राकेश दुबे

देश के राजनीतिक दलों को किसान फिर याद आने लगे हैं, प्रधानमंत्री मोदी ने 28 फरवरी, 2016 को घोषणा की थी कि उनकी सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर देगी, इस घोषणा में मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी स्वर मिलाया था। वर्ष 2022 बीत गया, और यह कोरस भी गुज़र गया।  इसके बाद अब, यह जांच का विषय तो जरूर है कि यदि वास्तव में आय दोगुनी हो गई होती तो आखिर वह कितनी होती?

अगर दोगुनी आय के वादे की जांच करें तो इसमें छलावे के अलावा कुछ भी नहीं है। राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण के 77वें राउंड के अनुसार 2019 पर आधारित खेती से औसत किसान परिवार की शुद्ध मासिक आय मात्र 816.50 रुपये थी। महंगाई की मार को देखते हुए आप इसे दोगुनी भी कर देते तो क्या फर्क पड़ता?

किसान की आय बढ़ाने के लिए पहली बात यह कि लागत खर्च घटे जो कि सब्सिडी बहाल करते हुए कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने से होगा। दूसरा यह है कि कृषि उत्पादों के खरीद मूल्यों में इतनी वृद्धि तो हो कि किसानों को एक निश्चित स्तर का लाभ सुनिश्चित हो सके जिससे उनके परिवार का जीवन गरिमापूर्ण ढंग से चल पाए।

यहां स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश अनुसार सी-2+50 फीसदी के फार्मूले के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण हो। तीसरा यह है कि ग्रामीण रोजगार में उल्लेखनीय इजाफा हो। सार्वजनिक क्षेत्र की स्थायी नौकरियों को भरे जाने का मुद्दा छोड़ा नहीं जा सकता। इस संबंध में मनरेगा को बड़े पैमाने पर लागू किया जाए।

कृषि उत्पादों में अनाज, कपास, गन्ना, सब्जियां, फल, फूल, बागबानी, चाय, काफी, मसाले, वानिकी, पशुपालन, पोल्ट्री, डेयरी उत्पाद इत्यादि शामिल हैं, जिन्हें किसान-खेत मजदूर कच्चे माल के रूप में पैदा करते हैं। इसमें लागत खर्च के रूप में पूंजी लगती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महंगाई के बढ़ने और सब्सिडी की मात्रा लगातार घटने से लागत खर्च बहुत बढ़े हैं।

मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया द्वारा मूल्य योग यानी वैल्यू एडिशन के साथ एक निश्चित मार्केट भाव पर तैयार वस्तु के रूप में पक्का माल बिकता है, जिसका अच्छा खासा हिस्सा उपभोक्ता के रूप में वही ग्रामीण लेते हैं जो कि खुद कच्चे माल के उत्पादक भी हैं। कच्चे माल को तैयार माल बनाकर बेचने में जो अतिरिक्त मूल्य यानी मुनाफा अर्जित होता है, उसकी मात्रा अचंभित करने वाली है। यह बेतहाशा मुनाफा जो बटोर रहा है उसे परंपरागत तौर पर बिचौलिया कहा जाता रहा है, परंतु अब वह कार्पोरेट के रूप में स्थापित हो गया है। जिसे हर तरफ और हर तरह से मदद मिली है |

वह केवल राष्ट्रीय परिधि तक सीमित न होकर अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी का रूप ले चुका है। न केवल कृषि उत्पादों के मूल्य निर्धारण बल्कि बीज, खाद, कीटनाशक जैसी लागत वस्तुओं पर भी कॉर्पोरेट का वर्चस्व स्थापित हो रहा है। दरअसल किसान आंदोलन के दबाव में रद्द हो चुके तीन कृषि कानून भी कृषि क्षेत्र में कार्पोरेट के निर्बाध प्रवेश के उद्देश्य से ही लाए गए थे।

उत्पादन, विपणन और वितरण की इस आर्थिक शृंखला में अर्जित होने वाले महामुनाफे में उत्पादक किसानों का हिस्सा क्यों नहीं हो,  आज यह एक अहम सवाल है? आज भारत में आर्थिक असमानता की खाई शर्मनाक अनुपात में बढ़ी है। फसलों व सभी कृषि उत्पादों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के नाम पर सरकार आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता की बहानेबाजी करने लगती है। किसान मजदूरों द्वारा लिए गए मामूली कर्जे वापस न लौटा पाने की सूरत में उनकी भूमि व अन्य संपत्तियां कुर्क करने में देर नहीं लगती।

पैदा किये जाने के समय और बाद में भाव के मामले में प्याज, लहसुन, टमाटर, आलू, सेब आदि की जो दुर्गति होती है, वह किसी से छिपी नहीं है। तमाम कृषि उत्पादों से बनने वाले तैयार माल की बिक्री से होने वाले मुनाफे में कच्चा माल पैदा करने वाले का हिस्सा क्यों नहीं हो? अलबत्ता जिन नीतियों से इसे संभव बनाया जा सकता है वह नीतिगत विकल्प एक निश्चित आर्थिक व राजनीतिक बदलाव से जुड़ा हुआ है।

इसके अलावा तीन कानूनों की वापसी के उपरांत एक बड़ा सवाल न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी का भी उठता है, जिसका लिखित आश्वासन 9 दिसंबर, 2021 को केंद्र सरकार ने संयुक्त किसान मोर्चा को दिया था, परंतु इससे संबंधित कमेटी गठन की अधिसूचना में सरकार अपने वादे से मुकर गई। लागत मूल्य बढ़ने और जलवायु में आए अभूतपूर्व परिवर्तनों से होने वाली फसलों की विफलता के दृष्टिगत किसान कर्ज से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता।

बेशक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का अंश पहले जैसा न हो परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की जनसंख्या के दो तिहाई हिस्से की आजीविका कृषि पर निर्भर है।
(मध्यमत)
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