अजय बोकिल

देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर की रफ्तार कुछ धीमी भले पड़ी हो, लेकिन कोरोना मरीजों के मरने के आंकड़े कम नहीं हो रहे हैं, दूसरी तरफ जो इलाज से बच रहे हैं, वो कोविड अस्पतालों की लूट के कारण मरने पर विवश हैं। भोपाल के एक निजी अस्पताल में मोदी सरकार की आयुष्मान स्वास्थ्य योजना के तहत इलाज न करने का बेरहम वीडियो वायरल होने के बाद यह बात सामने आ रही है कि केवल भोपाल का यह बड़ा अस्पताल ही नहीं और भी कई अस्पताल आयुष्मान कार्ड पर इलाज करने से या तो इंकार कर रहे हैं या फिर दूसरे कारण बताकर ऐसा करने से बच रहे हैं। ऐसे अस्पतालों पर सरकार ने क्या ठोस कार्रवाई की है, यह ज्यादा किसी को नहीं मालूम। लोगों को शंका है कि ऐसा कुछ होगा भी।

यह समस्या केवल आयुष्मान कार्ड धारियों की ही नहीं है, उन मेडिक्लेम पॉलिसीधारियों की भी है, जो पॉलिसी ले चुकने के बाद निश्चिंत भाव से अस्पताल में भर्ती हो गए थे कि उनका इलाज ‘कैशलेस’ में हो जाएगा। लेकिन कोरोना यहां भी उन्हें ठेंगा बता रहा है। कई अस्पताल कोविड मरीजों का कैशलेस इलाज करने के बजाए मरीजों से पहले नकद पैसे रखवा रहे हैं और कार्डधारियों को कंपनी से रिएम्बर्स करवाने की सलाह दे रहे हैं। अर्थात पहले हमारा बिल चुका जाओ, बाद में कंपनी से अपना भुगतान लेते रहना। ऐसे में अनेक कोरोना पेशंट दोहरी मार झेल रहे हैं, एक तरफ अस्पतालों के अनाप-शनाप बिल तो दूसरी तरफ मेडिक्लेम की बैसाखी भी नाकाम।

पेशंट और परिजनों के सामने पहाड़-सा सवाल यह है कि एकदम इलाज के लाखों रुपये लाएं कहां से? लॉक डाउन में उधार लेकर या परिचितों से पैसा जुटाना भी आसान नहीं है। ऐसे आड़े वक्त में भी मेडिक्लेम काम नहीं आ रहा तो इसे लिया किसलिए था? ऐसे कई सवाल मन को मथ रहे हैं। हकीकत यह है कि जहां कई निजी अस्पताल अपना सिस्टम चरमराने के बाद भी पेशंट को निचोड़ने में कसर नहीं छोड़ रहे, वहीं कोरोना पेशंट के भारी-भरकम क्लेम्स देने में बीमा कंपनियां भी हाथ खींच रही हैं। अस्पतालों का कहना है कि चूंकि बीमा कंपनियां उनके बिल समय पर नहीं चुका रही हैं इसलिए वे पेशंट की गर्दन मरोड़ कर पैसा निकालेंगे। आखिर धंधे की बात है। और इस मामले में मानवता गहरे गाड़ दी जाती है।

पहले आयुष्मान कार्ड की बात। भोपाल के जिस अस्पताल का वीडियो वायरल हुआ और उसके बाद अस्पताल संचालक की सफाई वीडियो के माध्यम से सामने आई, वह तस्वीर का एक पहलू है। हालांकि यह भी सही है कि आयुष्मान योजना की सूची में शामिल सारे निजी अस्पताल ऐसा नहीं कर रहे हैं। लेकिन कई अस्पताल आयुष्मान कार्ड स्वीकार नहीं कर रहे हैं तो सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? यह दुस्साहस है, सरकार को ठेंगे पर रखना है या पैसे की महालहर में लोट लगाना है?

