अभी कल ही की बात है कि मैं परिवार के साथ लंबे अरसे के बाद न्यू मार्केट गया था। कितना बदल गया है सब कुछ! ऐसा लगता है हम किसी बड़े महानगर के बड़े बाजार में आ गए हैं। मैंने जब से होश संभाला है तब से मैं न्यू मार्केट जा रहा हूं। बचपन में मां पिताजी के साथ न्यू मार्केट में कागज की फिरकनी और रंगीन चश्मा खरीदने की यादें आज भी दिमाग में ताजा है। फिर जैसे-जैसे बड़ा होता गया वैसे-वैसे स्कूल की कॉपी किताब या अन्य कुछ सामान लेने अकेले ही न्यू मार्केट जाना होता था।

बड़ा होकर जब MACT में पढ़ने लगा तब भी रोज शाम को न्यू मार्केट जाना जीवन का एक हिस्सा सा बन गया था। चाहे ज्ञान भारती से ड्राइंग और स्टेशनरी का सामान लेना हो या फिर हॉस्टल के दोस्तों से न्यू मार्केट में मिलकर सेशनल की अदला बदली करनी हो। न्यू मार्केट मानो जरूरत की सभी चीजें मिलने के साथ-साथ यार दोस्तों के मिलने मिलाने का स्थान भी हो गया था। गृहस्थ आश्रम में आने के बाद तो आए दिन परिवार की सारी जरूरतों को पूरा करने के लिए न्यू मार्केट जाना ही पड़ता था।

भोपाल के राजधानी बनने के बाद ही न्यू मार्केट का विकास प्रारंभ हुआ। सन 1965 के आसपास न्यू मार्केट के सामने और पीछे की लाइन में अलग-अलग प्लॉट लोगों को दिए गए। जिस पर सामान्यतया लोगों ने नीचे दुकान ऊपर मकान का निर्माण किया। उस समय सारी दुकानें ना बनी होने के कारण बीच-बीच के खाली प्लॉटों में से भी न्यू मार्केट के अंदर जाना-आना संभव होता था। अंदर ठेलों पर सब्जी और अन्य फुटकर सामान मिला करता था।

कुछ वर्षों बाद नगर निगम द्वारा सब्जी बेचने हेतु चबूतरों और उसके ऊपर शेड का निर्माण नहीं किया गया। जो बाद में शहरीकरण के बढ़ते हुए दबाव के कारण छोटी-छोटी दुकानों में तब्दील हुआ। जिन्हें आज तोड़कर नगर निगम द्वारा बहु मंजिली दुकानों का निर्माण,चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है।

जब भी घर पर कोई मेहमान आते, तो उनको न्यू मार्केट अवश्य घूमना होता था। सभी लोग प्रायः यह कहते थे कि इस तरीके का मार्केट और कहीं देखने में नहीं आता। इसकी वजह शायद इसका अपने आप में एक एंक्लोज्ड स्वरूप है। इस छोटे से मार्केट में सभी प्रकार की चीजें प्रायः उपलब्ध भी होती है। अतः एक ही जगह आने से व्यक्ति के सारे काम हो जाते हैं, यह इसकी विशेषता है। यही वजह है की बढ़ते हुए भोपाल शहर में अपने मीलों दूर स्थित निजी मकान में रहने जाने के बाद भी, लोगों को न्यू मार्केट अपनी ओर आकर्षित करता रहता है।

बचपन से फ्रैंक रोज, मूलचंद और अग्रवाल मेडिकल की दवाई खा कर ही हम स्वस्थ होते आए हैं। घर घर में शुरू से ही मंगल, गोयल, कैपिटल, बजरंग किराना से ही महीने का सामान आता था। अरुणोदय प्रकाशन, कॉलेज बुक स्टोर और ज्ञान भारती की ही किताबें और स्टेशनरी का उपयोग कर हम लोग जीवन में अच्छी शिक्षा पा सके और एक सम्मानजनक जीवन जी सके। हमने भी भावे साहेब की सेंट्रल डेरी और पंजाब डेरी का घी खाया है जनाब।

बॉम्बे, कलकत्ता और ओके हेयर ड्रेसर ने बचपन से हम सब लोगों को राजेश खन्ना और देवानंद जैसी हेयर स्टाइल रखने में भरपूर मदद कर हमारी खूबसूरती में चार चांद लगा दिए, इसमें कोई शक नहीं। इन दुकानों पर बाल काटने के साथ-साथ पत्तल दोने बेचने का गणित, मैं आज तक समझ नहीं पाया खैर। भला हम सबको अच्छे परिधान पहनाने में विजय रेडीमेड, नवरंग, खण्डेलवाल परिवार के बाबा की दुकानें इन्द्रधनुष, इंद्रलोक, रंग शिविर, इंद्रप्रस्थ विमल साड़ी एंपोरियम और प्रकाश वस्त्र भंडार जैसे प्रतिष्ठान भी कैसे पीछे रह सकते थे?

