हृदय नारायण दीक्षित

सतत् संवाद लोकतंत्र का प्राण हैं। संवादरत समाज गतिशील होते हैं। संवाद से सामाजिक परिवर्तन होते हैं। संवाद का मुख्य उपकरण भाषा है। प्रख्यात भाषाविद मोलनीविसी ने 1923 में कहा था कि ‘‘भाषा सामाजिक संगठन का काम करती है।‘‘ दुनिया के सभी समाज भाषा के सदुपयोग द्वारा ही गढ़े गए हैं। ज्ञान, विज्ञान, इतिहास और दर्शन भाषा के कारण सार्वजनिक सम्पदा बनते हैं।

इसके लिए सार्वजनिक बहसों की गुणवत्ता जरूरी होती है। लेकिन भारतीय राजनीति में सार्वजनिक बहसों का स्तर लगातार गिर रहा है। सर्वोच्च न्यायपीठ ने भी सार्वजनिक बहस के गिरते स्तर पर बेबाक टिप्पणी की है। न्यायालय ने दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए बीते सोमवार को कहा, ‘‘यदि आप सार्वजनिक बहस को इस स्तर तक गिरा देंगे तो आपको अंजाम भुगतने होंगे।‘‘

सिसोदिया ने प्रेस वार्ता में असम के मुख्यमंत्री व उनकी पत्नी पर पीपीई किट की खरीद पर कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। झूठे आरोपों से आहत हेमंत ने स्थानीय न्यायालय में मानहानि का मुकदमा किया। सिसोदिया प्राथमिकी खारिज कराने के लिए पहले हाईकोर्ट गए। फिर सर्वोच्च न्यायालय। सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक बहस के गिरते स्तर पर टिप्पणी की।

सिसोदिया ने मानहानिकारक टिप्पणियां की थी। सार्वजनिक बहसों में शब्द सदुपयोग और वाक् संयम की मर्यादा का हनन हो रहा है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। कांग्रेस नेता राजा पटेरिया द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की अपील से देश स्तब्ध है। यद्यपि उन्होंने बाद में इसका स्पष्टीकरण भी दिया है। लेकिन उनका मूल वक्तव्य भयावह है।

उच्चस्तरीय सार्वजनिक बहसें आदर्श लोकमत बनाती हैं। इससे सामाजिक परिवर्तन के अनेक द्वार खुलते हैं। प्रत्येक दल, समूह, नेता या सामाजिक कार्यकर्ता के अपने विचार होते हैं। अपनी विचारधारा के पक्ष में लोकमत बनाना सबका अधिकार है। संविधान निर्माताओं ने इसीलिए विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार बनाया। लेकिन भारत की सम्प्रभुता, अखण्डता और लोक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली अभिव्यक्ति पर मर्यादा और संयम के बंधन भी लगाए।

वाक् संयम और प्रेमपूर्ण शब्द प्रयोग सार्वजनिक बहसों का सौंदर्य है। सम्प्रति सार्वजनिक बहसों के गिरते स्तर से दल समूहों के मध्य परस्पर घृणा का भाव पैदा हो रहा है। दल समूह परस्पर शत्रु नहीं होते। लेकिन घृणा और विद्वेष के कारण दल तंत्र में शत्रुता का भाव बढ़ा है। पतन की श्रंखला बन चुकी है। पहले अपशब्द प्रयोग से घृणा बढ़ती है। फिर सभी पक्षों में परस्पर शत्रु भाव विकसित होता है। फिर झूठ फरेब का आचरण और छल कपट बढ़ता है।

इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में होने वाली बहसों में परस्पर अपशब्द कहने के दृश्य देखे सुने जा रहे हैं। दलतंत्र के प्रति जनतंत्र का सम्मान घटा है। बहसों में उपयुक्त शब्द प्रयोग की महत्ता है। प्रत्येक शब्द के गर्भ में भाव और अर्थ होता है। संयम विहीनता के कारण भाव दुर्भाव में प्रकट हो रहा है और अर्थ का अनर्थ हो रहा है। शब्द और अपशब्द का भेद मिट रहा है।