आयुष्मान कार्ड अस्वीकार करने का मामला भोपाल भर में नहीं हुआ है। पिछले दिनों गुजरात के राजकोट से खबर आई थी कि वहां के 33 निजी अस्पतालों ने कोरोना पेशंट्स का इलाज आयुष्मान योजना के तहत करने से इंकार कर दिया है। ऐसी ही शिकायत अजमेर के एक बड़े अस्पताल और पंजाब के अस्पतालों से भी आई थी। जबकि आयुष्मान कार्ड का मतलब मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी गरीब हितैषी राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना से है, इसे तीन साल पहले लागू किया गया। इसके दो हिस्से हैं, पहला है- हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम जिसे आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना कहा जाता है और दूसरा है, हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर योजना।

केन्द्र सरकार का दावा है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है। योजना में 54 फीसदी सरकारी और 46 फीसदी निजी अस्पतालों को शामिल किया गया है। तकरीबन सभी सरकारी अस्पतालों में इस योजना के तहत इलाज किया जाता है। लेकिन सभी निजी अस्पताल इसे मान्य नहीं करते। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक योजना के तहत देश भर में कुल 21 हजार 573 अस्पताल सूचीबद्ध हैं। यह योजना मुख्य रूप से गरीबों के मुफ्त इलाज से सम्बन्धित है। मरीजों को तीन स्तरीय अस्पतालों में सरकारी खर्च पर पांच लाख रुपये प्रति परिवार तक का इलाज मिलता है।

चूंकि जन स्वास्थ्य के साथ-साथ इस योजना का राजनीतिक उद्देश्य भी है, लिहाजा राजनीतिक दलों की एक आंख इसके सियासी लक्ष्य पर रहती है। यही कारण है कि गैर भाजपाशासित राज्यों में इस योजना का नाम बदलकर उसमें या तो मुख्य मंत्री शब्द जोड़ दिया गया है या फिर उसे लागू ही नहीं किया है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में यह योजना अब जाकर लागू की गई है। आयुष्मान कार्ड पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर जरूर होती है, ऐसे में राज्यों की कोशिश होती है कि उनके मुख्यमंत्री भी आयुष्मान कार्ड पर झलकें। मानकर कि मरीज मुफ्त इलाज के साथ अपनी वोटिंग लाइन भी तय कर लेता है। बताया जाता है कि योजना के तहत देश भर में 50 करोड़ से ज्यादा लोगों के आयुष्मान कार्ड बन चुके हैं।

अब सवाल यह कि जब सरकार इलाज का खर्च दे रही है तो निजी अस्पताल आयुष्मान योजना के तहत इलाज करने से क्यों इंकार कर रहे हैं? इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं, जिसमें सरकारी पैसा समय पर न मिलना भी शामिल है। बीबीसी ने हाल में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जिसके मुताबिक आयुष्मान योजना के तहत शामिल अस्पतालों की संख्या जरूरत के हिसाब से काफी कम है। दूसरे, ये अस्पताल भी गांवों से काफी दूर हैं। तीसरे सभी सूचीबद्ध अस्पतालों में कोविड 19 के इलाज की सुविधा नहीं है। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण कारण निजी अस्पतालों में इलाज के बिल योजना की तय सीमा से बहुत अधिक होना है। जबकि निजी अस्पताल में कोविड मरीज 10 दिन भी रह लिया तो बिल 10 लाख रुपये का बनना मामूली बात है।

‍ऐसे बिल का बाकी पैसा कौन देगा? लिहाजा निजी अस्पतालों की दिलचस्पी उन मरीजों के इलाज पर ज्यादा होती है, जो मोटी मुर्गियां हैं या फिर अपना पेट काटकर भी बिल चुकाते हैं। जाहिर है कि इसमें गरीब की कोई जगह नहीं है। आयुष्मान योजना में इलाज से इंकार की असली वजह यही है। चूंकि ज्यादातर निजी अस्पतालों के संचालकों की राजनीतिक पहुंच होती है, इसलिए उनका बाल बांका होने की संभावना नहीं के बराबर होती है। कुछ हुआ भी तो लीपापोती के लिए होता है।

