राकेश अचल 

मेरा भारत महान है क्योंकि यहां सबको अपने मन की करने की आजादी है। ये आजादी क़ानून से कम रसूख से ज्यादा हासिल होती है। कोरोनाकाल में जब जिंदगी बचाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है तब ये आजादी निजी अस्पतालों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गयी है।  सोने के इस अंडे का आमलेट निजी अस्पतालों के संचालक और सरकारी अफसर मिलाकर खा रहे हैं। मामला है स्वास्थ्य बीमा की कैशलेस योजनाएं लेने वालों की फजीहत का।

आप जानकर हैरान होंगे कि आपके पास देश की कोई भी स्वास्थ्य बीमा योजना हो लेकिन आपको उसका लाभ तत्काल नहीं मिल सकता, खासतौर पर तब जब की आपको कोरोना का इलाज कराना हो। यदि आप किसी निजी अस्पताल की सेवाएं लेना चाहेंगे तो अस्पताल में आपसे नगद धन देने की मांग की जाएगी। आपका बीमा कार्ड देखा तक नहीं जाएगा। अस्पतालों की इस दादागीरी को प्रशासन और नियामक संथाएं आंखें बंद कर देख रही हैं।

पूरे देश का तो हमें नहीं पता किन्तु हमारे मध्यप्रदेश के नंबर वन कहे जाने वाले शहर इंदौर से लेकर हर छोटे-बड़े शहर में यही सब हो रहा है। निजी अस्पताल वाले कैशलेस बीमा धारक को बिना नगद लिए इलाज करने के लिए तैयार ही नहीं हैं। वे आपको बिल दे सकते हैं लेकिन कैशलेस इलाज की सुविधा नहीं। इंदौर में सरकारी वकील जयंत दुबे अपनी पत्नी को लेकर एक निजी अस्पताल गए तो वहां उनसे स्वास्थ्य बीमा मेडिक्लेम होने के बावजूद एक लाख रुपया नगद जमा करने को कहा गया। सुदामा नगर के नारायण भूतड़ा ने भी यही समस्या झेली।

ये कहानियां एक नारायण भूतड़ा या जयंत की नहीं बल्कि सैकड़ों-हजारों लोगों की है। आपको जानकार हैरानी होगी की भारत सरकार की आयुष्मान योजना के कार्ड धारकों को भी कोरोना के इलाज के लिए नगद रुपया देना पड़ रहा है,  लेकिन कहीं कोई सुनने वाला नहीं है। प्रशासन ऐसे मामलों में जांच करने और कार्रवाई करने की बात तो करता है लेकिन कभी कार्रवाई नहीं करता क्योंकि ज्यातर निजी अस्पताल रसूखदार लोगों के होते हैं। असंख्य शिकायतों के बावजूद प्रदेश में न तो सरकार ने और न स्थानीय प्रशासन ने निजी अस्पताल संचालकों से इस बारे में खुलकर कुछ कहा है और न ही एक भी मामले में कोई प्रभावी कार्रवाई की है।

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान स्वास्थ्य बीमा धारकों को निजी अस्पताल भाव ही नहीं दे रहे। भोपाल में एक निजी अस्पताल में कोरोना से संक्रमित पूरे परिवार का इलाज करने के लिए एक महिला को अपना मकान तक बेचना पड़ा लेकिन उसे बीमा का लाभ नहीं दिया गया। कायदे से इस संकट के दौर में जिला प्रशासन को निजी अस्पताल संचालकों के साथ बातचीत कर साफ़ निर्देश देना चाहिए थे कि कोई भी बीमा योजनाओं का अनादर नहीं करेगा। अधिकांश बीमा योजनाएं भारत शासन से मान्यता प्राप्त और जमानत प्राप्त होती हैं ऐसे में कोई अस्पताल बीमा कंपनियों से अनुबंध करने के बावजूद इलाज के लिए नगद पैसा कैसे मांग सकता है?

