दौरान यह संख्या कुल मिलाकर 12.5 लाख थी। इन आंकड़ों से कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि विदेशी नागरिकता लेने वालों में अधिसंख्य मध्य-स्तर के कारोबारी है।

सही बात यह है एक ओर केंद्र सरकार युवाओं के लिए यथेष्ट संख्या में रोजगार पैदा करने में विफल रही है तो दूसरी ओर बड़े और मध्यम कारोबारी घराने अपने काम-धंधों को मुनाफादायक बनाने में असफल हुए हैं और कर्ज माफी पा गए, हम आम लोगों के लिए क्या? साथ ही बड़ा सवाल है अर्थव्यवस्था और रोजगार का क्या होगा? लाखों युवा बेकार घूम रहे हैं जो नशा बेचने वालों व अपराधी टोलों का आसान निशाना हैं।

पड़ोसी देशों से आने वाले मादक पदार्थों की भरमार है। देश में अपराध और अपराधी फल-फूल रहे हैं, आम नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है। तमाम मुख्य शहरों और यहां तक कि छोटे शहरों से रोजाना अखबारों में दिमाग को सुन्न कर देने वाली संख्या में बलात्कार, हमले, चोरियों इत्यादि के मामले पढ़ने को मिलते हैं। समय आ गया है कि सरकारें संस्थानों और प्रशासनिक तंत्र की मशीनरी की आजादी सुनिश्चित करें और इनका इस्तेमाल साझा अच्छाई के लिए करें।(मध्यमत)
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