राकेश दुबे

निश्चित ही यह आंकड़े ह्रदय विदारक है। भारत में दुर्घटनावश एवं आत्महत्या में मरने वाले लोगों की राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो रिपोर्ट-2021 सामने है। यूँ तो यह रिपोर्ट इस साल अगस्त में जारी हुई है। जो यह दर्शाती है कि पिछले साल देश भर में 13000 से अधिक छात्रों ने जान दी है। वास्तव में, 2016-2021 के दौरान छात्र-आत्महत्या के मामलों में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

1832 मौतों के साथ महाराष्ट्र सूची में सबसे ऊपर है, इसके बाद मध्य प्रदेश (1,308) तमिलनाडु (1246) आते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले पांच सालों में छात्र आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। अफ़सोस सरकारें दुःख व्यक्त करने से अधिक कुछ भी नहीं कर रहीं हैं।

हाल ही में राजस्थान के कोटा में दाखिला परीक्षा की तैयारी कर रहे तीन किशोर छात्रों द्वारा की गई आत्महत्या ने पूरे देश को सकते में डाल दिया। उनमें दो, अंकुश और उज्ज्वल बिहार से थे और दोस्त भी, जो अगल-बगल कमरों में रहते थे। एक इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा था तो दूसरा मेडिकल कॉलेज में दाखिले की। दोनों ने फंदा लगाकर जान दे दी। तीसरा छात्र प्रणव मध्य प्रदेश से था और राष्ट्रीय योग्यता उर्फ प्रवेश परीक्षा (स्नातक) यानी ‘नीट’– जो कि मेडिकल कोर्स में प्रवेश पूर्व इम्तिहान है– की तैयारी कर रहा था। उसने जहर खाकर जान दे दी।

छात्रों पर पड़ने वाले चरम दबाव को ये मौतें दर्शाती हैं। कोटा के कोचिंग केंद्र लंबी अवधि वाले पढ़ाई घंटे, तिस पर अनेकानेक एसाइन्मेंट्स लादने और अत्यंत स्पर्धात्मक आंतरिक परीक्षाएं करवाने के लिए कुख्यात हैं। इनके जरिए यह तय किया जाता है कि क्या कोई छात्र ‘तरक्की’ करके और ऊंचे बैच में बैठने लायक है या नहीं। इनमें नामी-गिरामी अध्यापक तैयारी करवाते हैं। देश के सर्वोत्तम शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए विद्यार्थी को परीक्षा में बहुत अच्छा कर दिखाना जरूरी हो जाता है। बहुत से छात्र अति सघन पाठ्यक्रम को संभाल नहीं पाते क्योंकि उनकी प्राथमिक शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा की पढ़ाई में बहुत बड़ा अंतर होता है।

कोटा कोचिंग सेंटर्स के गढ़ के तौर पर जाना जाता है, जहां पर इंजीनियरिंग और मेडिकल परीक्षा की प्रतियोगिता की तैयारी करवाई जाती है। देश के दूर-दराज और छोटे शहर-कस्बों के लगभग 1.5 लाख विद्यार्थी कोटा में चल रहे लगभग 100 निजी कोचिंग केंद्रों में पढ़ते और रहते हैं। पिछले कुछ सालों से, छात्रों द्वारा खुदकुशी की संख्या में चिंताजनक इजाफा हुआ है। इस साल कोटा में 14 छात्रों ने आत्महत्या की है। पिछली बार इतनी बड़ी संख्या 2018 में थी जब 19 विद्यार्थियों ने जान दी। वर्ष 2016 में यह गिनती 17 थी। यह घटनाएं बारम्बार हो रही हैं।

वैसे भी इन तैयारी कोर्सों की बहुत अधिक फीस होना भी विद्यार्थियों और माता-पिता पर बहुत बड़ा बोझ है। सालाना फीस 1.5-5 लाख के बीच है। वास्तव में, अनेक मर्तबा यह फीस वे बहुत मुश्किल से इकट्ठा कर पाते हैं, कभी कर्ज लेकर या फिर पारिवारिक गहने-संपत्ति गिरवी रखकर, इससे अभिलाषी छात्रों पर बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक दबाव बन जाता है। सही मायने में केंद्र सरकार देश के शिक्षा तंत्र में सुधार करने में विफल रही है, प्रतियोगी परीक्षा-आधारित कोचिंग केंद्र में जाना मानो सामान्य नियम बन चला है।

कोंचिग केंद्रों की करतूतों पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। 2015 में राजस्थान सरकार ने कोचिंग केंद्रों के लिए नियम बनाए थे। इनके अंतर्गत उन्हें दबाव-रहित माहौल बनाए रखना और छात्रों को आमोद-फुर्सत लायक समय देना और हफ्ते में कम से कम एक दिन का अवकाश देना अनिवार्य है। इसके अलावा सरकार ने संस्थानों को निर्देश दिए थे कि कक्षा का आकार मौजूदा लगभग 200 विद्यार्थियों की संख्या से घटाकर 80 से अधिक न होने पाए। वर्ष 2019 में, राज्य सरकार ने एक कमेटी बनाई जिसका काम कोचिंग केंद्रों को नियमबद्ध करना और छात्रों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने के लिए बनाए जाने वाले कानून हेतु सुझाव देने थे। हालांकि रिपोर्ट में क्या है वो आई भी की नहीं, यह आज तक नहीं बताया गया।

जरूरत इस बात की है कि इस त्रासदी को रोकने का उपाय करने के लिए त्वरित कदम उठाए जाएं, जिसमें सभी संबंधित पक्ष शामिल हों यानी छात्र, अभिभावक, अध्यापक, संस्थान और नीति-निर्माता। शिक्षाविद‍् लंबे समय से भारत में किसानों द्वारा की गई आत्महत्या को कृषि संकट से जोड़ते आए हैं, अब समय आ गया है कि सिविल सोसायटी छात्र-आत्महत्या को देश के शिक्षा तंत्र में व्याप्त गंभीर संकट के तौर पर देखना शुरू करे।(मध्यमत)
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