राकेश अचल 

आज बात न सियासत की है और न संक्रमण की। आज बात करते हैं उन दो शब्दों की जो जिंदगी के लिए बहुत जरूरी हैं। शब्दों की तह तक जाना भाषाविदों/व्याकरणाचार्यों का काम होता है लेकिन हम जैसे लोग केवल भाव पर केंद्रित रहते हैं। मेरा बेटा जिसे मैंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आजकल मुझे सिखाता है कि कामयाब होना है तो ’इगनोर’ करना सीखो! इससे पहले मेरी मां मुझे सिखाती थी कि अगर कामयाब होना है तो ’गोर’ करना सीखो।

आज जब मैं लगातार स्वर्गारोहण की तरफ बढ़ रहा हूँ तब इन दोनों शब्दों के बीच में उलझकर रह गया हूँ। समझ नहीं पा रहा कि ’इगनोर’ करूँ या ’गोर’। ’इगनोर’ अंग्रेजी का शब्द है और ‘गोर’ एकदम देशज शब्द। ‘ इगनोर’ का अर्थ होता है अनदेखा करना या नजरअंदाज करना जबकि ’गोर’ का अर्थ होता है गान, गायन, चर्चा। अगर आप कामयाब होना चाहते हैं तो आपको इन दो शब्दों के बीच से अपना रास्ता चुनना पडेगा। आप किसी घटना, मान-अपमान, हिंसा-अहिंसा, भ्र्ष्टाचार, अशिष्टता, अनाचार, अत्याचार को ’इगनोर’ कर भी कामयाब हो सकते हैं या फिर इन सबकी समाज में चर्चा करके, इनका यशगान या इनके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करके यानि इनका ’गोर’ करके कामयाब हो सकते हैं। इन दो शब्दों में ही जवीन की सफलता का रहस्य छिपा है। ’इगनोर’ करना शतुरमुर्ग की तरह रेत में सर छिपाना भी है। ’इगनोर’ की क्रिया ’इग्नोरेंस’ होती है। जो ये कर सकता है वो सब कर सकता है। लेकिन ’इगनोर’ करना आसान काम नहीं है।’इगनोर’ करना तलवार की धार पर चलने जैसा होता है।

‘इगनोर’ करने यानि आँख बंद करने के बाद कहीं कुछ रहता ही नहीं है। सब कुछ निर्विकार हो जाता है। लेकिन इस ‘इगनोर’ करने में आपकी मुद्रा का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। यदि ’इगनोर’ करते समय आपकी मुद्रा और भाव में साम्य नहीं हो तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। किसी को नजरअंदाज करना आपके लिए सुखद हो सकता है लेकिन किसी दूसरे के लिए अपमानजनक भी हो सकता है। इसलिए ’इगनोर’ करने के लिए इसकी साधना बहुत जरूरी है।

हमारे मामा कहते थे कि ’इगनोर’ करने के लिए आपको एकदम चिकना घड़ा बनना पड़ सकता है। चिकने घड़े पर पानी की एक बूँद एक पल के लिए नहीं ठहर सकती। ’इगनोर’ करने की कला आजकल राजनीति की पहली शर्त है। जो जितना ज्यादा ’इगनोर’ करना जानता है, वो उतना ही बड़ा नेता है। आप बड़ी से बड़ी समस्या को ’इगनोर’ करना शुरू कर दीजिये आपका आधा सिरदर्द समाप्त हो जाएगा। नजर अंदाज करने का भी अपना अंदाज होता है। यानि आपको नजर चुराना पड़ती है। जो लोग ये सब नहीं कर पाते वे कुछ भी नहीं कर पाते।

