ख़्वाबों की भीड़ से
कई सालों से दूर हूँ,
फूलों पे चल रहा हूँ मैं
छालों से दूर हूँ….

पढ़ लेगा तेरा नाम
कोई मेरी शक्ल से,
मुद्दत से इसलिए मैं
उजालों से दूर हूँ ….

जब तू नहीं था साथ मेरे
ये थे सब मगर,
मैं अब तसव्वुर से
ख़यालों से दूर हूँ….

कल तक भी मुझे
दूर से ही पूछते रहे,
मैं आज भी दुनिया के
सवालों से दूर हूँ ….

अच्छा हुआ कि कोई
मेरा घर ना बन सका,
दरवाज़ों, कुन्दियों से मैं
तालों से दूर हूँ….

जब से लिखा है ख़ुद पे
तेरा नाम और पता,
मैं इनके, उनके, सबके
हवालों से दूर हूँ ….

ऐसा क़माल कर दिया
तेरे क़माल ने,
सारे तिलिस्म, जादू
क़मालों से दूर हूँ ….

(साभार- विवेक कुमार जैन, आगरा)