राकेश अचल

भ्रष्टाचार से जूझता भारत हो या भ्रष्टाचार का जनक और कोई देश, सब जगह सरकारें असहाय और निरीह हैं। आदमी की जिंदगी के लिए जरूरी दवाएं पूरी दुनिया में बेतहाशा मंहगी हो रही हैं लेकिन न भारत इन पर लगाम लगा पा रहा है और न अमेरिका।

पिछले दिनों मैंने इसी विषय पर सप्ताहांत प्रेस कॉन्फ्रेंस में राष्ट्रपति जो बाइडेन को निरीह देखा तो मुझे लगा कि मुनाफाखोर आतंकियों से भी बड़े आतंकी है। बाइडेन ने तस्लीम किया कि दवा निर्माताओं ने बिना कोई नया शोध और दवाओं में कोई नया घटक बढाए दवाओं की कीमतों में 30 फीसदी तक की वृद्धि कर दी। कुछ उत्पादों पर तो पांच सौ गुना ज्यादा तक मुनाफा कमाया।

दवा उद्योग की मनमानी का यही आलम भारत में भी है। कोरोना काल में हमने दवा निर्ममता और सरकार की असहाय स्थिति को नंगी आंखों से देखा। सरकार दवा उद्योग को जितनी राहत देती है उसके अनुपात में मरीज तक राहत नहीं पहुंच पा रही है। तमाम कानून एवं अदालतें इस मामले में असहाय नजर आती हैं।

सरकार ने मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध करवाने के लिए कानून में संशोधन किया। इसके बाद डॉक्टर्स को मरीजों के लिए सिर्फ जेनेरिक दवा लिखनी थी, न कि किसी विशेष ब्रांड या कंपनी की। इसके बाद भी मरीजों को सस्ती दवाएं नहीं मिलीं, क्योंकि जेनेरिक दवाओं पर छपने वाली कीमत पर कोई नियंत्रण नहीं है।

सब जानते हैं कि कि ब्रांडेड मेडिसिन पर फार्मासिस्ट को 5 से 20 प्रतिशत तक कमीशन मिलता है, पर जेनेरिक मेडिसिन की प्रिंट रेट और रीटेलर की खरीद कीमत में 50 गुना से 350 गुना तक का अंतर होता है। 10 पैसे की बी कॉम्प्लेक्स 35 रुपए तक में बिकती है। इसका आम जनता या मरीजों को उतना फायदा नहीं मिलता, जितना मिलना चाहिए। ऐसे में सरकार को जेनेरिक मेडिसिन के प्रिंट रेट पर भी लगाम लगाने की जरूरत है, वरना जनता को कोई फायदा नहीं होने वाला।

विशेषज्ञ बताते हैं कि आम तौर पर सभी दवाएं एक तरह का ‘ केमिकल सॉल्ट” होती हैं। इन्हें शोध के बाद अलग-अलग बीमारियों के लिए बनाया जाता है। जेनेरिक दवा जिस सॉल्ट से बनी होती है, उसी के नाम से जानी जाती है। जैसे- दर्द और बुखार में काम आने वाले पैरासिटामोल सॉल्ट को कोई कंपनी इसी नाम से बेचे तो उसे जेनेरिक दवा कहेंगे।

वहीं, जब इसे किसी ब्रांड जैसे- क्रोसिन के नाम से बेचा जाता है तो यह उस कंपनी की ब्रांडेड दवा कहलाती है। चौंकाने वाली बात यह है कि सर्दी-खांसी, बुखार और बदन दर्द जैसी रोजमर्रा की तकलीफों के लिए जेनरिक दवा महज 10 पैसे से लेकर डेढ़ रुपए प्रति टैबलेट में मिलती  है वहीं ब्रांडेड कारोबार में यही दवा डेढ़ रुपए से लेकर 35 रुपए में।

जेनेरिक दवाओं को लेकर भारत और विदेशों में काफी अंतर है। 2007 के बाद से पेटेंट कानून में कोई प्रभावी संशोधन नहीं हुआ। दूसरी बड़ी बात यह है कि सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली दवाओं की कीमतों में भी भारी अंतर होता है। खास तौर पर इनकी प्रिंट रेट और खरीद कीमत में बहुत फर्क होता है। ऐसे में सरकार को इन दवाओं की एवरेज प्राइसिंग करनी चाहिए। इससे दवाओं की कीमतों में बड़ा फर्क आ जाएगा। अभी किसी भी मरीज का दवाओं पर औसत खर्च 180 फीसदी ज्यादा है।

भारत में एक ही कंपनी जेनेरिक और ब्रांडेड, दोनों दवाएं बनाती है, लेकिन उनकी कीमतों में काफी अंतर होता है। ऐसे में अगर सरकार लोगों को या मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध करवाना चाहती है तो उनकी कीमतों पर नियंत्रण जरूरी है। जेनेरिक दवाओं के मामले में भी बड़ा खेल होता है, खासतौर पर सरकारी खरीद या अस्पतालों में खरीदी जाने वाली दवाओं के मामलों में।

केंसर की दवाओं में तो और बड़ा घल्लूघारा है। कई जानलेवा बीमारियों जैसे एचआईवी, लंग कैंसर, लीवर कैंसर जैसी बीमारियों में काम आने वाली दवाओं के ज्यादातर पेटेंट बड़ी-बड़ी कंपनियों के पास हैं। वे इन्हें अलग-अलग ब्रांड से बेचती हैं। अगर यही दवा जेनेरिक में उपलब्ध हो तो इलाज पर खर्च 200 गुना तक घट सकता है।

जैसे- एचआईवी की दवा टेनोफिविर या एफाविरेज़ की ब्रांडेड दवा का खर्च 2,500 डॉलर यानी करीब 1 लाख 75 हजार रुपए है, जबकि जेनरिक दवा में यही खर्च 12 डॉलर यानी महज 840 रुपए महीने तक हो सकता है। हालांकि, इन बीमारियों का इलाज ज्यादातर सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में होता है। ऐसे में ये दवाएं इन अस्पतालों में या वहां के केमिस्ट के पास ही मिल पाती हैं।

जाहिर है कि दवाओं को मुनाफाखोरी की हवाओं से आजाद कराना आसान नहीं है। हकीकत ये है कि किसी भी मरीज के इलाज के दौरान होने वाले खर्च का 70 फीसदी अकेले दवाओं पर खर्च हो जाता है। भारत में तो इलाज और दवा पर होने वाले खर्च की वजह से देश में हर साल 3 करोड़ 8 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। सरकार ने खुद लोकसभा में ये बात मानी थी।(मध्यमत)
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