राकेश अचल

वर्षों पहले ‘आ गले लग जा’ नाम से एक फिल्म आई थी। बड़ी अच्छी फिल्म थी, मैंने इस फिल्म को न जाने कितनी बार देखा था। मुमकिन है कि आपमें से बहुत से मित्रों ने देखा हो इस फिल्म को। इस फिल्म का केंद्रीय विषय ही गले लगना था। खैर! गले लगना और गले लगाना आत्मीय प्रेम के प्रदर्शन का एक बहुप्रचलित तरीका है। साहित्य के लोग इसे ‘आलिंगन’ कहते हैं। क्यों कहते हैं,  ये मुझे नहीं पता? पता करने की कभी कोशिश ही नहीं की, क्योंकि बीते अनेक दशकों में न कोई मेरे गले लगा और न किसी ने मुझे अपने गले लगाया। कोरोनाकाल तो अब आया है, लेकिन गले लगने-लगाने का काम तो वर्षों से बंद है।

दरअसल समाज में प्रेम इतना औपचारिक शब्द बन गया है कि उसका आवेग ही मर गया। मुझे याद है कि आखरी बार  सात साल पहले मैंने अपनी बेटी को विदा करते समय गले लगाया था,  आठवें साल बेटे के पास अमेरिका से वापसी के समय पुत्रवधु गले लगी थी। तब से अब तक भावुकता के अनेक क्षण आये-गए लेकिन गले कोई नहीं लगा। लोग अब गले लगते ही नहीं हैं। लोगों को गले पड़ने में मजा आता है। गले लगना और गले पड़ना दोनों अलग-अलग क्रियाएं हैं। मजे की बात ये है कि गले लगना जितनी नैसर्गिक क्रिया है उतनी ही गले पड़ना कृत्रिम।

एक जमाना था जब गले लगना बेहद आम बात थी। तब समाज में ही नहीं राजनीति में भी गले लगना सहज था।  हम जब भी अपने मामा या दादी के घर जाते थे तो हमें देखते ही हमारे रिश्तेदार ऐसे गले लगते थे जैसे गाय से बिछड़ा हुआ बछड़ा। गले लगने में जो सहज क्रिया है उसे आम बोलचाल की ही नहीं बल्कि शायरी की भाषा में भी ‘तपाक’ कहा जाता है। ‘तपाक’ यानी वेग, आवेग, संवेग। ये तीनों भाव मन से जुड़े हैं। पता नहीं कौन सी ग्रंथि इन्हें संचालित करती है। यदि आपके मन में किसी के प्रति ये तीनों भाव हैं तो आप सामने वाले से ‘तपाक’ से ही गले लगेंगे, ठीक वैसे ही जैसे लता किसी विटप से लगती है।

हमारे भोपाल वाले डॉ. बशीर बद्र साहब जानते थे कि गले लगने में जो ‘तपाक’ छुपा है वो बड़ा ही खतरनाक है। यदि आप हर किसी से ‘तपाक’ से गले लगने लगे तो मुमकिन है कि नए मिजाज के शहरों में कोई आपसे हाथ भी न मिलाये। आपको याद है न बशीर बद्र साहब की चेतावनी-
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे ‘तपाक’ से
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो

बशीर साहब की ये चेतावनी लगता है अब पूरी दुनिया ने (कम से कम भारत वालों ने तो) गाँठ में बाँध ली है। कोई ‘तपाक’ से गले मिलता ही नहीं है। न समाज में, न सियासत   में और न सिनेमा में। सब जगह हाय! हैलो!! चलने लगी है।  ऐसे में यदि कोई भला और भावुक आदमी किसी को अपने गले से लगा ले तो उसकी तस्वीरें वायरल हो जाती हैं। पहले प्रेम को ये वायरल रोग नहीं हुआ करता था। लोग खुलकर एक-दूसरे के गले लगते थे। किसी को, किसी का डर नहीं था।

यदि आपने अपने जीवनकाल में किसी को गले लगाया होगा तो आप इसके प्रताप को, इसके ताप को आसानी से समझ सकते हैं। गले लगने वाला कोई भी हो यदि उसमें आत्‍मीयता मौजूद है तो आवेग भी होगा और सुखानुभूति भी। जरूरी नहीं है कि आप अपनी प्रेमिका के ही गले मिलें। माँ, बाप, भाई, बहन, चचा, मामा, दोस्त, रिश्तेदार कोई भी हो सकता है गले लगने वाला। गले लगना वासना का नहीं स्नेह का प्रतीक है। जब कोई आपके गले लगता है तो एक शून्य उत्पन्न होता है जिसमें आप एक-दूसरे के हृदय के स्पंदन को साफ़-साफ़ सुन सकते हैं। ये स्पंदन ही संवेदना का स्रोत है। आप अति प्रेम या अति शोक में ही किसी के गले लगकर उस भाव को अनुभव कर सकते हैं।

हाल की बात है कि मध्यप्रदेश की पूर्व मंत्री श्रीमती इमरती देवी और नवनियुक्त केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की एक ऐसी ही भावुक करने वाली तस्वीर सामने आयी। दरअसल इस तस्वीर को सियासी ‘वायरल’ हो गया है। वायरल के गुण से आप अवगत ही होंगे। इससे देह में पीड़ा होती है, नाक बहने लगती है, गले में खराश हो जाती है,  हरारत सी लगती है। इस तस्वीर को वायरल करने वाले इन्हीं सब लक्षणों से पीड़ित दिखाई देते हैं। एक अरसा हुआ जबसे मैंने सियासत में ऐसी भावुक करने वाली तस्वीर नहीं देखी। इस तस्वीर को देखकर मेरे मन में क्षोभ की जगह करुणा ने जन्म लिया,  क्योंकि अब ऐसी तस्‍वीरें बनती ही नहीं हैं और यदि बनती भी हैं तो वे खिंचती नहीं हैं और मान लीजिये वे खिंच भी जाएँ तो उनका सम्बन्ध किसी न किसी ‘हनी-ट्रैप’ से जोड़ दिया जाता है।

