सरयूसुत मिश्रा

अभी तक हिजाब पर समाज बंटा हुआ था लेकिन अब तो भारत की सुप्रीम आवाज भी बंट गई है। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने हिजाब पर दो फैसले दिए हैं।  स्कूलों में हिजाब पर प्रतिबंध को एक न्यायाधीश ने सही ठहराया है तो दूसरे न्यायाधीश ने लड़कियों की शिक्षा को जरूरी माना और पहनावे में धार्मिक आधार के अप्रोच को सही नहीं माना। 

अभी तक तो हिजाब को लेकर अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के अलग-अलग विचार थे। धर्म के ठेकेदारों के विचार तो हमेशा अलग होते ही हैं। जीवन का परम लक्ष्य विचारों से ऊपर होता है लेकिन सारी मनुष्यता विचारों के द्वन्द में ही उलझी हुई है। पूरे विश्व में दो व्यक्तियों के अंगूठे की रेखाएं एक जैसी नहीं होतीं। परम शक्ति ने प्रत्येक इंसान को मौलिक और बेजोड़ बनाया है। इसी मौलिकता के साथ व्यक्ति समाज देश और धर्म को आगे क्यों नहीं बढ़ने दिया जाता? धर्म और समाज अपनी-अपनी पट्टियां टांग कर क्यों मौलिकता को नष्ट करने में सारी ऊर्जा खर्च करता है? हिजाब का मामला तो अब समाज से उठकर सुप्रीम अदालत के दरवाजे पर पहुंच गया है अब इसमें बड़ी बेंच ही फैसला देगी।

भारत धर्मनिरपेक्ष देश है। हिजाब की प्रथा इस्लामिक देश में प्रचलित है। इस्लाम के अनुयायी भारत में हिजाब का उपयोग करते हैं। यह विवाद कर्नाटक में स्कूल में यूनिफॉर्म को लेकर प्रारंभ हुआ है। कर्नाटक सरकार ने स्कूल में ड्रेस कोड अनिवार्य किया, जिस पर मुस्लिम समुदाय की ओर से विरोध किया गया।  कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस मामले में राज्य सरकार के यूनिफॉर्म के नियम को स्वीकार किया।  स्कूलों में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध को सही माना। उच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में मामला डबल बेंच में विचाराधीन था। अब यह मामला बड़ी बेंच में जाएगा तब तक कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब प्रतिबंधित रहेगा।

कर्नाटक में विवाद शुरू हुआ था तब किसी ने यह नहीं सोचा था कि ईरान में हिजाब को लेकर ही इतना बड़ा तूफान आएगा। आज तो ईरान में हालात ऐसे बन गए हैं कि लड़कियां महिलाएं बड़ी संख्या में हिजाब की अनिवार्यता के खिलाफ सड़कों पर आंदोलन कर रही हैं। ईरान की नैतिक पुलिस हिंसा का सहारा ले रही है। तमाम सारे संकट झेलने के बाद भी हिजाब का विरोध रुकने का नाम नहीं ले रहा है। कई इस्लामिक देशों में हिजाब पर पहले से प्रतिबन्ध लगा हुआ है।  भारत में यह प्रतिबंध का विषय नहीं है बल्कि स्कूलों में यूनिफार्म का विषय है। यूनिफॉर्म होने के कारण हिजाब स्कूलों में नहीं पहना जा सकता। बाजार में या कहीं और हिजाब पहनने पर भारत में कोई प्रतिबंध नहीं है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि महिलाओं के लिए हिजाब ए इक्तयारी जरूरी है या महिला की स्वतंत्रता। देखते-देखते समाज में कितनी तेजी के साथ बदलाव हो रहा है। पचास साल पहले महिलाओं को लेकर जो स्थितियां थी क्या आज वैसी रह गई हैं? कौन सा फील्ड ऐसा है जिसमें महिलाएं अब पुरुषों से आगे दिखाई नहीं पड़ रही हैं। जब भी परीक्षा के परिणाम आते हैं तो अक्सर खबर पढ़ने को मिलती है कि लड़कियों ने ही बाजी मारी।

