के. विक्रम राव 

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में गैर-कांग्रेसी समूहों तथा जमातों के भूले-बिसरे,  वस्तुतः उपेक्षित प्रसंगों को नरेंद्र दामोदरदास मोदी उजागर कर रहे हैं। बड़ी कामयाबी से। राष्ट्रीय इतिहास अब तक विकृति के कर्करोग से ग्रसित हो गया था। कथित कथाकार मोहम्मद इरफान हबीब तथा रोमिला थापर जैसों का मार्जन अब हो रहा हैं। 1 नवंबर 2022 को  बाँसवाड़ा (राजस्थान) के मानगढ़ धाम में कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के संग राष्ट्रीय पुराख्यानों को मोदी ने दुरुस्त किया।

जनसभा में प्रधानमंत्री के संग उनके भाजपाई मुख्यमंत्री भूपेन्द्र रजनीकांत पटेल (गुजरात) और शिवराज सिंह चौहान भी थे, क्योंकि मानगढ़ उन तीनों के राज्यों की सीमा पर बसा है। मानगढ़ धाम में ब्रिटिश राज के विरुद्ध ही भील आदिवासियों की बगावत मात्र नहीं थी, वरन वह सभी शोषक वर्गों, रियासतदारों, साहूकारों, शराब माफिया, भाड़े के हिंदुस्तानी सिपाहियों और सामंती गुर्गों के खिलाफ जनक्रांति थी।

प्रधानमंत्री ने जनजाति के लड़ाकुओं का उल्लेख भी किया जिसमें झारखंड के भगवान बिरसा मुंडा थे जिनकी जेल में ही मृत्यु हो गयी थी। सिद्धू और कान्हू मुर्मू (1855), संथाली तिलक मांझी (1784), लोहारदगा के लरका संघर्ष में (18वीं सदी) बुधु भगत इत्यादि भी इन्‍हीं में थे। मोदीजी ने खासकर तेलुगु भाषी क्रांतिकारी अल्लूरी सीताराम राजू को याद किया जिन्होंने सागरतटीय आंध्र प्रदेश से फिरंगियों को खदेड़ा था।

इन सारे इंकलाबी लोगों ने माहौल पैदा कर दिया था कि भारत कभी भी गुलामी बर्दाश्त नहीं करेगा। मगर इन शूरवीरों की गाथा उतनी चर्चित नहीं रही जो तुलनात्मक रूप से यह सिद्ध तो करता है कि एक कुटुंब विशेष के अलावा भी भारतीय जन थे जिनका उत्सर्ग है। 

मानगढ़ की कहानी कई दृष्टि से भिन्न है, जोरदार है। यह भील जनजाति के वीरों की गाथा है। भील वही हैं जिनमें रानी मां शबरी थी, जिनका जूठन राम ने खाया था। राजा पूंजा भील भी थे जिसने चित्तौड़ केसरी महाराणा प्रताप की मुगल अकबर के खिलाफ मदद की थी।

भारत के मूल निवासी भील हैं, उनका वर्णन पुराणों में मिलता है, यह एक स्वच्‍छंद जनजाति रही है। भील युद्ध में आखिरी सांस तक लड़ते हैं। इसी जनजाति के डांग के राजा भारत के एकमात्र वंशानुगत शासक हैं। सम्राट अशोक ने भी गृहयुद्ध में भील सेना के सहयोग से विजय पाई थी। भील राजा विक्रमादित्य के सहयोगी रहे। वहीं मेवाड़ के शासकों की विजय पताका फहराने में भील सरदारों का अहम योगदान रहा। मराठों के विजय अभियान में भी भीलों की मदद महत्वपूर्ण रही।

मानगढ़ का भारत के क्रांतिकारी मानचित्र में विशेष स्थान है। कई मायने में जलियांवाला बाग से भी अधिक क्रूरतापूर्ण और वेदना भरा है। अमृतसर में कर्नल रेजिनाल्ड डायर के भाड़ेवाले सिपाहियों ने बैसाखी मनाती निहत्थी जनता पर गोली चलाई थी। आकडों के हिसाब से तब 379 लोग शहीद हुए थे, 1250 घायल हुए थे। इतिहासकर उसी को सर्वाधिक क्रूर और निकृष्टतम संहार बताते हैं।