आपको जानकार आश्चर्य होगा की भारत में स्वास्थ्य पर सत्तर फीसदी पैसा नागरिकों को जेब से खर्च करना पड़ता है,  सरकार केवल 30 फीसदी ही खर्च कर पाती है। सरकार की उदासीनता का ही प्रतिफल है कि देश में अभी भी 56 फीसदी आबादी के पास कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं है जबकि अमेरिका में सरकार 45 फीसदी खर्च देती है और बाक़ी निजी क्षेत्र से आता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 130 करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश में मात्र 44 प्रतिशत लोग ही स्वास्थ्य बीमा के दायरे में आते हैं। चूंकि मैं अमेरिका मैं बैठकर आपके लिए लिख रहा हूँ इसलिए मैं स्वास्थ्य बीमा की तुलना अमेरिका से ही करना चाहता हूँ। आपको शायद पता है या नहीं किन्तु हकीकत ये है कि भारत में स्वास्थ्य पर कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का सिर्फ 4.7 प्रतिशत ही खर्च होता है,  जबकि अमेरिका में कुल जीडीपी का 18 प्रतिशत खर्च होता है।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2013-14 में देश की 76 प्रतिशत आबादी के पास पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा कवर नहीं था। इस संख्या में वर्ष 2016-17 में गिरावट आई और यह 56 प्रतिशत पर आ गया। यानि देश में मोदी सरकार के आने के बाद स्वास्थ्य बीमा का धंधा तो चमका लेकिन जब इसके इस्तेमाल का मौक़ा आया तो ग्राहक अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं। आपको शायद पता नहीं होगा कि हमारे यहां अभी भी आठ प्रतिशत आबादी नियोक्ता के द्वारा स्वास्थ्य बीमा कवर दायरे में हैं।  26 प्रतिशत राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत हैं। 10 प्रतिशत ईएसआईसी के अन्तर्गत हैं और 0.26 प्रतिशत केंद्र सरकार के स्वास्थ्य बीमा योजना के दायरे में कवर पाते हैं।

हमें ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि मोदी सरकार की आयुष्मान योजना ने स्वास्थ्य बीमा की दिशा में काफी फेरबदल किया। इस योजना में देश के 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य संबंधी लाभ दिलाया जाना है। इस योजना से सभी सरकारी अस्पताल और देशभर के करीब 9000 से अधिक अस्पताल जुड़े हैं। योजना की शुरुआत के पहले दो सप्ताह में ही 38, 000 लोगों ने इसका लाभ उठाया। लेकिन कोरोना काल में यह योजना भी बेअसर साबित हो रही है। सरकारी अस्पताल खुद पहले से बीमार हैं,  वे मरीजों को इस योजना का पूरा लाभ दे ही नहीं पा रहे।

हकीकत ये है कि कोरोना काल को यदि आप भूल भी जाएँ तो स्वास्थ्य बीमा देश में भ्रष्टाचार का एक नया क्षेत्र बन गया है। स्वास्थ्य क्षेत्र को जहां भी बीमा से जोड़ा गया है,  वहां इलाज का खर्च अपने आप बढ़ जाता है। इसकी बड़ी वजह ये है कि अस्पताल और डॉक्टर बीमा कंपनियों से हाथ मिला लेते हैं और ‘ओवर बिलिंग’ करते हैं। मरीज और उसके परिजन इसलिए उसमें ज्यादा दखल नहीं देते,  क्योंकि उनकी जेब से कुछ नहीं जा रहा होता है। इसका परिणाम होता है कि इलाज का खर्च बढ़ जाता है। गरीब लोग इस बीमा की वजह से बड़े निजी अस्पतालों में इलाज कराने जाते हैं,  मगर इलाज का 60 फीसदी हिस्सा वह होता है बीमा कवर में नहीं आता और वह पैसा मरीज को अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। इसलिए कोई गरीब अस्पताल में जाकर ऐसा फंस जाएगा कि जब वह ठीक होकर अस्पताल से घर आएगा तब तक उसकी एक बड़ी जमापूंजी खत्म हो चुकी होगी।

आज जरूरत इस बात की है कि सदी कि इस सबसे बड़ी आपदा के समय स्वास्थ्य बीमा के क्षेत्र में हो रही इस मनमानी और धांधली को सख्ती से रोका जाये। राज्य सरकारें सुनिश्चित करें कि जिनके पास कैशलेस बीमा योजनाएं हैं उन्हें परेशानी का सामना न करना पड़े।  लेकिन लगता नहीं है कि ऐसा हो पायेगा, क्योंकि देश के स्वास्थ्य मंत्री खुद जीवन रक्षक इंजेक्शन के दाम 450 रुपये के बजाय 3500 रुपये दिलाने के लिए कंपनियों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। मेरा इशारा आप समझ गए होंगे कि कोरोना का मरीज किस इंजेक्शन का मोहताज है आजकल।(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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