कोरोना के सबक – 1
प्रमोद शर्मा

दुनिया में तीन प्रकार की समस्याएं होती हैं- दैविक, दैहिक और भौतिक। कोरोना महामारी एक दैविक समस्या है। इन दिनों इस समस्या से पूरी दुनिया परेशान है। पिछले करीब डेढ़ साल से हमारा पूरा देश इस भीषण आपदा से जूझ रहा है। इस साल तो यह महामारी पिछले साल की तुलना में कई गुना अधिक भीषणता से फैली है। वर्तमान समय में शायद ही ऐसा कोई परिवार बचा होगा, जो इस समस्या से दो-चार न हुआ हो। इस महामारी में सभी ने कुछ न कुछ खोया है। लाखों लोग अस्पतालों में उपचार कर रहे हैं तो किसी ने अपने संबंधी, मित्र और परिचितों को खो दिया है।

हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी महामारी ने मानव जाति को इस कदर परेशान किया हो। इसके पहले भी ऐसा होता रहा है। कोई भी महामारी या प्राकृतिक आपदा हो, वह मानव सभ्यता का चाहे कितना भी विनाश कर ले, लेकिन वह हमें कई सबक भी देकर जाती है। आपदा द्वारा दिए गए सबक और अनुभवों को ही आधार बनाकर मानव सभ्यताएं भविष्य के और अधिक सुंदर और भव्य समाज का निर्माण भी करती रही हैं। इन्हीं अनुभवों की तर्जनी को थामकर भावी पीढ़ियों ने विकास की राह पर अपने कदम बढ़ाए हैं।

यह सच है कि कोरोना महामारी ने मानव सभ्यता का भारी नुकसान किया है, लेकिन उसने हमारे लिए कई अनुभव भी दिए हैं। हम जितने जल्दी इन सबक और अनुभवों को समझकर आत्मसात करेंगे, उतनी ही जल्दी न केवल महामारी से निजात पाएंगे अपितु जीवन को भी पहले की भांति पटरी पर ला सकेंगे। हालांकि यदि आपने इन संकेतों को अनदेखा किया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह और अधिक दुखदायी और परेशानीदायक हो सकता है।

कोरोना महामारी का पहला और सबसे अहम सबक यह है कि- ‘पहला सुख निरोगी काया।‘ बल्कि अब तो यह कहना अधिक समीचीन होगा कि- ‘सर्वम् सुख निरोगी काया।‘ बहुत पहले अपने दादाजी से ये सूक्ति अक्सर सुनता आया था। इस बात का सीधा मतलब तो मेरी समझ में बचपन में ही आ गया था, लेकिन यह सूक्ति किशोरावस्था और युवावस्था तक कई बार सुनने के बावजूद मेरे गले नहीं उतरी। अपने आसपास जब मैं भौतिक सुख-सुविधाओं भरा जीवन देखता तो मुझे स्वयं और अपने परिवार की माली हालत देखकर बहुत दुख होता। मुझे लगता दादाजी की यह सूक्ति सही नहीं है।

जीवन में सुख तो केवल धन-दौलत से ही आता है, क्योंकि उसी के जरिए सुविधाएं प्राप्त की जा सकती हैं। यही कारण रहा कि जीवन के कई साल बीतने के बावजूद उक्त सूक्ति के लिए मन में पूरी तरह से स्वीकारोक्ति नहीं बन सकी। कहते हैं न कि-‘व्यक्ति ठोकर लगने के बाद ही ठाकुर बनता है।‘ सो, इस कोरोना महामारी ने कम से कम मुझे यह बात भली प्रकार समझा दी कि- वाकई, पहला और अंतिम सुख निरोगी काया ही होता है। वर्तमान संदर्भों में बात करें तो वास्तव में आज वही व्यक्ति और परिवार स्वयं को सुखी कहने का सच्चा अधिकारी है, जो निरोगी है। जो वर्तमान में किसी अस्पताल में भर्ती होने के लिए चक्कर नहीं लगा रहा है और दवाई की दुकानों और पैथालॉजी लैब में खड़ा होकर अपनी रिपोर्ट आने का इंतजार नहीं कर रहा है।

