हेमंत पाल

बॉलीवुड में भी समय-समय पर ऐसी कई फिल्में बनीं, जिनमें बाबाओं के अच्छे और बुरे पहलू उजागर किए गए। यह फिल्मों के लिए नया विषय तो नहीं है, पर इसके कलेवर बदलते रहे। कई फिल्मों के कथानक में धर्म के नाम पर ऐसे पाखंड रचने वालों के कारनामों को उजागर भी किया गया।  90 के दशक में आई अमिताभ बच्चन के नायकत्व वाली प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘जादूगर’ में अमरीश पुरी ने महाप्रभु जगतसागर चिंतामणि का किरदार निभाया था। ये महाप्रभु वास्तव में ठग होता है। इसके बाद तो कई फिल्मों में ऐसे किरदार नजर आए।

अजय देवगन की फिल्म ‘सिंघम रिटर्न्स’ में भी अमोल गुप्ते की धर्मगुरु वाली भूमिका ने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए थे। इस धर्मगुरु का आतंक पूरे शहर में था। उससे पुलिस भी घबराती थी, जबकि वो समाज में गंदगी फैला रहा था। महेश भट्ट की नई फिल्म ‘सड़क-2’ भी एक धर्मगुरु पर केंद्रित है, जो अपने आपको भगवान समझता है। हाल ही में सैफ अली खान अभिनीत वेब सीरीज ‘सेक्रेट गेम्स’ के दूसरे सीजन में भी पंकज त्रिपाठी ने एक गुरु का ही रोल किया।

प्रकाश झा ने तो बॉबी देओल को लेकर ‘आश्रम’ नाम से पूरी वेब सीरीज ही बना दी। ‘आश्रम’ की कहानी को यदि ध्यान से देखा जाए, तो ये पिछले कुछ सालों से चर्चा में रहे और अभी जेल की हवा खा रहे एक बाबा से मिलती जुलती है। पिछले वर्षों में धर्म जैसे संवेदनशील विषय पर ‘ओह माय गॉड’ और ‘पीके’ जैसी फिल्में आई और कामयाब रहीं। ‘धर्म संकट में’ भी उसी मिजाज की फिल्म थी। पर फिल्म का विषय बहुत संवेदनशील होने से ये विवादों में फंसी रही। पहले तो फिल्म के पोस्टर को लेकर विवाद हुआ। इसके बाद सेंसर बोर्ड ने सर्टिफिकेशन के लिए होने वाली स्क्रीनिंग के दौरान हिंदू व मुस्लिम धर्मगुरुओं को बकायदा आमंत्रित किया और उनकी सलाह पर फिल्म में कांट छांट की गई।

सेंसर बोर्ड के किसी फिल्म को मंजूरी देने से पहले धर्मगुरुओं की सलाह लेने का यह पहला मामला था। फिल्म ‘धर्म संकट में’ 2010 में आई ब्रिटिश कॉमेडी फिल्म ‘द इन्फिडेल’ का ऑफिशियल हिन्दी वर्जन है। यह फिल्म एक ब्रिटिश मुस्लिम महमूद नासिर की कहानी थी, जिसे बाद में पता चलता है कि वह एक यहूदी परिवार में पैदा हुआ था। उसे दो सप्ताह की उम्र में मुस्लिम परिवार ने गोद ले लिया था। इस फिल्म को ईरान सहित कई मुस्लिम देशों में भी रिलीज किया गया, लेकिन इजरायल में इसे नहीं दिखाया जा सका।

फिल्मों में धर्म एक नया विषय बन गया है, जिसे समय-समय पर अलग-अलग तड़कों के साथ भुनाया जाता है। दरअसल, ये हमारे समाज का ही चेहरा है। जैसा समाज में होता है, वही फिल्मों के विषय बनते हैं। हाल के वर्षों में धर्म से जुड़े आडंबर, अंधभक्ति और धर्मगुरुओं के कारनामे सुर्खियों में रहे हैं, उसी से बॉलीवुड को ये नया विषय मिला है। धर्म पर विवाद हमेशा ही समाज और राजनीति के केंद्र रहे हैं। ऐसी स्थिति में सिनेमा इस बहस में पीछे रहना नहीं चाहता।

लेकिन, इस संवेदनशील विषय को फिल्मकारों ने गंभीरता के बजाय व्यावसायिक ढंग से भुनाने की कोशिश की है। अभी तक ऐसी कोई फिल्म नहीं बनी, जिसमें धर्मगुरुओं के चमत्कारों और उनकी कथित लीलाओं को लेकर कोई सार्थक फिल्म बनाने की कोशिश की गई हो। जेल में बंद कथित धर्मगुरु बाबा राम-रहीम ने तो खुद ही हीरो बनकर फ़िल्में बनाकर अपनी खिल्ली उड़वाई थी। मैसेंजर ऑफ गॉड, द मैसेंजर, द वॉरियर हार्ट, हिंद का नापाक को जवाब और जट्ट इंजीनियर बनाकर उन्होंने खुद को दैवीय शक्ति वाले भगवान की तरह परदे पर पेश किया था।

इस जैसी सभी फिल्मों में आमिर खान की ‘पीके’ को सबसे अच्छा माना जा सकता है। फिल्म में सौरभ शुक्ला ने एक ऐसे धर्मगुरु की भूमिका निभाई थी, जिसके चमत्कारों को ‘पीके’ यानी फिल्म का नायक चुनौती देता है। इस वजह से शुरुआती दौर में इस फिल्म को देशभर में विरोध भी सहना पड़ा था। परेश रावल और अक्षय कुमार की फिल्म ‘ओह माय गॉड’ गुजराती नाटक ‘कांजी विरुद्ध कांजी’ का फिल्मी रीमेक थी। फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती, गोविंद नामदेव और पूनम झावर पाखंडी धर्मगुरुओं के किरदारों में थे जिन्होंने धर्म को व्यापार बना दिया था। ‘चल गुरु हो जा शुरू’ फिल्म में पाखंडी युवा साधुओं के जनता को बेवकूफ बनाने की कहानी बहुत अच्छे तरीके से दिखाई गई थी। इस फिल्म ने समाज में बढ़ते अंधविश्वास पर खासी चोट की थी।

‘ग्लोबल बाबा’ भी खुद को भगवान बताने वाले बाबाओं की फिल्म थी। यह फिल्म उन भक्तों की स्थिति दिखाती थी, जो आंखें मूंदकर ऐसे पाखंडियों पर भरोसा कर लेते हैं। ‘दोजख : इन सर्च ऑफ हैवन’ और ‘देख तमाशा देख’ भी अंधविश्वास और पाखंडी बाबाओं की असलियत बताने वाली फ़िल्में हैं। इसके बाद भी समाज में बाबाओं और गुरुओं का दखल कम नहीं हुआ और न कभी होगा। क्योंकि, धर्म का भय दिखाकर जो आडंबर रचते हैं, उसका असर जल्दी ख़त्म नहीं होता।