सरयूसुत मिश्रा

कांग्रेस में गैर गांधी अध्यक्ष के चुनाव का अध्याय समाप्त हो चुका है। जैसा कि पूर्व निर्धारित था मल्लिकार्जुन खड़गे 90 फीसदी मतों के साथ अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हो गए हैं। करीब 24 साल बाद कांग्रेस को गैर गांधी बुजुर्ग राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल गया है। इसे गांधी परिवार की जीत माना जाए, कांग्रेस की जीत माना जाए या वर्तमान के लिए भविष्य की हार माना जाए?

कांग्रेस के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। यह पहाड़ इतना ऊंचा है कि खड़गे शायद उस पर चढ़ने में भी सफल ना हो पायें। समाधान तो दूर की बात है, समस्याओं को समझने और उनके निदान की पहल करना भी कांग्रेस के लिए आज चुनौती बना हुआ है। खड़गे को कांग्रेस अध्यक्ष की कमान मिलने का पार्टी को कितना फायदा और कितना नुकसान हो सकता है, प्रथम दृष्टया इसे पार्टी पर गांधी परिवार की पकड़ के रूप में देखा जाना चाहिए।

मल्लिकार्जुन खड़गे एकतरफा चुनाव जीतने में सफल हुए हैं। निकटतम प्रत्याशी शशि थरूर को जो मत मिले हैं वह कुल डेलिगेट्स के लगभग 10 फीसदी के बराबर हैं। यह जानते हुए भी कि खड़गे 10 जनपथ के उम्मीदवार हैं थरूर को 10 फीसदी मत मिलना बहुत मायने रखता है। इसका मतलब है कि हर दसवा कांग्रेसी पार्टी के अंदर वास्तविक रुप से बदलाव चाहता है। केवल चुनावी दिखावे से मुखौटे के पीछे के संचालन सूत्र को भी यह कांग्रेसी शायद बदलना चाहते हैं।

कांग्रेस के चुनाव क्रियाकांड पर तमाम तरह के सवाल उठाए गए हैं। कुछ भी माना जाए लेकिन इतना तो निश्चित है कि चुनाव हुए हैं। राजनीतिक दलों में चुनाव होना अच्छा संकेत हैं। इस दृष्टि से कांग्रेस बाकी राजनीतिक दलों पर सवाल खड़े कर सकती है। नए अध्यक्ष को पहले दिन से ही चुनौतियों से निपटना होगा। हिमाचल और गुजरात में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस मुकाबले में मानी जाती है। अगले ढाई महीने में दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम आ जाएंगे। यह परिणाम कांग्रेस और नए अध्यक्ष दोनों की दिशा तय करेंगे।

अंतर्कलह कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट दिखाई पड़ता है। चुनाव में हार का बड़ा कारण नेताओं के बीच में मतभेद माना जाता है। नए अध्यक्ष को अंतर्कलह की चुनौती से निपटना होगा। पार्टी के असंतुष्ट नेताओं को कांग्रेस के साथ जोड़ने का महत्वपूर्ण काम भी खड़गे के कंधों पर रहेगा। कांग्रेस में परिवारवाद भाजपा का सबसे बड़ा आरोप है। चुनाव की प्रक्रिया से इस आरोप से मुक्त होना थोड़ा मुश्किल है। नए अध्यक्ष के पार्टी संचालन की पद्धति और निर्णयों से यह तय होगा कि वे रिमोट कंट्रोल से संचालित हैं या स्वविवेक से काम कर रहे हैं।

वैसे इस बात की उम्मीद बहुत सीमित है कि कोई भी अध्यक्ष 10 जनपथ के इशारे के बिना पार्टी में कुछ भी कर सकता है। अध्यक्ष अकेले कुछ नहीं होता। कांग्रेस मुख्यालय में दीवारें भी 10 जनपथ से जुड़ी हुई हैं। वहां उन्हीं नेताओं का कब्जा हमेशा से देखा जाता है जिनकी नाल दस जनपथ में गड़ी हुई मानी जाती है। मल्लिकार्जुन खड़गे वैसे भी अनुभवी और वरिष्ठ नेता हैं। जीवन के सारे अनुभव भुगत चुके हैं। यह उम्र बहुत निर्णायक फैसले लेने की नहीं होती। यह ऐसा दौर होता है जब परिस्थितिजन्य फैसलों को ही अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है।

