राकेश दुबे

देश में ऐसा कोई राजनीतिक दल शेष नहीं है, जिसके चुनाव घोषणा पत्र में समाज के गरीब वर्ग के कल्याण की बात न कही जाती हो। चुनाव के बाद इनमें से कोई भी इस विषय को गंभीरता से नहीं लेता। वोट कबाड़ने के बाद गरीब वर्ग कल्याण को ये दल भूल जाते हैं। गाहे-बगाहे कोई संविधान संशोधन विधेयक, संसद पारित भी कर देती है तो उसे न्यायालय के प्रमाणीकरण के जिम्मे छोड़ दिया जाता है।

देश की सर्वोच्च अदालत के आये ताजा निर्णय के बाद अब शिक्षा और नौकरी में गरीब सवर्णों को भी आरक्षण का लाभ मिल सकेगा। पांच सदस्यों वाली संविधान पीठ ने तीन-दो के बहुमत से एक 103वें संविधान संशोधन की वैधता को बरकरार रखते हुए यह फैसला दिया। प्रधान न्यायाधीश यू.यू. ललित और न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट्ट ने इस संविधान संशोधन को वैध नहीं माना, जबकि तीन न्यायाधीशों न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी,  न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी और न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने इसके पक्ष में फैसला दिया।

यह फैसला स्वागतयोग्य माना जाना चाहिए, क्योंकि संविधान पीठ ने इस मुद्दे की मूल भावना को केंद्र में रखते हुए उसे तरजीह दी और सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर तबके को ऊपर लाने और इस दिशा में सरकार के प्रयासों पर अपनी सहमति दी। हालांकि आरक्षण हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है और इससे जुड़े मुद्दों को लेकर विवाद उठते रहे हैं। ऐसे में इस पर सहमति-असहमति बनना भी स्वाभाविक है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2019 में 103वां संविधान संशोधन लागू कर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण लागू किया था। लेकिन इस संविधान संशोधन को संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन बताते हुए इसकी वैधता को चुनौती दी गई थी।

दुर्भाग्य, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आरक्षण सुनिश्चित करने वाले इस संविधान संशोधन के विरोध के पीछे बड़ा कारण यह बताया गया कि इससे संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन होता है। प्रधान न्यायाधीश ने भी अपने फैसले में इस को रेखांकित किया है। उन्‍होंने अपने फैसले में कहा कि संविधान सामाजिक न्याय के साथ छेड़छाड़ की इजाजत नहीं देता है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आरक्षण देना संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ है।

लेकिन संविधान पीठ के जिन जजों ने इसके पक्ष में फैसला सुनाया, वे सभी इस बात पर सहमत थे कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को दस फीसद का आरक्षण संविधान के बुनियादी ढांचे का कहीं से उल्लंघन नहीं करता। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि न्यायमूर्ति पारदीवाला ने साफ कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आरक्षण अनिश्चितकाल के लिए नहीं बढ़ाना चाहिए। संविधान पीठ के बहुमत वाले सदस्यों ने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आरक्षण इसलिए भी जरूरी है ताकि समतावादी समाज के लक्ष्य की ओर एक सर्वसमावेशी तरीके से आगे बढ़ना सुनिश्चित किया जा सके।

सर्वोच्च अदालत के इस फैसले के बाद सरकार के लिए अब बड़ी चुनौती इस फैसले पर अमल की है। देखना होगा कि सरकार कैसे ईमानदारी के साथ इसे लागू करवाती है। सत्तारूढ़ दल को भी चुनाव लड़ना है और कमोबेश सारे दल अपने किसी वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहते। आरक्षण को लेकर एक बड़ा सवाल अब तक यही उठता रहा है कि सामाजिक रूप से जिन पिछड़े और दबे-कुचले वर्गों को इसका लाभ देकर ऊपर लाना चाहिए था, उसमें सरकारें अब तक क्यों सफल नहीं हो पार्इं? आरक्षण का लाभ लेकर हर तरह से संपन्न बने लोग भी इसका लाभ उठा रहे हैं। आरक्षण को लेकर एक तार्किक नीति बनाने की मांग भी लंबे समय से उठती रही है। अब इसे और बल मिलेगा।

आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण देने के पीछे भी मूल भावना यही है कि सिर्फ आर्थिक अभाव की वजह से कोई अवसरों में न पिछड़े। अगर सरकार और राजनीतिक दल वाकई देश के कमजोर तबकों को ऊपर उठाना चाहते हैं तो इसे सिर्फ चुनावी फायदे के रूप में देखने की प्रवृत्ति से मुक्ति पानी होगी।
(मध्यमत)
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