बेशक बहसों में असहमति व्यक्त करने की आवश्यकता होती है। लेकिन असहमति प्रकट करने में अपशब्दों का प्रयोग जरूरी नहीं होता। मानहानिकारक शब्दों से बचा जा सकता है। सम्मानजनक अभिव्यक्ति के माध्यम से असहमति प्रकट करना ही सम्मानजनक तरीका है। लोकसभा में परमाणु परिक्षण पर बहस हो रही थी। चन्द्रशेखर ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर कुछ टिप्पणियां की। अटल जी ने कहा कि ‘‘परमाणु परीक्षण पर चन्द्रशेखर जी ने विचार व्यक्त किए हैं। मुझे खेद है कि मैं उनके विचारों से सहमत नहीं हो सकता। उनके चिंतन की एक विशिष्ट धारा है।‘‘

आखिरकार अपशब्द प्रयोग की अनिवार्यता क्या है? प्रश्न अनेक हैं। क्या भारतीय भाषाओं में सम्मानजनक विरोध प्रकट करने के लिए शब्द सामर्थ्य की कमी है? क्या अपमानजनक शब्द प्रयोग से ही सामाजिक व आर्थिक परिवर्तन संभव है? क्या चुनावी जीत के लिए व्यक्तिगत आरोपों का कोई विकल्प नहीं? क्या विपक्षी उम्मीदवार को अपशब्द कहने से वोट बढ़ते हैं?

सार्वजनिक बहसों को निम्नस्तरीय बनाने वाले मित्रों में भाषा ज्ञान की दरिद्रता है। भारतीय चिंतन में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। महाभारत युद्ध में व्यास ने आहत मन होकर कहा था कि शब्द अब ब्रह्म नहीं रहे। आज की स्थिति भी ऐसी ही है। मानहानिकारक शब्द प्रयोग से शब्द का मूल अर्थ और सौंदर्य खो जाता है।

पतंजलि ने शब्द प्रयोग में सतर्कता के निर्देश दिए थे, ‘‘शब्द का सम्यक ज्ञान और सम्यक प्रयोग ही अपेक्षित परिणाम देता है।” अपशब्द आत्मीय शब्दों का विकल्प नहीं हो सकते। अपशब्द प्रयोग का अंतिम परिणाम हिंसा है। बहस के स्तर की गिरावट से सांस्कृतिक सामाजिक सौहार्द नष्ट हो रहा है। सामाजिक समूह एक दूसरे को शत्रु भाव से देखते हैं।

सुन्दर शब्द प्रयोग जीवन रस को प्रभावित करते हैं और समाज को आनंदित करते हैं। शब्दों का दुरुपयोग विनाशकारी है। सुन्दर ढंग से प्रयुक्त किए गए शब्द मंत्र हो जाते हैं। सार्वजनिक बहसों में अपशब्दों की आग बरस रही है। शब्द अंगार हो रहे हैं। जो जितना जोर से बोले, जो जितने अपशब्द बोले, मानहानिकारक शब्द प्रयोग करे, वह उतना ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जल और वायु की तरह अपशब्द प्रदूषण भी बढ़ा है। अपशब्द प्रदूषण ने सार्वजनिक जीवन की छंदबद्धता व लय को नष्ट कर दिया है।

कभी कभी जल्दबाजी में उपयुक्त शब्द नहीं निकलते लेकिन सार्वजनिक जीवन के अति प्रतिष्ठित लोग भी सुनियोजित ढंग से सोच समझ कर ही अपशब्द बोल रहे हैं। राष्ट्र की क्षति हो रही है। सार्वजनिक बहसों के गिरते स्तर का सीधा प्रभाव संसदीय संस्थाओं पर भी पड़ा है। संसद और विधान मण्डल देश के भाग्य विधाता हैं।

तीसरी चौथी लोकसभा तक संसद में सुन्दर शब्द बोलने की प्रतिस्पर्धा थी। अब परिदृश्य बदल गया है। शब्द प्रयोग में शालीनता और संयम का अभाव दिखाई पड़ता है। परस्पर तू-तू मैं-मैं के दृश्य भी दिखाई देते हैं। विधान मण्डलों की स्थिति भी चिंताजनक है। राष्ट्रजीवन में निराशा व चिंता बढ़ी है। संसद सार्वजनिक बहसों को उच्चस्तरीय व प्रेरक बनाने का मंच भी है।