बुजुर्ग और युवा नेताओं के बीच संघर्ष कांग्रेस के लिए पिछले वर्षों में बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई युवा नेता पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में शामिल हो चुके हैं। कांग्रेस में जो भी नेता पार्टी में प्रभावशाली पोजीशन पर काबिज हैं वे सब बुजुर्ग हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे शायद स्वार्थ के प्रति लगाव भी बढ़ता जाता है। यह कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं के आचरण से समझा जा सकता है। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच में जिस तरह का संघर्ष सार्वजनिक रूप से अनुभव किया जा रहा है, उसका निदान कांग्रेस को करना होगा लेकिन यह आसान नहीं होगा।

कांग्रेस के नए अध्यक्ष ही पर्यवेक्षक के रूप में जयपुर गए थे। जहां विधायकों ने विद्रोह कर पार्टी आलाकमान का निर्देश मानने से इनकार कर दिया था। परिस्थितियां जैसी की तैसी अभी भी बनी हुई हैं। नए अध्यक्ष के रूप में खड़गे के सामने राजस्थान में उत्पन्न स्थितियों का समाधान निकालना पहली और सबसे बडी चुनौती साबित होगा।

उत्तर भारत में तो खड़गे बहुत अधिक असर डालने की स्थिति में नहीं दिखाई पड़ते। दक्षिण भारत में कांग्रेस के जनाधार को बढ़ाने में उनके योगदान को समझना जरूरी होगा। खड़गे के गृहराज्य कर्नाटक में उनके अध्यक्ष बनने के बाद राज्य नेतृत्व के वर्तमान हालात में क्या असर पड़ेगा यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा। कांग्रेस में नेताओं के बीच मतभेद की कार्यशैली को अगर देखा जाए तो ऐसा माना जा सकता है कि खड़गे समर्थकों और दूसरे नेताओं के बीच कर्नाटक में राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है।

अनुभवी होने के बावजूद वक्ता के रूप में खड़गे कोई विशेष छाप छोड़ने में अभी तक तो सफल नहीं रहे हैं। लोकसभा में नेता के रूप में उनकी भूमिका को बहुत सराहनीय नहीं माना जाता है। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें अपने बयानों और रणनीतियों को बहुत सोच समझ कर आगे बढ़ाना होगा क्योंकि उनका मुकाबला भारतीय जनता पार्टी से है। 

यदि इतिहास पर नजर डाली जाए तो कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं के बयानों को ही कई बार बीजेपी ने मुद्दा बनाया और उस मुद्दे पर जनता ने भाजपा का समर्थन भी किया। सोनिया गांधी का ‘मौत का सौदागर’ वाला बयान गुजरात में बहुत निर्णायक हुआ था। बीजेपी ने उनके इस बयान को गुजरात की अस्मिता के साथ जोड़ दिया था और चुनाव में कांग्रेस को पराजित करने में सफल हुई थी। ऐसे में खड़गे को अपने बयानों को लेकर सतर्क रहना होगा।

देश के ज्वलंत मुद्दों पर कांग्रेस को स्पष्टता के साथ जनता के सामने आना पड़ेगा। कांग्रेस को अपने इतिहास पर ही निर्भर रहने की शैली से आगे बढ़ना होगा। नए संकल्प और नए विचार जनता के सामने रखना होंगे। कांग्रेस की पुरानी ‘स्टाइल ऑफ़ फंक्शनिंग’ को तो जनता रिजेक्ट कर ही चुकी है। खड़गे कांग्रेस की ‘फंक्शनिंग स्टाइल’ में कितना बदलाव ला सकेंगे यह वक्त के साथ सामने आएगा।

राहुल गांधी यदि कांग्रेस का समाधान हैं तो हाल फिलहाल वही समस्या के रूप में भी देखे जा रहे हैं। कांग्रेस के जो भी नेता कांग्रेस से बाहर गए हैं उन सभी ने राहुल की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। राहुल को साथ लेकर समस्या को समाधान में बदलने का बहुत बड़ा दायित्व खड़गे को निभाना होगा। खड़गे के पहले भी कांग्रेस में गैर गांधी अध्यक्ष रह चुके हैं। जब भी ऐसी परिस्थितियां बनी हैं तब गांधी परिवार और कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ मतभेद ही उभर कर आए हैं।