‘इगनोर’ यानि ’अनदेखी’ यानि ’नजरअंदाज’ करना, एक ही क्रिया है। आप चाहें तो इसे अपने स्वभाव में शामिल कर सकते हैं। जिन लोगों ने ’इगनोरेन्स‘ को अपना स्वभाव बना लिया है उनकी फेहरिस्‍त लेकर अगर मैं बैठ जाऊं तो शायद महीनों लग जाएँ और काम पूरा ही न हो। अंग्रेजी वाले इगनोर करते हैं तो हिंदी वाले अनदेखी और उर्दू वाले नजरअंदाज करते हैं। करते सब हैं। ‘इगनोर’ करने के लिए किसी से अनुमति नहीं लेना पड़ती। कहीं पंजीयन नहीं कराना पड़ता। किसी कतार में नहीं लगना पड़ता। यानि ’इगनोरेन्स’ से युक्त व्यक्ति पूरी तरह से आत्मनिर्भर होता है। अर्थात अपना हाथ, जगन्नाथ।

आइये अब बात ’गोर’ की करें। ‘गोर’ जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि एक देशज शब्द है। हिंदी पट्टी में प्रचलित है। अवधी, बुंदेली, ब्रज जैसी तमाम बोलियों में शामिल किया गया है इस शब्द को। गोर करना अलग बात है और गोर गाना अलग बात। लेकिन जो ये दोनों काम कर लेते हैं, वे जमाना जीत सकते हैं, यानि कि दुनिया को अपनी मुठ्ठी में कर सकते हैं। गोर उस बात या व्यक्ति का करना चाहिए जो आपके लिए फायदेमंद हो। गलत गोर करने से आपका नुक्सान भी हो सकता है। गोर करने के लिए देशकाल और परिस्थिति का आकलन करना पड़ता है। ये योग्यता समय के साथ खुद-ब-खुद आती है। इसका कोई डिग्री या डिप्लोमा कोर्स नहीं बना है अब तक।

‘इगनोर’ और ’गोर’ के बाद आइये ’नजरअंदाज को भी समझ लें। जो लोग लखनऊ में रहते हैं वे इस कला में न सिर्फ माहिर होते हैं बल्कि उस्ताद भी हो जाते हैं। किसे नजरअंदाज करना है, कैसे करना है और कब करना है ये सब अभ्यास से ही आता है। अगर आपने गलत व्यक्ति को नजरअंदाज कर दिया तो आपका घाटा भी हो सकता है, इसलिए ये जानना बहुत जरूरी है कि पात्र कौन है और सुपात्र कौन है? इस कला में सारा खेल नजर का है, इसीलिए इसे नजरअंदाज करना कहते हैं।

मुझे लगता है कि मुझे ’इगनोर’, अनदेखी’ औ र’नजरअंदाज’ के उदाहरण देने की कोई जरूरत नहीं है। आप ज़रा सा ध्यान देकर सोचें तो समझ जायेंगे कि किसने, कब और क्यों आपको ’इगनोर’, अनदेखा’ और ’नजरअंदाज’ किया और इस वजह से आपको क्या नफा-नुकसान हुआ। अगर आप इसका आकलन करना सीख जाएँ तो आपकी दुनिया बदल सकती है लेकिन आपको कोई नहीं बदल सकता। अगर आप ये करना और इसे सहना सीख गए तो समझिये कि सोने में सुहागा लग गया। करेला नीम पर चढ़े बिना कड़वा नहीं हो सकता इसी तरह ’इगनोर’ हुए या किये बिना कोई भी व्यक्ति परिपूर्ण नहीं हो सकता।

‘इगनोरेन्स’ प्रूफ होने के लिए जो करना पड़ता है ये मैं बता ही चुका हूँ। मेरी तरह जो लोग सोशल मीडिया पर हैं उन्हें ’इग्नोरेंस’ का महत्व बखूबी समझ लेना चाहिए। ऐसा होने से आपके ऊपर किसी क्रिया/प्रतिक्रिया का कोई असर नहीं पडेगा। आप अपने आपको वीतरागी अनुभव करने लगेंगे। दुःख, अवसाद, क्रोध, ईर्ष्या आपसे कोसों दूर रहेगी। आप हर समय प्रेम के अथाह समुद्र में गोता लगते हुए सा महसूस करेंगे। आज का ये आलेख यदि आपके किसी काम का हो तो इसके बदले आप अपने ही शहर के अखबारों के ईमेल पते मुझे ईनाम के तौर पर भिजवा सकते हैं।(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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