लोकसभा से गाँव सभा तक सार्वजनिक बहसों की चिंताजनक धारा है। यह सब उस देश में हो रहा है जहां हजारों वर्ष पहले सभा और समितियों में सुन्दर बोलने की प्रतिस्पर्धा थी। शब्द माधुर्य की अभिलाषा सहस्त्रों वर्ष पहले ऋग्वेद, अथर्ववेद के रचनाकाल में भी थी। ऋग्वेद में प्रार्थना है कि ‘‘हमारा पुत्र सभा में सुन्दर बोले। यशस्वी हो।”

अथर्ववेद (9-1) में स्तुति है- हमारी जिह्वा का अग्रभाग मधुवाणी से युक्त हो। मूल भाग भी मधुर हो। हम तेजस्वी वाणी भी मधुरता के साथ बोलें। वाणी मधुर हो।‘‘ वैदिक साहित्य में मंत्रों के छोटे समूह को सूक्त कहते हैं। सूक्त का अर्थ सु-उक्त (सुन्दर कथन) है। तब सुंदर कथन की अनिवार्यता थी। लुडविग जैसे विद्वानों के अनुसार वैदिक काल में सभा और समितियां महत्वपूर्ण विषयों पर प्रेमपूर्ण बहस करती थीं।

उत्तर वैदिक काल में शास्त्रार्थ परंपरा में भी परस्पर आत्मीयता थी। लेकिन आधुनिक भारत में सार्वजनिक बहसों में व्यक्तिगत आक्षेपों, उत्तेजक मानहानिकारक शब्दों का प्रयोग सर्वत्र दिखाई पड़ रहा है। देश के सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं व भिन्न भिन्न क्षेत्रों के शीर्ष महानुभावों को सार्वजनिक बहसों को शालीन बनाने के लिए प्रयत्न करने चाहिए।

भाषायी मर्यादा का बढ़ता उल्‍लंघन

ह्रदय नारायण दीक्षित

सतत् संवाद लोकतंत्र का प्राण हैं। संवादरत समाज गतिशील होते हैं। संवाद से सामाजिक परिवर्तन होते हैं। संवाद का मुख्य उपकरण भाषा है। प्रख्यात भाषाविद मोलनीविसी ने 1923 में कहा था कि ‘‘भाषा सामाजिक संगठन का काम करती है।‘‘ दुनिया के सभी समाज भाषा के सदुपयोग द्वारा ही गढ़े गए हैं। ज्ञान, विज्ञान, इतिहास और दर्शन भाषा के कारण सार्वजनिक सम्पदा बनते हैं।

इसके लिए सार्वजनिक बहसों की गुणवत्ता जरूरी होती है। लेकिन भारतीय राजनीति में सार्वजनिक बहसों का स्तर लगातार गिर रहा है। सर्वोच्च न्यायपीठ ने भी सार्वजनिक बहस के गिरते स्तर पर बेबाक टिप्पणी की है। न्यायालय ने दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए बीते सोमवार को कहा, ‘‘यदि आप सार्वजनिक बहस को इस स्तर तक गिरा देंगे तो आपको अंजाम भुगतने होंगे।‘‘

सिसोदिया ने प्रेस वार्ता में असम के मुख्यमंत्री व उनकी पत्नी पर पीपीई किट की खरीद पर कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। झूठे आरोपों से आहत हेमंत ने स्थानीय न्यायालय में मानहानि का मुकदमा किया। सिसोदिया प्राथमिकी खारिज कराने के लिए पहले हाईकोर्ट गए। फिर सर्वोच्च न्यायालय। सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक बहस के गिरते स्तर पर टिप्पणी की।

सिसोदिया ने मानहानिकारक टिप्पणियां की थी। सार्वजनिक बहसों में शब्द सदुपयोग और वाक् संयम की मर्यादा का हनन हो रहा है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। कांग्रेस नेता राजा पटेरिया द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की अपील से देश स्तब्ध है। यद्यपि उन्होंने बाद में इसका स्पष्टीकरण भी दिया है। लेकिन उनका मूल वक्तव्य भयावह है।