सीताराम केसरी के बारे में तो ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में सोनिया गांधी के सामने अपनी टोपी रख दी थी। इसके बाद भी मतभेद उभरे थे। 10 जनपथ से पालित-पोषित और पल्लवित कांग्रेस नेता गैर-गांधी अध्यक्ष को सफल होने के रास्ते में कांटे बोने का काम हमेशा करते रहे हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे के सामने ऐसी परिस्थितियां न आएं इसके लिए उन्हें बहुत सावधान और सतर्क रहना होगा।

कांग्रेस को राजनीति की नई पौध तैयार करने के लिए भी लगातार प्रयास करते रहना होगा। बीजेपी नई लीडरशिप को आगे बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभाती रही है। मध्यप्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच तथा जयपुर में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच में टकराव, बुजुर्ग और युवा नेताओं के बीच में अहम के टकराव के रूप में ही देखे जाते हैं।

ऐसी परिस्थितियां कमोबेश हर राज्य में विद्यमान हैं। कांग्रेस को यदि भविष्य सुधारना है तो उसे वर्तमान के प्रभावी नेताओं से ज्यादा, भविष्य के लिए प्रभावी नेताओं को तवज्जो देना होगा। वर्तमान के नुकसान से ज्यादा भविष्य का विनाश हमेशा खतरनाक होता है। कांग्रेस आज जिस शैली में आगे बढ़ रही है उसमें भविष्य की संभावना को नकारा जा रहा है और वर्तमान में स्थापित लोगों को महत्व मिल रहा है।

ऐसे नेता जो पार्टी के भविष्य के लिए भार जैसे साबित हो रहे हैं, उनको राजनीतिक समर से बाहर करना भी एक महत्वपूर्ण काम खड़गे के सामने रहेगा। पार्टी के जो पुर्जे घिस गए हैं, जिन पहियों में जंग लग गई है, जो अब स्वयं से चलने में सक्षम नहीं रह गए हैं, उनको ढोते रहना भी पार्टी को नुकसान पहुंचाने जैसा ही है। नेताओं के पारस्परिक विवादों के समाधान के लिए भी कोई अभिनव व्यवस्था स्थापित करने की जरूरत है।

राजनीतिक मुद्दों के विरोधाभास से भी कांग्रेस ग्रसित दिखाई पड़ती है। जो मुद्दे जनता के दिल में घर कर जाते हैं उन पर कांग्रेस का डबल स्टैंडर्ड दिखाई पड़ता है। इसके कारण कांग्रेस जन-मन में अपना स्थान कायम रखने से पिछड़ती जा रही है। अध्यक्ष का यह चुनाव फिलहाल गांधी परिवार के लिए फायदेमंद दिखाई पड़ रहा है। रिमोट से पार्टी के सारे सूत्र 10 जनपथ के नियंत्रण में रहेंगे।

पार्टी में जोश और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने में नए अध्यक्ष की भूमिका बहुत कारगर रहने की संभावना नहीं दिखाई पड़ती है। राजनीति का पत्ता खड़कता रहेगा, सत्ता का सिंहासन कांग्रेस से सरकता रहेगा। कांग्रेस के नए अध्यक्ष खड़गे पार्टी के दिल को धड़काने में अपनी कितनी धमक दिखा सकेंगे, यह बड़ा सवाल सबके दिल में है। वैसे तो जवाब चुनाव में खड़गे की जीत की तरह पता है लेकिन फिर भी इसको वक्त पर छोड़ना ही समझदारी होगी। 

‘अंटी में नहीं धेला, फिर भी चले देखने मेला’ यह बहुत चर्चित कहावत है। कांग्रेस के पास आज जनाधार का धेला लगातार कम होता जा रहा है। जब यह धेला नहीं होगा तो राजनीति का मेला देखने का सपना साकार कैसे हो सकेगा?
(सोशल मीडिया पोस्‍ट से साभार)
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