-स्‍मृति शेष डॉ. अशोक पानगडि़या-

गिरीश उपाध्‍याय

पता नहीं मेरे साथ यह संयोग है या दुर्योग कि जिस इंसान से मेरी बहुत ‘पक्‍की दोस्‍ती’ होती है उससे पहली मुलाकात बहुत निराश करने या झल्‍ला देने वाली होती है। देश के विख्‍यात न्‍यूरोफिजिशियन और पद्मश्री सहित अनेक सम्‍मानों से विभूषित डॉ. अशोक पानगडि़या के साथ परिचय की शुरुआत भी इससे अलग नहीं थी। आज जब उनके न रहने की खबर आई तो उनसे हुई पहली मुलाकात से लेकर बाद की लंबी मित्रता के कई चित्र यादों के पटल पर तैर गए।

दरअसल वर्ष 2000 में जब मैं यूएनआई समाचार एजेंसी का राजस्‍थान स्‍टेट ब्‍यूरो चीफ होकर जयपुर पहुंचा तो उस शहर में मेरा कोई परिचित नहीं था। दो चार लोगों के रिफरेंस भर थे मेरे पास.. बस! मुझसे पहले वहां ब्‍यूरो चीफ रहे खालिद वसीउल्‍ला का अचानक निधन हो गया था और प्रबंधन ने मुझे इंदौर से जयपुर भेजा था राजस्‍थान का चार्ज लेने के लिए। खालिद वसीउल्‍ला के एक बहुत ही घनिष्‍ठ मित्र थे डॉ. दिनेश त्रिपाठी। एक दिन उन्‍होंने संपर्क किया और खालिद का संदर्भ देते हुए कहा कि आप मुझे अपना बड़ा भाई समझें और कोई भी बात या दिक्‍कत हो तो बताइयेगा।

डॉ. त्रिपाठी जी के साथ रिश्‍तों पर विस्‍तार से बात किसी और दिन करूंगा क्‍योंकि उसमें भी आत्‍मीयता और स्‍नेह की उपस्थिति इतनी अधिक है कि दो चार लाइनों में उसका जिक्र नहीं हो सकता। डॉ. त्रिपाठी और डॉ. पानगडि़या में बहुत गहरी दोस्‍ती थी। उन्‍हीं के जरिये एक पार्टी में मेरा डॉ. पानगडि़या से परिचय हुआ। औपचारिक पार्टियों में होने वाले इस तरह के परिचय भी अमूमन उतने ही औपचारिक होते हैं, लेकिन डॉ. पानगडि़या जिस आत्‍मीयता से मिले उसने मुझे बहुत प्रभावित किया। मुझे याद है उस पहली मुलाकात में शुरुआती परिचय के बाद उन्‍होंने कहा था- जयपुर में आपका स्‍वागत है, कोई भी दिक्‍कत हो तो बताइयेगा…

बात आई गई हो गई… दो चार महीनों बाद कुछ ऐसा हुआ कि मेरी कमर का दर्द लंबे समय बाद फिर उभर आया और इतना बढ़ा कि बैठना भी मुश्किल हो गया। मैंने डॉ. दिनेश त्रिपाठी से बात की और असहनीय दर्द का कुछ इलाज पूछा। उन्‍होंने कहा- अरे अपन डॉ. पानगडि़या से बात कर लेते हैं, आप उन्‍हें दिखाइये। मैं राजी हो गया। पहले यह तय हुआ था कि जब मैं डॉ. पानगडि़या के यहां जाऊंगा तो डॉ. त्रिपाठी भी मेरे साथ चलेंगे। लेकिन पता नहीं उस दिन उन्‍हें कुछ जरूरी काम आ गया और वे मुझे डॉ. पानगडि़या के घर पर छोड़ कर चले गए। जाते जाते कहा- मेरी अशोक से बात हो गई है आप चिंता न करें सब ठीक हो जाएगा…