उच्चस्तरीय सार्वजनिक बहसें आदर्श लोकमत बनाती हैं। इससे सामाजिक परिवर्तन के अनेक द्वार खुलते हैं। प्रत्येक दल, समूह, नेता या सामाजिक कार्यकर्ता के अपने विचार होते हैं। अपनी विचारधारा के पक्ष में लोकमत बनाना सबका अधिकार है। संविधान निर्माताओं ने इसीलिए विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार बनाया। लेकिन भारत की सम्प्रभुता, अखण्डता और लोक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली अभिव्यक्ति पर मर्यादा और संयम के बंधन भी लगाए।

वाक् संयम और प्रेमपूर्ण शब्द प्रयोग सार्वजनिक बहसों का सौंदर्य है। सम्प्रति सार्वजनिक बहसों के गिरते स्तर से दल समूहों के मध्य परस्पर घृणा का भाव पैदा हो रहा है। दल समूह परस्पर शत्रु नहीं होते। लेकिन घृणा और विद्वेष के कारण दल तंत्र में शत्रुता का भाव बढ़ा है। पतन की श्रंखला बन चुकी है। पहले अपशब्द प्रयोग से घृणा बढ़ती है। फिर सभी पक्षों में परस्पर शत्रु भाव विकसित होता है। फिर झूठ फरेब का आचरण और छल कपट बढ़ता है।

इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में होने वाली बहसों में परस्पर अपशब्द कहने के दृश्य देखे सुने जा रहे हैं। दलतंत्र के प्रति जनतंत्र का सम्मान घटा है। बहसों में उपयुक्त शब्द प्रयोग की महत्ता है। प्रत्येक शब्द के गर्भ में भाव और अर्थ होता है। संयम विहीनता के कारण भाव दुर्भाव में प्रकट हो रहा है और अर्थ का अनर्थ हो रहा है। शब्द और अपशब्द का भेद मिट रहा है।

बेशक बहसों में असहमति व्यक्त करने की आवश्यकता होती है। लेकिन असहमति प्रकट करने में अपशब्दों का प्रयोग जरूरी नहीं होता। मानहानिकारक शब्दों से बचा जा सकता है। सम्मानजनक अभिव्यक्ति के माध्यम से असहमति प्रकट करना ही सम्मानजनक तरीका है। लोकसभा में परमाणु परिक्षण पर बहस हो रही थी। चन्द्रशेखर ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर कुछ टिप्पणियां की। अटल जी ने कहा कि ‘‘परमाणु परीक्षण पर चन्द्रशेखर जी ने विचार व्यक्त किए हैं। मुझे खेद है कि मैं उनके विचारों से सहमत नहीं हो सकता। उनके चिंतन की एक विशिष्ट धारा है।‘‘

आखिरकार अपशब्द प्रयोग की अनिवार्यता क्या है? प्रश्न अनेक हैं। क्या भारतीय भाषाओं में सम्मानजनक विरोध प्रकट करने के लिए शब्द सामर्थ्य की कमी है? क्या अपमानजनक शब्द प्रयोग से ही सामाजिक व आर्थिक परिवर्तन संभव है? क्या चुनावी जीत के लिए व्यक्तिगत आरोपों का कोई विकल्प नहीं? क्या विपक्षी उम्मीदवार को अपशब्द कहने से वोट बढ़ते हैं?

सार्वजनिक बहसों को निम्नस्तरीय बनाने वाले मित्रों में भाषा ज्ञान की दरिद्रता है। भारतीय चिंतन में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। महाभारत युद्ध में व्यास ने आहत मन होकर कहा था कि शब्द अब ब्रह्म नहीं रहे। आज की स्थिति भी ऐसी ही है। मानहानिकारक शब्द प्रयोग से शब्द का मूल अर्थ और सौंदर्य खो जाता है।