कोरोना महामारी के इस दूसरे दौर में ऐसे कई अनुभव और उदाहरण सामने आए, जब लोगों की सारी दौलत मिट्टी हो गई। वे लाखों रुपए होने के बावजूद अपने प्रियजन के लिए एक सांस भी नहीं खरीद सके। लोग लाखों रुपए लेकर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में भटकते रहे और उन्हें एक ऐसा बेड नहीं मिला, जिसमें ऑक्सीजन की सुविधा हो और उनके प्रियजन की जिंदगी बचाई जा सके। महामारी की इस लहर में लोगों की जिंदगी के साथ अमीर-गरीब का भेद भी एक प्रकार से बह गया। पैसे का कोई मोल ही नहीं बचा। उन लोगों को भी अपने स्वास्थ्य के लिए उन साधारण अस्पतालों में भर्ती होना पड़ा, जहां जाना वे अपनी शान के खिलाफ समझते थे। मतलब, बीमारी की विभीषिका ने लोगों को इस कदर मजबूर कर दिया कि वे किसी भी प्रकार बस अपनी जिंदगी बचाना चाहते थे।

इस सारी भयावहता के दौरान वे लोग भी अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक और सचेत हो गए, जिन्होंने कभी भी अपनी सेहत पर कोई ध्यान नहीं दिया था। रसूखदार लोगों को अस्पतालों में बेड के लिए, ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए, इंजेक्‍शन के लिए, सीटी स्कैन कराने के लिए और यहां तक कि अंतिम संस्कार के लिए भी सामान्य लोगों के सामने गिड़गिड़ाते देखा गया। ऐसी अनेक घटनाएं आपने सामने भी निश्चित रूप से आई ही होंगी। पता नहीं आपने इनसे क्या सबक लिया और क्या सीखा?

किन्तु इन सारी घटनाओें ने मेरी आंखें अवश्‍य ही खोल दीं। इनका सीधा-सीधा मतलब यह था कि- पहला सुख निरोगी काया। यदि आप स्वस्थ हैं, आपको कोई बीमारी नहीं है तो आप सबसे अधिक सुखी हैं। ऐसी महामारी के दौर में न तो पैसा किसी को सुखी रख सका, न पद-प्रतिष्ठा किसी को क्षणभर के लिए सुख दे पाई और न ही रसूख से लोग अपने लिए सुख खरीद सके। बस, सुख था तो उस व्यक्ति के पास था जो पूरी तरह से स्वस्थ था।

इसलिए, मेरी दृष्टि में कोरोना महामारी का पहला सबक यही है कि हम धन-दौलत खूब कमाएं, पद-प्रतिष्ठा भी पाएं, लेकिन सबसे पहले अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। धन-दौलत या पद पाने के लिए अपने स्वास्थ्य को दांव पर कभी न लगाएं क्योंकि यदि आपने सुविधाएं पाने लिए स्वास्थ्य खो दिया तो आप उन सुविधाओं का कभी उपभोग ही नहीं कर पाएंगे और यदि आपका स्वास्थ्य बना रहा तो आपको सुख पाने के लिए सुविधाओं की जरूरत ही महसूस नहीं होगी। तो आइए, महामारी के इस पहले संदेश को समझें और आत्मसात करें। किसी भी परिस्थिति में अपने स्वास्थ्य को बनाए रखें। अस्तु। (क्रमश:)
(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
—————-
नोट- मध्‍यमत में प्रकाशित आलेखों का आप उपयोग कर सकते हैं। आग्रह यही है कि प्रकाशन के दौरान लेखक का नाम और अंत में मध्‍यमत की क्रेडिट लाइन अवश्‍य दें और प्रकाशित सामग्री की एक प्रति/लिंक हमें madhyamat@gmail.com पर प्रेषित कर दें।संपादक