MACT में पढ़ने के दौरान इंडियन कॉफी हाउस में खाया हुआ डोसा और इडली जैसा स्वाद, आज कहां मिलता है। कड़क सफेद झक कपड़ों में पीतल की थाली का ट्रे लेकर बैरे क्या फुर्ती से अपने ग्राहकों को डोसा इडली सर्व किया करते थे। पेट पर बंधे हुए पट्टे में से माचिस निकालकर झटपट सिगरेट सुलगाने में भी उन्हें महारत हासिल थी। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई आंखों की तंदुरुस्ती बरकरार रखने में विनायक, खन्ना और प्रवीण ऑप्टिशियन ने कोई कसर नहीं रखी। घर में कोई तीज त्‍योहार हो तो भला ब्रजवासी, अन्नपूर्णा या दिल्ली स्वीट हाउस की मिठाई से कैसे कोई इंकार कर सकता था।

अब तो सरकार ने ट्रैफिक के दबाव को देखते हुए टॉप एंड टाउन के सामने से बाजार में प्रवेश करना प्रतिबंधित कर दिया है। परंतु एक जमाना था, जब न्यू मार्केट में सरदारजी की लिटिल हट के छोले भटूरे या शर्मा जी की चाट खा कर लगी हुई मिर्ची को टॉप एन टाउन के सामने खड़े होकर आइसक्रीम से शांत कर, बनारसी पान की मुखशुद्धि के बाद ही घर जाना होता था। मैं यह भी नहीं भूला हूं कि महीने के आखिरी दिनों में दिल्ली स्वीट हाउस या विजय टी स्टाल की चाय और ठेले पर मिलने वाली गरमा गरम सिकी हुई मूंगफली से भी संतोष कर लौटना पड़ता था। रंग महल और संगीत सिनेमा में नई रिलीज हुई पिक्चर को 4 दिन बाद स्टूडेंट कंसेशन पर देखना भला कहीं और संभव था क्या? बाहर निकलते ही पान की दुकान से उसी पिक्चर के गानों की किताब भी हममें से बहुतों ने खरीदी होगी।

न्यू मार्केट में सरकार भी अपने शोरूम खोलने में पीछे नहीं रही। सहकारी बाजार से लेकर खादी ग्रामोद्योग, मृगनयनी आदि सभी ने अपने अपने शोरूमों के माध्यम से जनता को सभी प्रकार के परिधान समय-समय पर आकर्षक छूट के साथ उपलब्ध कराए हैं, इससे आप सभी सहमत होंगे।

सन 1969 में हुए बैंकों के व्यापक राष्ट्रीयकरण के बाद न्यू मार्केट में सभी बैंकों की शाखाएं एक के बाद एक खुलती ही चली गईं। इसी कड़ी में भोपाल कोऑपरेटिव सेंट्रल बैंक और अपेक्स बैंक भी समय के साथ जुड़ गए। मुझे याद है कि भोपाल को ऑपरेटिव सेंट्रल बैंक की शाखा का उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित श्यामाचरण शुक्ल द्वारा और अपेक्स बैंक का उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा किया गया था।

अपने जमाने के सबसे ऊंचे अपेक्स बैंक के भवन ने तो न्यू मार्केट को एक विशिष्ट पहचान देने का काम किया है। जिस तरह से हम लोग अपने बाल्यकाल से वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में आ गए हैं। ठीक उसी तरह न्यू मार्केट भी अपनी दिनों दिन बढ़ती उम्र के साथ नई-नई ऊंचाइयों को छू रहा है। मांग के अनुसार इसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है। अब इसने जीटीबी कॉम्प्लेक्स और मालवीय नगर के भी एक बड़े हिस्से को अपने में समेट लिया है।

मालवीय नगर क्षेत्र के इस विस्तारित न्यू मार्केट को मुख्य न्यू मार्केट से जोड़ने के लिए बनाया हुआ सबवे भी दिल्ली के पालिका बाजार से कहीं कम नहीं है। हमारे जमाने में तो सीधे जिस दुकान पर काम हो उस तक अपने वाहन से पहुंचना संभव हो जाता था। परंतु आज उम्र के साथ थके हुए पैरों के सहारे अपने वाहन को मल्टी स्टोरी पार्किंग में पार्क कर दुकान तक पहुंचते-पहुंचते नानी याद आ जाती है।

गलती से गाड़ी कुछ देर को भी खड़ी करें तो ट्रैफिक कंट्रोल वाले उठाकर ले जाते हैं। हर बार जब न्यू मार्केट जाना होता है तो पिछली बार जहां हमने सब्जी की दुकान देखी थी, वहां आज कपड़े की होती है। जहां कपड़े की देखी थी, वहां इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकान होती है। आज न्यू मार्केट की बदहाली देखकर हम अपने आप को ही इस न्यू मार्केट में खोया हुआ सा महसूस करने लगते है। अतिक्रमण की हालात यह है पैदल चलना मुश्किल है चारों और गन्दगी, जगह जगह गड्ढे बाजार की हालत गंभीर है, आसामाजिक तत्वों ने हर तरह से बाजार में कब्जा कर लिया है।

लगता है कि यह न्यू मार्केट अब वह हमारा पुराना न्यू मार्केट नहीं रहा। खण्डेलवाल परिवार के बाबा साहब, हाजी साहब, खुशीलाल जी पटवा, जैन दादा, गोविन्द दास जी गौड़ अन्य बुजुर्गो के आपस में स्नेह और मजबूत रिश्ते अब कहां है? बाजार को राजनीतिक धमाचौकड़ी एवम वैमनस्यता का अखाड़ा बना दिया गया है। अब यह नए जमाने के लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए और सिर्फ मौज मस्ती के लिए न्यू मार्केट बन गया है।
(डॉ. मुकुंद फाटक की सोशल मीडिया पोस्‍ट)