पतंजलि ने शब्द प्रयोग में सतर्कता के निर्देश दिए थे, ‘‘शब्द का सम्यक ज्ञान और सम्यक प्रयोग ही अपेक्षित परिणाम देता है।” अपशब्द आत्मीय शब्दों का विकल्प नहीं हो सकते। अपशब्द प्रयोग का अंतिम परिणाम हिंसा है। बहस के स्तर की गिरावट से सांस्कृतिक सामाजिक सौहार्द नष्ट हो रहा है। सामाजिक समूह एक दूसरे को शत्रु भाव से देखते हैं।

सुन्दर शब्द प्रयोग जीवन रस को प्रभावित करते हैं और समाज को आनंदित करते हैं। शब्दों का दुरुपयोग विनाशकारी है। सुन्दर ढंग से प्रयुक्त किए गए शब्द मंत्र हो जाते हैं। सार्वजनिक बहसों में अपशब्दों की आग बरस रही है। शब्द अंगार हो रहे हैं। जो जितना जोर से बोले, जो जितने अपशब्द बोले, मानहानिकारक शब्द प्रयोग करे, वह उतना ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जल और वायु की तरह अपशब्द प्रदूषण भी बढ़ा है। अपशब्द प्रदूषण ने सार्वजनिक जीवन की छंदबद्धता व लय को नष्ट कर दिया है।

कभी कभी जल्दबाजी में उपयुक्त शब्द नहीं निकलते लेकिन सार्वजनिक जीवन के अति प्रतिष्ठित लोग भी सुनियोजित ढंग से सोच समझ कर ही अपशब्द बोल रहे हैं। राष्ट्र की क्षति हो रही है। सार्वजनिक बहसों के गिरते स्तर का सीधा प्रभाव संसदीय संस्थाओं पर भी पड़ा है। संसद और विधान मण्डल देश के भाग्य विधाता हैं।

तीसरी चौथी लोकसभा तक संसद में सुन्दर शब्द बोलने की प्रतिस्पर्धा थी। अब परिदृश्य बदल गया है। शब्द प्रयोग में शालीनता और संयम का अभाव दिखाई पड़ता है। परस्पर तू-तू मैं-मैं के दृश्य भी दिखाई देते हैं। विधान मण्डलों की स्थिति भी चिंताजनक है। राष्ट्रजीवन में निराशा व चिंता बढ़ी है। संसद सार्वजनिक बहसों को उच्चस्तरीय व प्रेरक बनाने का मंच भी है।

लोकसभा से गाँव सभा तक सार्वजनिक बहसों की चिंताजनक धारा है। यह सब उस देश में हो रहा है जहां हजारों वर्ष पहले सभा और समितियों में सुन्दर बोलने की प्रतिस्पर्धा थी। शब्द माधुर्य की अभिलाषा सहस्त्रों वर्ष पहले ऋग्वेद, अथर्ववेद के रचनाकाल में भी थी। ऋग्वेद में प्रार्थना है कि ‘‘हमारा पुत्र सभा में सुन्दर बोले। यशस्वी हो।”

अथर्ववेद (9-1) में स्तुति है- हमारी जिह्वा का अग्रभाग मधुवाणी से युक्त हो। मूल भाग भी मधुर हो। हम तेजस्वी वाणी भी मधुरता के साथ बोलें। वाणी मधुर हो।‘‘ वैदिक साहित्य में मंत्रों के छोटे समूह को सूक्त कहते हैं। सूक्त का अर्थ सु-उक्त (सुन्दर कथन) है। तब सुंदर कथन की अनिवार्यता थी। लुडविग जैसे विद्वानों के अनुसार वैदिक काल में सभा और समितियां महत्वपूर्ण विषयों पर प्रेमपूर्ण बहस करती थीं।

उत्तर वैदिक काल में शास्त्रार्थ परंपरा में भी परस्पर आत्मीयता थी। लेकिन आधुनिक भारत में सार्वजनिक बहसों में व्यक्तिगत आक्षेपों, उत्तेजक मानहानिकारक शब्दों का प्रयोग सर्वत्र दिखाई पड़ रहा है। देश के सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं व भिन्न भिन्न क्षेत्रों के शीर्ष महानुभावों को सार्वजनिक बहसों को शालीन बनाने के लिए प्रयत्न करने चाहिए।

(लेखक की सोशल मीडिया पोस्‍ट से साभार)