मैं विजिटर्स रूम में बैठ गया। उसके बाद शुरू हुई इंतजार की घडि़यां। डॉ. पानगडि़या की विशेषज्ञता और कुशलता के चर्चे देश भर में थे इसलिए उनसे इलाज लेने वालों की संख्‍या में बहुत ज्‍यादा होती थी। घर के बाहर सड़क तक मरीज अपनी बारी का इंतजार करते हुए बैठे रहते थे। पानगडि़या साहब समय और अनुशासन दोनों के बहुत पाबंद थे। तो साहब… मरीजों के नाम पुकारे जाते रहे और एक एक कर मरीज अंदर जाते रहे…

हम पत्रकारों के साथ एक सबसे खराब बात यह है कि हम अपने आपको बहुत ‘प्रिविलेज्‍ड’ मानकर चलते हैं। कहीं भी थोड़ा सा इंतजार करना पड़ जाए या आपको मनमुताबिक रिस्‍पांस न मिले तो ऐसा लगता है कि शान में कोई बट्टा लग गया। अगले आदमी की क्‍या मजबूरी है या वैसी स्थिति बनने का क्‍या कारण है, इसको ठीक से जाने बिना हम उस आदमी के बारे में मन में एक गांठ बांध लेते हैं। मुझे इंतजार कराया? …ठीक है अब मैं देखता हूं टाइप भाव मन में आने लगता है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि कुछ तो असहनीय दर्द और कुछ उस लंबे इंतजार ने मेरे मन में भी कुछ वैसा ही भाव जगाना शुरू कर दिया…

शायद एकाध घंटे के बाद मेरा नंबर आया… मैं अंदर पहुंचा, सच कहूं तो इलाज लेने से ज्‍यादा मन में एक खीज भरी हुई थी, उस लंबे इंतजार ने डॉ. पानगडि़या के प्रति मेरे मित्रता या परिचय भाव को बहुत हद तक प्रभावित किया था। उन्‍होंने मुझे बिठाया और परीक्षण शुरू किया। उस दौरान भी उनके व्‍यवहार से ऐसा नहीं लगा कि वे मुझे जानते हैं या कि मैं उनके अभिन्‍न मित्र डॉ. दिनेश त्रिपाठी के रेफरेंस से उनके पास आया हूं। अपने हिसाब से उन्‍होंने मेरी जांच की, कुछ सवाल पूछे और अपने पैड पर कुछ लिखा…

फिर उसके बाद जो हुआ वो मेरे लिए अप्रत्‍याशित था, एक तरह का सबक… कि हमें किसी के भी बारे में बिना सोचे समझे कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए। पैड पर कुछ लिखने के बाद उन्‍होंने अपने सहयोगी से कहा- अब बाकी लोगों को थोड़ी देर रोक दें मैं उन्‍हें कुछ देर बाद बुलाउंगा। ऐसा कहकर उन्‍होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझे स्‍टूल से उठाते हुए पूछा आप ऑफिस में कुर्सी कौनसी इस्‍तेमाल करते हैं? यह बात मेरी आदत में शुमार है कि मैं माहौल के तनाव को ज्‍यादा देर सहन नहीं कर पाता और उसे हलका करने की कोशिश करने लगता हूं। मैंने उसी रौ में कहा- जो ऑफिस ने दी है वही… वे हंसे और पूछा कोई ब्रांडेड कुर्सी है या… मैंने कहा- यूएनआई ब्रांड की कुर्सी है… फिर हम दोनों ही हंस पड़े।

डॉ. पानगडि़या ने सहारे से मुझे आगे बढ़ाया और एक तरह से मुझे चौंकाते हुए अपनी कुर्सी के पास ले जाकर बोले, आप इस पर बैठकर देखिये… तब तक माहौल का तनाव लगभग खत्‍म हो चुका था। मैंने कहा- ‘’डॉ. साहब ये डॉ. पानगडि़या की कुर्सी है, देश के विख्‍यात न्‍यूरोफिजिशियन की, मैं इस पर बैठने का हकदार नहीं हूं… और फिर किसी दूसरे की कुर्सी हथियाने में मेरी कोई रुचि भी नहीं है…।‘’ उन्‍होंने हंसते हुए कहा- ‘’मैं आपको इस पर सिर्फ बैठने के लिए कह रहा हूं, आपको यह कुर्सी सौंप नहीं रहा…।‘’ मेरे दर्द को देखते हुए फिर उन्‍होंने खुद ही सहारे से मुझे अपनी कुर्सी पर बैठाया और कहा अब आप तुलना करके देखिये कि आप ऑफिस में आठ से दस घंटे जिस कुर्सी पर बैठते हैं उसमें और इसमें आपकी कमर को आराम देने या सपोर्ट देने वाली स्थिति में कुछ अंतर महसूस होता है। मैंने कहा- ‘’हां, यह बहुत आरामदायक है और उतना खिंचाव भी नहीं दे रही…’’