बहरहाल, परेशानी तो उन मेडिक्लेम पॉलिसी धारकों की भी है, जो इसके तहत कोविड का इलाज करवा रहे हैं या करवा चुके हैं। मेडिक्लेम कार्ड होते हुए भी कई निजी अस्पताल कोविड का इलाज कैशलेस कराने से मुंह मोड़ रहे हैं। पेशंट से कहा जा रहा है कि वह पहले अस्पताल का बिल भुगतान कर दें, बाद में कंपनी से पैसा लेते रहें। देश में स्वास्थ्य बीमा करने वाली निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की 30 कंपनियां हैं। जानकारों के मुताबिक मोटे तौर पर ये कंपनियां 10:1 के अनुपात पर धंधा करती हैं। यानी दस लोगों का स्वास्थ्य बीमा करेंगी तो एक को क्लेम देना पड़ेगा। सो धंधा मुनाफे में चलता है।

लेकिन कोरोना में दावों के अंबार ने कंपनियों का बिजनेस मॉडल ही हिला दिया है। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में हाल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 14 मई तक स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के पास 14.8 लाख कोविड बीमा क्लेम पहुंचे थे, जिसका रुपए में मूल्य 22 हजार 955 करोड़ होता है। ऐसे में कंपनियां यथाशक्ति दावों के भुगतान में कटौती कर रही हैं। उधर हितग्राहियों की शिकायत है कि कंपनी उनके दावों का भुगतान पूरा नहीं कर रही है। जबकि कंपनियों का कहना है ‍कि कोरोना इलाज में सम्बन्धित अस्पताल हर बात के मनमाने रेट लगा रहे हैं, जो हितग्राही की पॉलिसी पात्रता सीमा से बाहर हैं, अत: उनका भुगतान संभव ही नहीं है। होगा भी तो काफी कटौती के बाद।

दरअसल स्वास्थ्य बीमा कं‍पनियां परस्पर अनुबंध के आधार पर काम करती हैं। यानी आपने जितने का पॉलिसी कवर लिया है, आप उसी के हिसाब से इलाज करवाने के पात्र हैं। आपको क्लेम भी उसी के हिसाब से मिलेगा। लेकिन कोरोना के इलाज का खर्च लगभग अंधा है। अंधा इसलिए क्योंकि दवाएं, ऑक्सीजन व अन्य जरूरी वस्तुएं काले बाजार से मनमाने रेट में खरीदनी पड़ रही हैं। ज्यादातर का बिल नहीं होता। ‍लिहाजा उसका भुगतान बीमा कंप‍िनयां नहीं देती। इस बहती गंगा में कई अस्पताल भी जमकर हाथ धो रहे हैं, मर रहा है तो केवल मरीज। फिर चाहे कोरोना से मरे या कोरोना ट्रीटमेंट के बिल से मरे।

अब सवाल यह है कि इसे कौन रोके? कौन अस्पतालों और बीमा कंपनियों के कान उमेठे? मप्र में प्रशासन ने कुछ जगह अस्पतालों की लूट को रोकने की कोशिश की है, लेकिन वह नाकाफी है। सरकार और इरडा आदेश-निर्देश जारी करती रहती हैं, कौन ठीक से पालन कर रहा है, नहीं कर रहा है और नहीं कर रहा है तो उस पर तत्काल और सख्त कार्रवाई क्या की गई है, इसकी जानकारी आम पेशंट को शायद ही मिलती है। हालांकि अगर हैल्थ इंश्योरेंस है तो बीमाधारक को क्लेम तो मिलेगा, लेकिन कई जगह चक्कर लगाने के बाद।

इसका अर्थ यह नहीं कि आयुष्मान योजना खराब है अथवा मेडिक्लेम लेने से कोई फायदा नहीं है। यकीनन फायदा है, लेकिन जरूरत इस कोरोना काल में नीति, नियम, बेईमानी, लालच और लाचारी के दुष्चक्र को तोड़कर कोविड से कराह रही जनता को प्रभावी ढंग से राहत पहुंचाने की है। वरना व्यवस्था, सरकार और अस्पतालों पर से तो लोगों का विश्वास उठ ही रहा है, ‘आयुष्मान’ और ‘मेडिक्लेम’ जैसे शब्दों पर से भी उठ जाएगा।(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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