राकेश अचल

भारत में 1980-85 के बाद पैदा हुई पीढ़ी को सर्कस के बारे में शायद पता ही न हो। दरअसल तीन-चार सौ साल पुरानी इस कला को बदले वक्त में मशीनें और कानून निगल गये। अमेरिका के 25वें बड़े शहर लॉस वेगास में हमने जो सर्कस देखा वो नाम का सर्कस था। ये सर्कस-सर्कस नाम के एक बड़े होटल की एक मनोरंजन इकाई है।

हमारे अधिकांश मित्र उस सर्कस’ से वाकिफ हैं जो राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में था और जिस सर्कस के बारे में नीरज जी ने ‘ऐ भाई जरा देख के चलो’ नाम का अमर गीत लिखा था। लॉस वेगास का सर्कस दुनिया के पारंपरिक सर्कस से अलग मशीनी सर्कस था। जिसमें रोमांच तो था लेकिन कौतूहल न था। ठहाके नहीं थे, तालियां न थी।

हम जिस सर्कस के बारे में जानते हैं वो सर्कस एक चलती-फिरती कलाकारों की कम्पनी होती थी। जिसमें नट, विदूषक, अनेक प्रकार के जानवर हाथी, शेर, घोड़े, कुत्ते, पशु-पक्षी एवं अन्य प्रकार के रोमांचक करतब दिखाने वाले कलाकार होते थे। सर्कस एक विशाल तंबू के घेरे में दिखाया जाता था। जिसके चारो तरफ दर्शकों के बैठने की व्यवस्था होती थी। एक अस्थाई स्टेडियम की तरह। वीआईपी के लिए एक दो हिस्से सोफे और कुर्सियों वाले भी होते थे।

सर्कस-सर्कस के दो टावर वाले होटल की 35 मंजिल के बगल में ही मशीनों वाला सर्कस है। मालिक है फिल रफेल। इस होटल की छह मंजिला पार्किंग में जगह मिल जाए तो आपका नसीब है, लेकिन पार्किंग है निशुल्क। प्रवेश के दो टिकिट है। वयस्क का 60 डालर और बच्चों के 50 डालर लगते हैं। इस प्रवेश टिकट से आप सर्कस में लगे 200 झूलों, खेलों का चाहे जितनी बार आनंद ले सकते हैं।

वातानुकूलित तंबू में एक विशाल शिलाखंड के इर्दगिर्द लगी मशीनों में एक साल के बच्चे से लेकर सभी के लिए मनोरंजन, खानपान यहां तक कि बियर तक का इंतजाम है। जन सुविधा केंद्र किसी पांच सितारा होटल जैसे। यहां समय का पता नहीं चलता।

इस सर्कस में पूरी दुनिया से लोग आते हैं, हम भी थे यहां। लेकिन ये सर्कस उस सर्कस जैसा बिल्कुल न था जो हमने बचपन से देखा था। यहां जान हथेली पर रखने वाले कलाकार नहीं होते, आपको खुद अपनी जान हथेली पर रखकर रोमांच का मजा लेना होता है। बिना जोकर के इस सर्कस में से बच्चों को बाहर निकालना कठिन होता है। पारंपरिक सर्कस में शो टाइम होता है सिनेमा की तरह, लेकिन इस सर्कस में चौबीस घंटे आवागमन चलता रहता है।

सर्कस एक तरह का प्रशिक्षित खेल हैं। जिसमें मार्शल आर्ट, नृत्य, जिम्नास्टिक, संवाद आदि में प्रोफेशनल लोग ही हिस्सा लेते थे। किसी मेले में मुख्य रूप से सर्कस का आयोजन अवश्य ही होता था। इसमें काम करने वाले कलाकार अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों का मनोरंजन करते थे। पतली सी रस्सी या धागे के सहारे उछल कूद, बाइक को गहरी खाई में कुदाना, जलती हुई तश्तरी में कूदना आदि प्रकार के खेल दिखाए जाते। बीच-बीच में मनोरंजन करने के लिए जोकर, भी होता था।

मैंने पढ़ा है कि फिलिप एस्टली आधुनिक सर्कस के जनक थे। 1768 में, एक कुशल घुड़सवार, एस्टली ने टेम्स नदी के दक्षिण की ओर हापेनी हैच नामक एक खुले मैदान में ट्रिक हॉर्स राइडिंग का प्रदर्शन शुरू किया। 1770 में, उन्होंने घुड़सवारी के प्रदर्शनों के बीच के ठहराव को भरने के लिए कलाबाज, टाइट वॉकर, बाजीगर और एक जोकर को काम पर रखा और इस तरह उस प्रारूप पर जाप किया जिसे बाद में ‘सर्कस’ नाम दिया गया।

अगले पचास वर्षों में प्रदर्शन महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुए। बड़े पैमाने पर नाटकीय युद्ध पुनर्मूल्यांकन एक महत्वपूर्ण विशेषता बन गए। पारंपरिक प्रारूप, जिसमें एक रिंगमास्टर संगीत के लिए सेट किए गए विभिन्न प्रकार के कोरियोग्राफ कृत्यों का परिचय देता है 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विकसित हुआ और 1970 के दशक तक प्रमुख प्रारूप बना रहा।

दुर्भाग्य कि अब सर्कस मर चुके हैं। पहले भारतीय सर्कस अक्सर सोवियत संघ के सर्कस से चर्चित थे। बांबे, जैमिनी और अपोलो सर्कस का नाम तो अब तक हम सबके जेहन में है। जैमिनी सर्कस से तो मैं खुद सीधे तौर पर जुड़ा रहा। भारत में तो सर्कस को केंद्र में रखकर अनेक फिल्में बनाई जा चुकी है। ‘मेरा नाम जोकर’ तो सर्वकालिक फिल्म में रखी जाती है।(मध्यमत)
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