मगर मानगढ़ कहीं अधिक जालिमाना रहा। मानगढ़ में अंग्रेज सैनिकों द्वारा करीब पंद्रह सौ आदिवासियों की हत्या की घटना दर्ज है। जालियांवाला बाग कांड से करीब 6 साल पहले, (17 नवंबर, 1913) को राजस्थान-गुजरात सीमा पर स्थित बांसवाड़ा जिले में अंग्रेजों ने करीब 1500 भील आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया था। परंतु आदिवासियों की इस शहादत को इतिहासकारों ने तवज्जो नहीं दी। मसलन, राजस्थान के इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसे महज ‘भीलों का उत्पात’ की संज्ञा दी है। 

दक्षिणी राजस्थान और गुजरात की सीमा पर स्थित बांसवाड़ा जिले के बाँगड़ की मानगढ़ पहाड़ी पर आदिवासी अस्मिता और उनके ऐतिहासिक बलिदान का स्मारक है। इस स्थान को राष्ट्रीय धरोहर बनाने की मांग बार-बार की जाती रही है। मानगढ़ गवाह है भील आदिवासियों के अदम्य साहस और अटूट एकता का, हालांकि यह एकजुटता गोविंद गुरू के नेतृत्व में ही बनी थी, जो स्वयं लंबाडा (बंजारा समाज) के थे। गोविंदगुरू का जीवन भील समुदाय के लिए समर्पित रहा। खास बात यह है कि उनके नेतृत्व में हुए इस ऐतिहासिक विद्रोह के निशाने पर केवल अंग्रेज नहीं थे बल्कि वे स्थानीय रजवाड़े भी थे जिनके जुल्मो-सितम से भील समुदाय के लोग कराह रहे थे।

यह सारा क्षेत्र आदिवासी बहुल है। मुख्यतः यहां भील आदिवासी रहते हैं। स्थानीय सामन्त, रजवाड़े तथा अंग्रेज इनकी अशिक्षा, सरलता तथा गरीबी का लाभ उठाकर इनका शोषण करते थे। इनमें फैली कुरीतियों तथा अंध परम्पराओं को मिटाने के लिए गोविंदगुरु के नेतृत्व में एक बड़ा सामाजिक एवं आध्यात्मिक आंदोलन हुआ जिसे ‘भगत आंदोलन’ कहते हैं। 1890 के दशक में शुरू किए गए इस आंदोलन में अग्नि को प्रतीक माना गया था। अनुयायियों को अग्नि के समक्ष खड़े होकर धूनी करना होता था।

सन 1883 में उन्होंने ‘सम्प सभा’ की स्थापना की। इसके द्वारा उन्होंने शराब, मांस, चोरी, व्यभिचार आदि से दूर रहने; परिश्रम कर सादा जीवन जीने; प्रतिदिन स्नान, यज्ञ एवं कीर्तन करने; विद्यालय स्थापित कर बच्चों को पढ़ाने, अपने झगड़े पंचायत में सुलझाने, अन्याय न सहने, अंग्रेजों के पिट्ठू जागीरदारों को लगान न देने, बेगार न करने तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी का प्रयोग करने जैसे सूत्रों का गांव-गांव में प्रचार किया।

कुछ ही समय में लाखों लोग उनके भक्त बन गये। प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को सभा का वार्षिक मेला होता था, जिसमें लोग हवन करते हुए घी एवं नारियल की आहुति देते थे। लोग हाथ में घी के बर्तन तथा कन्धे पर अपने परम्परागत शस्त्र लेकर आते थे। मेले में सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं की चर्चा भी होती थी। इससे बाँगड़ का यह वनवासी क्षेत्र धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार तथा स्थानीय सामन्तों के विरोध की आग में सुलगने लगा।(जारी)
(लेखकी की सोशल मीडिया पोस्‍ट से साभार)
(मध्‍यमत)
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