हेमंत पाल

हिंदी सिनेमा मनोरंजन का सबसे सशक्त और सर्वसुलभ  माध्यम रहा है। दशकों से लोक मनोरंजन का सिर्फ यही एक विकल्प है। पहले टीवी और अब ओटीटी ने मनोरंजन की इस दुनिया में सेंध जरूर लगाई, पर सिनेमा की जड़ों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। क्योंकि, सिनेमा सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करता, सामाजिक बदलाव और उसके पीछे के सोच को दर्शाने का काम भी इसी का दायित्व है। सिनेमा के अलावा ऐसा कोई जरिया भी नहीं, जो ये दिखाए कि समाज में कहाँ और क्या बदलाव आ रहा है।

समाज में पुरुष वर्चस्व का ही प्रभाव सिनेमा में भी रहा है। दशकों से पुरुष प्रधान कथानक को फिल्मों में प्राथमिकता मिलती रही। कहानी का पूरा ताना-बाना किसी पुरुष पात्र के आस-पास ही घूमता रहा। ऐसी स्थिति में महिला पात्र की भूमिका को इतनी अहमियत नहीं मिली, कि वो कहानी की धारा को मोड़ दे। फिल्म की नायिका को गाहे-बगाहे विद्रोह का मौका भी मिला, तो प्रेम के वशीभूत होकर। अन्यथा श्रृंगारित नायिका का काम पुरुष पात्र को रिझाना, महिला दर्शकों को रुलाना और पुरुष दर्शकों की सहानुभूति बटोरने तक सीमित रहा है।

समय गुजरने के साथ सिनेमा में महिला पात्र की भूमिका में बदलाव भी आया, पर इसमें काफी समय लगा। उसकी पतिव्रता वाली छवि, करवा चौथ पर पति के प्रति समर्पण का भाव और भारी साड़ियों से लदी नायिकाओं ने बगावत भी की, तो उसका भी एक दायरा रहा। फ़िल्मकारों ने उसे भी पारंपरिक और समर्पित ढांचे में ही दिखाया। क्योंकि, उन्हें समाज का डर इसलिए सताता रहा कि कहीं इसका असर फिल्म की सफलता पर न पड़े। किंतु, सिनेमा के इतिहास पर नज़र डालें तो हम ऐसी नायिकाओं को भी पाएंगे, जिन्‍होंने इस मिथक को तोड़कर मुक्ति का मार्ग बनाया। लेकिन, ये कभी ट्रेंड नहीं बना।

ऐसा भी दौर आया जब हिंदी फिल्मों की नायिका ने अपनी चारित्रिक दृढ़ता को अपना हथियार बनाकर अपनी परंपरागत छवि को खंडित किया। नरगिस ने ‘मदर इंडिया’ में जो किया वो संभवतः नायिका के विद्रोह का पहला कदम था। उसके बाद दामिनी, लज्जा, मृत्युदंड, प्रतिघात, ज़ख्मी औरत, अंजाम, खून भरी मांग, और अस्तित्व की नायिकाओं ने दयनीय और मासूम इमेज को किनारे कर पुरुष सत्ता को चुनौती दी और समाज के सामने कुछ सवाल खड़े किए।

दरअसल, पचास के दशक के बाद के सिनेमा की नायिकांए मीना कुमारी, नूतन और नरगिस जैसी परम्परावादी रहीं। अमूमन साड़ी पहनने वाली इन नायिकाओं ने जो भी करना चाहा, वो अपनी आंखों से ज़ाहिर किया। क्योंकि, तब ये अपनी देह भाषा और रोमांटिक अंदाज के प्रति बेहद सचेत थी। समाज के साथ दर्शकों को भी यही भाता भी रहा। तब भी वैम्प जैसी भूमिकाएं निभाने वाली अभिनेत्रियां थी, पर उनकी भूमिकाएं  अच्छे और बुरे का अंतर दिखाने के लिए ही ज्यादा होती थीं।

ज्यादा दिन नहीं बीते जब सिनेमा पूरी तरह पुरुष केंद्रित था। महिला पात्र का काम नायक की सहचरी और त्याग करने वाली पत्नी से ज्यादा नहीं था। वो पति को आगे बढ़ने का मौका देती, उसके लिए अपनी काबलियत को हाशिए पर रख देती। याद कीजिए ‘अभिमान’ फिल्म को जिसमें जया भादुड़ी पति अमिताभ बच्चन के लिए अपनी योग्यता को किनारे कर देती है। ‘दिलवाले दुलहनियाँ’ और ‘कुछ कुछ होता है’ की लंदन रिटर्न नायिका भजन गाने में भी गुरेज नहीं करती।

कालजयी फिल्म ‘साहब बीवी और गुलाम’ की छोटी बहू अपने शराबी पति को तवायफ के यहाँ जाने से रोकने के लिए शराब पीने तक को राजी हो जाती है। पैरों में गिरकर ‘न जाओ सैंया, छुड़ा के बैयां’ गाती है। लेकिन, फिर भी जमींदारी की ठसक से भरा पति नहीं पसीजता। इसी समय में ‘तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो’ जैसा समर्पण से भरा गाना गाकर अपने असहाय होने का अहसास भी कराती है। मूक फिल्मों से ‘अछूत कन्या’ और ‘मदर इंडिया’ से होते हुए सुजाता, बंदिनी, दिल एक मंदिर, मैं चुप रहूंगी तक में नायिकाएं दशकों तक पति और परिवार की आराधक बनी रहीं।

अकसर यह सवाल उठता है, कि हिंदी फिल्मों में नायिका की दबी, कुचली और दोयम दर्जे की इमेज का दोषी कौन है। सिर्फ फ़िल्मकार को तो इसके लिए दोषी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, फिल्मों में तो वही दिखाया जाता है, जो समाज की असलियत है। ये भी नहीं कहा जा सकता कि समाज में स्त्री स्वातंत्र्य का अध्याय पूरा हो गया और स्त्री अब पुरुष के समकक्ष खड़ी है। शहरों में रहने वाली चंद आधुनिक महिलाओं को स्त्री स्वातंत्र्य का प्रतीक नहीं कहा जा सकता। वास्तव में तो आज भी कुछ नहीं बदला। न तो ओहदा न समाज की सोच।

ऐसे में फिल्मों पर तोहमत नहीं लगाई जा सकती। कुछ फिल्मों ने स्त्री जड़ता को तोड़ने का साहस जरूर किया। लेकिन, अभी बहुत कुछ बाकी है। सिनेमा में कई बार ये जद्दोजहद स्त्री के अस्तित्व को खोजने की अनवरत प्रक्रिया का हिस्सा दिखाई देता है। गॉडमदर, फायर, मृत्युदंड और ‘इश्किया’ से ‘डर्टी पिक्चर’ तक में यही सब तो हुआ। क्या तीन दशक पहले किसी ने सोचा था कि ‘अजीब दास्तां है ये, कहाँ शुरू कहाँ ख़तम’ और ‘दिल एक मंदिर है, प्यार की जिसमें होती है पूजा’ जैसे गाने गाती नायिका कभी क्वीन, हाइवे, गुलाबी गैंग और ‘पिंक’ जैसी फिल्मों में भी नजर आएगी। इसे सिनेमा में आया बड़ा बदलाव ही तो कहा जाना चाहिए।