सातवें आठवें दशक तक इस तरह की तस्वीरें सियासत में ही नहीं समाज में भी आम थीं। धीरे-धीरे लोगों के बीच में ‘तपाक’ वाला स्नेह कम हुआ तो ऐसे तस्वीरें भी नदारद हो गयीं। देश में अनेक प्रधानमंत्री और मंत्री हुए हैं जो ऐसी तस्वीरों के लिए जाने जाते हैं। हमारे सूबे में भी ऐसे सहज नेताओं की कमी नहीं थी जो इस तरह सहज ही और तपाक से आपको अपने गले लगा लें।  अब तो जब हाथ मिलाना दूभर है तब ऐसी तस्वीरें किसी को कैसे पच सकती हैं? लेकिन पचना चाहिए। कम से कम सियासत में काम करने वालों को अपना हाजमा बढ़ाना चाहिए। पिछली आधी सदी के अपने पत्रकारिता के पेशे में मैंने ऐसे अनेक दृश्य देखे हैं,  मेरे पास अनेक ऐसी तस्वीरें हैं भी…

सिंधिया परिवार का जहाँ तक सवाल है, उसमें ये परम्परा बहुत आम है। मैंने राजमाता विजयाराजे सिंधिया, उनके पुत्र माधवराव सिंधिया, उनकी बेटियों वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे को अपने समर्थकों के साथ गले लगते खूब देखा है। दिग्विजय सिंह तो इस मामले में और भी ज्यादा सहज हैं।  अर्जुन सिंह भी बड़े भावुक नेता थे। गांधी परिवार के तो सभी नेता इस उदारता के लिए चर्चित ही नहीं बदनाम तक रहे। बलराम जाखड़ या एनडी तिवारी की तो ऐसी न जाने कितनी तस्वीरें आपको देखने को मिल जाएँगी,  लेकिन समय बदला तो आलिंगन का स्वरूप भी बदल गया और अब स्थिति ये है कि ये ‘ अपाच्य’ हो गया है। इसे घृणित नजर से देखा जाने लगा है। पूर्व वालों को हम म्‍लेच्‍छ कहते हैं लेकिन आज भी वहां गले लगना या सांकेतिक चुंबन करना सभ्यता का अंग बना हुआ है।

इस मामले में मुझे न तो किसी को चरित्र प्रमाण पत्र देना है और न किसी से लेना है। चरित्र अब एक विवादास्पद विषय है लेकिन तस्वीर असली चीज है। तस्वीर के भाव बताते हैं कि हकीकत क्या है? इस समय मैं अमेरिका में हूँ अन्यथा आपको आलिंगन के ऐसे चित्र दिखाता कि आप द्रवित हो जाते। मेरे पास ऐसे अनेक चित्रों का संग्रह है।

आज तो नेता इतने डरपोक हो गए हैं कि मरने के डर से सात स्तरीय सुरक्षा घेरों के भीतर रहते हैं, वे क्या खाकर किसी को अपने गले लगाएंगे। उन्हें तो राहुल गांधी का गले पड़ना भी बेवकूफी लगता है। लेकिन मैं बार-बार कहता हूँ कि आज के असहिष्णु हो चुके समाज को ‘आलिंगन’ की सख्त जरूरत है। आप यदि किसी की वेदना कम करना चाहते हैं, सांत्वना देना चाहते हैं, भरोसा दिलाना चाहते हैं तो केवल पांव मत छूने दीजिये सामने वाले को कहिये- ‘आ गले लग जा’ पांव छूना एक बार सामंती वृत्ति से जोड़ा जा सकता है किन्तु गले लगने को नहीं। क्योंकि कोई सामंत आसानी से किसी को अपने गले नहीं लगाता

‘आ गले लग जा’, ये चार शब्द कहने के लिए कलेजा चाहिए, नैतिक बल चाहिए, एक सुकोमल हृदय चाहिए,  जो दुर्भाग्य से अब ज्योतिरादित्य जैसे बहुत कम लोगों के पास बचा है। पिछले साल दलबदल करने की वजह से मैं ज्योतिरादित्य सिंधिया के सख्त खिलाफ हो गया था, लेकिन इमरती देवी के साथ उनकी तस्वीर देखकर मुझे ख़ुशी हुई कि ज्योतिरादित्य के पास अभी भी पुरखुलूस दिल ज़िंदा है। उनके ऊपर अभी भी संकीर्णता की छाया नहीं पड़ी है। किसी को गले लगाने से आपके चरित्र पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरा तो अपने सभी मित्रों से आग्रह है कि वे अपनी-अपनी स्मृति पर जोर डालें और याद करें कि वे कब और किस से आखरी बार गले लगे थे। ठीक ऐसे ही जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया इमरती देवी से मिले हैं। (मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
—————-
नोट- मध्‍यमत में प्रकाशित आलेखों का आप उपयोग कर सकते हैं। आग्रह यही है कि प्रकाशन के दौरान लेखक का नाम और अंत में मध्‍यमत की क्रेडिट लाइन अवश्‍य दें और प्रकाशित सामग्री की एक प्रति/लिंक हमें madhyamat@gmail.com पर प्रेषित कर दें।संपादक