राकेश दुबे

आगामी संसद सत्र के दौरान कुछ ऐसा हो सकता है। “ग्राहकों की सहमति के बगैर डाटा का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं हो। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से ग्राहकों का संबंध खत्म होने के बाद यूजर के निजी डाटा को हटाना अनिवार्य हो। बैंक में खाता खुलवाने के लिए सिर्फ केवाईसी के लिए जरूरी डाटा ही लिया जाये। कंपनियों पर बेवजह लोगों का निजी डाटा हासिल करने पर रोक लगे। और यह सब तब होगा डाटा सुरक्षा के नये विधेयक के मसौदे पर सरकार द्वारा मांगे गये सुझाव 17 दिसंबर तक संसद को मिलें और बजट सत्र में इस पर कानून बन जाये।”

वैसे यह आगामी चुनावी प्रचार के रोचक मुद्दों में से एक है। सत्ता पक्ष का दावा है कि देश में हो रहे बड़े पैमाने पर विकास को डाटा की सस्ती कीमत से समझा जा सकता है, जबकि विपक्षी नेता राहुल गांधी के अनुसार ईवीएम की तर्ज पर सोशल मीडिया से भी चुनावी प्रक्रिया और लोकतंत्र को प्रभावित किया जा सकता है।

इस सब में बेंगलुरु की एक निजी संस्था ने लाखों लोगों के व्यक्तिगत संवेदनशील डाटा को इकट्ठा करने की कोशिश की, जिसकी जांच सरकार कर रही है। सब जानते हैं,इंटरनेट आने के बाद भारत में 2000 में आइटी कानून बनाया गया। उसके बाद सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स, डिजिटल पेमेंट आदि का विस्तार होने पर 2011 में आईटी इंटरमीडियरी नियम बने। इसके बाद जस्टिस एपी शाह समिति की रिपोर्ट के आधार पर 2012 में पहली बार डाटा सुरक्षा कानून का मसौदा तैयार हुआ।

डाटा सुरक्षा पर विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच ने 2017 में डाटा प्राइवेसी के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला दिया। उसके बाद जस्टिस श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट के आधार पर 2018 और फिर 2019 में नये कानून का ड्राफ्ट जारी हुआ। सरकार ने 2021 में नया बिल संसद में पेश किया, पर उसे वापस ले लिया गया। तब से सरकार भ्रम और विरोधाभास दूर करने की जो बात कहती आ रही है, यह उसका अगला कदम है।

सरकार कह रही है इस संतुलित कानून से भारतीय ग्राहकों को डिजिटल सुरक्षा मिलने के साथ स्टार्टअप अर्थव्यवस्था को लाभ होगा। इससे ग्राहकों की सहमति के बगैर डाटा का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं हो पायेगा। इसके दो और प्रावधानों को बहुत ही प्रगतिशील बताया जा रहा है। पहलाा- अठारह साल से कम उम्र के बच्चों को नाबालिग मानते हुए उनका डाटा हासिल करने के लिए अभिभावकों की स्वीकृति जरूरी होगी। दूसरा- पुरुष वाचक ‘ही’ जैसे शब्दों के बजाय महिलाओं के लिए ‘शी’ और ‘हर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल होगा।

लेकिन पिछले दस सालों से हो रही विधायी मेहनत और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के गंभीर बिंदुओं का इस ड्राफ्ट में अभाव है। 2019 के बिल में अपराधों को स्पष्ट तौर पर परिभाषित करने के साथ कठोर दंड के प्रावधान थे, जिनका इसमें स्पष्ट अभाव है। ग्राहकों के लिहाज से देखें, तो टेक कंपनियों से हर्जाना वसूलने के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। उसके उलट गलत जानकारी देने या फिर गलत शिकायत करने पर आम ग्राहक पर 10 हजार रुपये तक का जुर्माना लग सकता है। पुराने बिल में ग्राहकों को एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म में जाने के लिए डाटा पोर्टबिलिटी का प्रावधान था, जो इसमें नहीं है।

किसी भी डाटा सुरक्षा कानून को सफल बनाने के लिए इंटरनेट और टेक कंपनियों का भारत में रजिस्ट्रेशन जरूरी होना चाहिए। इससे भारत के सभी कानून लागू करने के साथ उनके डिजिटल कारोबार से टैक्स की वसूली भी हो सकती है। लेकिन इस बारे में नया बिल मौन है। इस कानून को लागू करने के लिए डाटा सुरक्षा बोर्ड के गठन का प्रावधान है, जिसके पास सिविल कोर्ट के पावर होंगे। लेकिन बोर्ड का गठन सरकार करेगी, जिससे उसके अधिकार और स्वायत्तता पर अनेक सवाल खड़े हो रहे हैं।

डाटा कारोबार में मुनाफे के बड़े खेल को देखते हुए सरकार ने पुराने बिल में बड़ी कंपनियों के कारोबार के चार प्रतिशत तक जुर्माना वसूलने का प्रावधान किया था, लेकिन अब कानून के उल्लंघन पर ढाई सौ करोड़ रुपये तक के जुर्माने के साथ सभी नियमों के तहत मिलकर अधिकतम 500 करोड़ का जुर्माना ही लग सकता है। यदि भारत में यूरोपीय कानून की तर्ज पर सख्त डाटा सुरक्षा कानून नहीं लागू हुआ, तो फिर टेक कंपनियों पर जुर्माना और उसकी वसूली कैसे सफल होगी? एक बड़ा प्रश्न है।

भारत को वर्तमान में एक आधुनिक और प्रगतिशील डिजिटल संहिता की जरूरत है. अस्सी करोड़ से ज्यादा डिजिटल यूजर्स वाले भारत में डाटा सुरक्षा का कानून जनता और सरकार के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी बहुत अहम है। डाटा के अवैध कारोबार से सोशल मीडिया में फर्जी खबरें, लोन एप्स का फर्जीवाड़ा, साइबर बैंकिंग फ्रॉड, ई-कॉमर्स में चीटिंग, अवैध गेम्स जैसे अनेक साइबर अपराध निरंतर बढ़ रहे हैं। 5जी और 6जी के आने के बावजूद डाटा सुरक्षा पर व्यापक, स्पष्ट और प्रभावी कानून नहीं बनना भारत के संसदीय तंत्र की विफलता को दर्शाता है।
(मध्यमत)
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