महिलाओं को लेकर विचार इतना छोटा क्यों होना चाहिए कि उनकी पुरुषों के समान खुली सामान्य वेशभूषा समाज में कोई अराजकता पैदा करे? महिलाओं को कमजोर क्यों समझा जाता है? जब पुरुषों के साथ किसी तरह के प्रतिबंध की बात नहीं की जाती तो फिर महिलाओं के लिएअनिवार्यता क्यों होना चाहिए? जैसे-जैसे शिक्षा का प्रकाश बढ़ता जाएगा अपने आप खान-पान, पहनावा, भाषा-धर्म जाति, ऊंच-नीच का भेदभाव घटता ही जाएगा। 

प्रकृति तो किसी चीज को ढककर नहीं रखती। प्रकृति को तो सोया हुआ परमात्मा कहा जाता है। स्त्री प्रकृति के सृजन का सबसे बड़ा प्रतीक है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हिजाब के मामले में अपने फैसले में यह माना है कि हिजाब इस्लाम धर्म का हिस्सा नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायधीश ने इस विचार को भी सही नहीं माना है। उनका कहना है कि धार्मिक प्रथाओं की अवधारणा ही इस विवाद के निपटारे के लिए जरूरी नहीं है। उनकी राय है कि इस तरह के प्रतिबंध लगाकर क्या हम लड़कियों के जीवन को बेहतर बना सकते हैं? उन्होंने लड़कियों की चॉइस का सम्मान करने की बात कही है।

सर्वोच्च न्यायालय के दूसरे न्यायाधीश ने अपने फैसले में जो आधार बताया है, उसके अनुसार धर्मनिरपेक्षता सभी नागरिकों पर लागू होती है। छात्र अपने धार्मिक विश्वास, धर्मनिरपेक्ष संस्थान पर लागू नहीं कर सकते। ड्रेस को तय करने का अधिकार देने वाला सरकारी आदेश कानून का उल्लंघन नहीं है। हिजाब के खिलाफ राय देने वाले न्यायाधीश का कहना है कि ऐसा कोई कानून नहीं जो व्यक्ति की निजता के अधिकार को प्रभावित करता हो। आपके अधिकार से कानून व शासन व्यवस्था प्रभावित नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि एक धार्मिक समुदाय को खास पहनावे की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह धर्म निरपेक्षता के खिलाफ होगा।

अब हिजाब विवाद का अंतिम निराकरण तो सर्वोच्च अदालत की बड़ी बेंच द्वारा फैसला आने के बाद ही हो सकेगा। दुनिया के दूसरे देशों में जिस तरह के अनुभव सामने आ रहे हैं उनको देखकर तो हिजाब की अनिवार्यता के विचार का समर्थन करना भविष्य में भारत में इसके खिलाफ लड़कियों के विद्रोह को हवा देना जैसा होगा।

ईरान में भी पहले कभी नहीं सोचा गया होगा कि हिजाब की अनिवार्यता के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन होगा। ईरानी महिलाएं इस भेदभाव को समाप्त करने के लिए जी-जान से लड़ रही हैं। क्या यह महिलाओं द्वारा सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक और राजनीतिक दमन की घोर अस्वीकृति नहीं है? धार्मिक विश्वास को थोपने पर क्या इस तरह की प्रतिक्रियाएं समाज को सकारात्मक संदेश दे रही हैं?

महिलाओं के उत्थान, देश की तरक्की और समाज की बेहतरी के लिए सामाजिक प्रतिबंधों और अनिवार्यता की सदियों से चली आ रही व्यवस्थाओं को बदलने के बारे में क्या अब नहीं सोचा जाना चाहिए? भविष्य के लिए आज खड़ा नहीं हुआ गया तो फिर आने वाली पीढ़ियों के हाथों में ना मालूम हम क्या देंगे?
(सोशल मीडिया से साभार)
(मध्‍यमत)
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