राकेश दुबे

कहने को सरकार ने वर्ष के आखिरी दिनों में देश की 81.3 करोड़ जनता को एक और वर्ष के लिए रियायती गेहूं प्रदान करने की स्वीकृति दे दी। इस तरह उसने भूख से मरने न देने की गारंटी को दोहराया है। देश के सर्वोच्च  न्यायलय ने भी भूख से मरते लोगों के प्रति चिंता प्रकट की और आशा जताई कि देश में अब भूखे और बेकार लोगों को जीवन संकट आने से पहले बचा लिया जाएगा।

इसके विपरीत इस बात की कोई गारंटी देशवासियों को अब तक नहीं मिली कि हर एक को उचित रोजगार मिलेगा। यह तो कहा गया कि हम देश के लोगों को, उसकी युवा शक्ति को रोजगार मांगने के स्थान पर रोजगार देने के काबिल बना देंगे, इसके बावजूद देश अभी भी अनुकम्पाएं प्राप्त करने की कतार में खड़ा नजर आता है। आज बेरोजगारी 16 माह के उच्च स्तर पर है।

इस साल जिन नौ राज्यों के चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें भी यही लगता है कि हर पार्टी और विशेष रूप से सत्तारूढ़ पार्टी रेवड़ियां न बांटने का आश्वासन देते हुए भी अधिक से अधिक लुभावनी रियायतों की घोषणा करके वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास करेंगी। जैसा कि पिछले साल के गुजरात, हिमाचल विधानसभा और दिल्ली निगम चुनावों के दौरान हुआ।

आज देश की सबसे पहली और बड़ी समस्या बेरोजगारी समाधान की है, डर है युवा भारत कहीं रोजगार के बिना असमय ही बूढ़ा न हो जाए। देश में बेरोजगारी 16 माह के उच्च स्तर पर चली गई है। पूरे देश के लिए बेरोजगारी 8.30 प्रतिशत रही जबकि इससे पिछले साल 8 प्रतिशत थी। लेकिन असली समस्या है शहरी बेरोजगारी की दर जो बढ़कर 10.09 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। जबकि पिछले वर्ष इसी मास यह आंकड़ा 8.96 प्रतिशत था।

ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी दर 0.11 प्रतिशत घटकर 7.44 प्रतिशत हुई जो पिछले साल नवम्बर में 7.55 प्रतिशत थी। ग्रामीण रोजगार हमेशा आंकड़ों से लुकाछिपी खेलता है। भारत के गांवों में रोजगार का भ्रम छुपी हुई बेरोजगारी भी देती है अर्थात‍् लोग खेतों में काम करते हुए नजर आते हैं, लेकिन कुल आय में वृद्धि नहीं कर पाते। ऐसा अनार्थिक जोतों में जरूरत से अधिक काम करते लोगों में होता है। फिर यहां रोजगार मौसमी होता है। फसल बोने और काटने के समय अधिक और बाद में कम।

पता नहीं वे दिन कब आएंगे जब शहरों में योग्यता के अनुसार रोजगार और गांवों में खेती पर अत्यधिक भार को घटाकर सहकारी आंदोलन के जरिये लघु और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा। इस वर्ष यह वायदा पूरा होना ही चाहिए। बीते साल आस्ट्रेलिया के साथ फ्री ट्रेड का समझौता हो गया है और सरकार ने यह मंशा जाहिर कर रखी है कि अधिक से अधिक देशों के साथ फ्री ट्रेड के समझौते होंगे। ब्रिटेन ने तो इसका वायदा भी कर रखा है। अमेरिका से बातचीत हो रही है।

निश्चय ही इससे इस वर्ष हमारा निर्यात बढ़ेगा। लेकिन केवल निर्यात के बढ़ने से क्या होता है? अगर हम अपनी आयात आधारित व्यवस्था को न बदल सकें। अगर हर नव उत्पादन और नव निवेशधर्मी कारगुजारी को कच्चे माल के लिए चीन से लेकर अमेरिका की बाट जोहनी पड़े तो भला हमारा व्यापारिक घाटा कम कैसे होगा? डॉलर की मांग तो उसी तरह से रहेगी। रुपये का मूल्य तो गिरता रहेगा। इसके लिए जरूरी है कि देश के आत्मनिर्भर हो जाने का संकल्प पूरा हो।

इस आधार भूमि को पैदा करने के लिए हम अंतर्राष्ट्रीय मंडियों में गिरती हुई कच्चे तेल की कीमतों के बावजूद अपने देश में पेट्रोल डीजल की कीमतें कब कम करेंगे, एक बड़ा प्रश्न है। कम्पनियों को घाटा हो गया या देश का राजस्व कम हो जाएगा, जैसे बहानों/तर्कों के आधार पर कच्चे तेल से बनने वाले पैट्रोल और डीजल की कीमत कटौती को टाला नहीं जा सकता। जब तक यह कटौती नहीं होती, महंगाई नियंत्रित नहीं होगी। इस नये साल में महंगाई और बेरोजगारी एक ऐसी चुनौती है जिसके बारे में नये संघर्ष की रूपरेखा तैयार करनी होगी।
(मध्यमत)
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