मुझे कुर्सी से उतारते हुए वे बोले- बस एक तो आपका इलाज ये है कि आप अपनी कुर्सी बदल लीजिये। फिर बैठने का तरीका समझाते हुए बोले- कुर्सी पर इस तरह बैठिये और थोड़ी थोड़ी देर में उठकर आठ दस कदम चल लीजिये। आपको कुछ नहीं हुआ है, बस लगातार गलत पोस्‍चर में बैठने के कारण यह दर्द बना है, जो पोस्‍चर ठीक करने, कुछ मामूली सी एक्‍सरसाइज करने से ठीक हो जाएगा, फिर किसी दिन शाम को आप आइये हम लोग बैडमिंटन खेलेंगे। मैंने पूछा कोई दवाई? वे मुझे सहारा देकर अपने भीतरी कक्ष में ले गए, वहां चाय हमारा इंतजार कर रही थी। वहां उन्‍होंने कहा- ‘’जब दवाई की जरूरत होगी तब ही लेंगे ना… वैसे ही ठीक हो जाएं तो दवाई क्‍यों लेना…’’

और उसके बाद जो हुआ उसने मुझे और आश्‍चर्य में डाल दिया। उन्‍होंने मुझसे पूछा आपकी राशि क्‍या है? मैंने कहा- ‘’क्‍यों, मैं कुछ समझा नहीं…’’ वे हंसते हुए बोले- आपके पास अपनी जनमपत्री है? मैंने कहा- ‘’होगी तो जरूर कहीं, बरसों से जरूरत नहीं पड़ी तो देखना पड़ेगा…’’ उन्‍होंने मेरा जवाब सुनने के साथ ही मेरी आंखों में उतरे आश्‍चर्य को भी पढ़ लिया था, बोले- ‘’अरे भाई आश्‍चर्य मत करिये, मैं थोड़ा बहुत इसका भी ज्ञान रखता हूं। यूं ही पूछ लिया, देख तो लूं कि आपका समय तो ठीक चल रहा है या नहीं…’’

थोड़ी देर हम लोगों की और बात हुई घर-परिवार के बारे में और वे बोले किसी दिन भाभीजी और बच्‍चों को लेकर आइए। मैंने वादा किया। वे मुझे बाहर तक छोड़ने आए और जाते जाते बोले- ‘’दरअसल मेरे पास बहुत सारे लोग बहुत दूर दूर से आते हैं, उनमें से कई तो काफी कष्‍ट झेलकर, इसके साथ ही कई लोगों को बहुत दिनों के इंतजार के बाद समय मिल पाता है। मैं उन लोगों को देखने में प्राथमिकता देता हूं जिन्‍हें मेरी ज्‍यादा जरूरत है…’’ यह उनकी ओर से दी गई सफाई नहीं थी, मेरे लिए एक सीख थी, जिसे मैंने बाद में याद रखने की हरसंभव कोशिश की…

उस मुलाकात के बाद डॉ. पानगडि़या के प्रति मन में जो सम्‍मान का भाव पैदा हुआ, उनसे जो आत्‍मीय रिश्‍ता बना वो आखिर तक कायम रहा। भले ही जयपुर छोड़ने के बाद बात और मुलाकात कम होती रही पर रिश्‍ते की आत्‍मीयता और उनके स्‍नेह में कभी कमी नहीं देखी मैंने। मुझे याद है मेरे जयपुर छोड़ते वक्‍त उन्‍होंने बहुत भारी मन से कहा था- ‘’हम तो चाहते थे आप यहीं बस जाएं… जयपुर आकर भी यहां से कोई जाता है भला…’’

आज मेरा मन कह रहा है- डॉ. साहब, हम तो चाहते थे आप यहीं बसे रहें, इतने लोगों को बिलखता छोड़ कोई जाता है भला…