राकेश दुबे

मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के केम्पियन स्कूल में पढ़ रहे छात्र ने दीपावली की शुभकामना देते हुए मुझसे प्रश्न किया- “ आयुर्वेद क्या है?” उसने यह भी जानकारी दी की उसके पाठ्यक्रम में ऐसी कोई जानकारी अब तक नहीं  आई है। मध्यप्रदेश सरकार को सोचना चाहिए, भारत की इस प्राचीन नैदानिक और जीवन रक्षा विधि के सम्बन्ध में, सामान्य जानकारी विद्यालय स्तर पर क्यों उपलब्ध नहीं है? इस दिशा में सरकारों के प्रयास होना जरूरी हैं।

वस्तुत:आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति ही नहीं, अपने आप में एक सम्पूर्ण विज्ञान है। ‘आयुर्वेद’ शब्द का अर्थ ही है ‘जीवन का विज्ञान’। साधारण भाषा में कहें तो जीवन को ठीक प्रकार से जीने का विज्ञान ही आयुर्वेद है, क्योंकि यह विज्ञान केवल रोगों की चिकित्सा या रोगों का ज्ञान ही प्रदान नहीं करता, अपितु जीवन जीने के लिए सभी प्रकार के आवश्यक ज्ञान की प्राप्ति कराता है। आयुर्वेद के दो मुख्य उद्देश्य हैं, ‘प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकार प्रशमनं च।’ अर्थात‍् आयुर्वेद का प्रयोजन स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना है।

हमारी दिनचर्या, ऋतुचर्या, आहार-विहार अगर समुचित हों तो हम तमाम रोगों से दूर रहकर अपने जीवन को उज्ज्वल और दीर्घायु बना सकते हैं। आयुर्वेद में आहार ही मेडिसिन है। यदि हम भोजन का सेवन विधिपूर्वक करेंगे तो कभी भी अस्वस्थ नहीं होंगे। आयुर्वेद चिकित्सा का प्रकृति पर आधारित होना इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।

आयुर्वेद विश्व की सबसे प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है। इसका इतिहास 5000 वर्ष पुराना है। जब तक आधुनिक चिकित्सा विज्ञान (एलोपैथी) का उद्भव नहीं हुआ तब तक हमारे शल्यज्ञ महर्षि सुश्रुत ने प्लास्टिक सर्जरी व अन्य शल्य उपकरणों के बारे में खोज कर ली थी। आयुर्वेद के उत्थान में महर्षि चरक, सुश्रुत, वाग्भट, धन्वंतरि का अहम योगदान रहा है। आयुर्वेद को आठ विभागों में बांटा गया है, इसमें पंचकर्म पद्धति द्वारा चिकित्सा के बहुत अच्छे परिणाम हैं। आयुर्वेद के पिछड़ने की वजह आज़ादी से पूर्व ब्रिटिश साम्राज्य में आयुर्वेद की उपेक्षा रही। आयुर्वेद ग्रंथों को नष्ट कर दिया गया, आयुर्वेद उपचार को अवैज्ञानिक और अंधविश्वासी बताया गया था।

दुर्भाग्य, आज़ादी के बाद भी आयुर्वेद लगातार उपेक्षा का शिकार रहा है। कुछ राज्यों में आयुर्वेद विभाग की हालत आज भी दयनीय है, जहां आयुर्वेदिक अस्पतालों में मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी आयुर्वेद के उत्थान में बाधक है। मध्यप्रदेश में ऐसा नहीं है, पर सरकार का ध्यान इस ओर कम है।

प्रत्येक चिकित्सा पद्धति के अपने मूल सिद्धांत होते हैं। उसी प्रकार आयुर्वेद चिकित्सा के अपने सिद्धांत हैं। इसमें निदान परिवर्जन अर्थात‍् रोग के कारण का त्याग या शमन किया जाता है, जिससे व्याधि को समूल नष्ट किया जा सके। इसकी तुलना हमें आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से नहीं करनी चाहिए। आधुनिक चिकित्सा-पद्धति में क्योर होने वाले रोगों की संख्या बहुत कम है, जैसे क्षय रोग, कैंसर आदि। आयुर्वेद में डेंगू, हेपेटाइटिस, कोलाइटिस, पेंक्रियेटाइटिस, ब्रोंकाइटिस अर्थराइटिस, सोराइसिस व सिरदर्द से लेकर कैंसर तक हम सैकड़ों रोगों को पूर्णतः निर्मूल कर सकते हैं।

कोरोना महामारी के दौरान देश में इम्यूनिटी बूस्टर में आयुर्वेद का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस दौरान आयुर्वेद उत्पादों की मांग अन्य देशों में काफी बढ़ गई। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में आयुर्वेदिक दवाइयों का सालाना कारोबार 10 हजार करोड़ रुपये का है, जबकि एक हजार करोड़ रुपये की आयुर्वेदिक दवाइयां निर्यात की जाती हैं। अगर सभी आयुर्वेदिक उत्पादों की बात करें तो 2018 में इसका सालाना कोराबार 30 हजार करोड़ रुपये था, जो 2024 तक 71 हजार करोड़ रुपये होना संभावित है। कोरोना संकट के वायरस से बचने के लिए लोग काढ़ा व हल्दी वाला दूध पी रहे थे, गिलोय और अदरक का भी सेवन कर रहे थे। असल में ये सभी इलाज की पद्धतियां आयुर्वेद में हैं। आयुर्वेद में इन्हीं जड़ी-बूटियों से लोगों को स्‍वस्‍थ किया जाता है। मध्यप्रदेश के जंगल और जड़ी-बूटी अद्भुत हैं, जरूरत सरकार के प्रयास और प्रचार की है।

योग की तरह आयुर्वेद को भी विश्वपटल पर पहुंचाने के लिए पहले हमें इसे मुख्यधारा में लाना चाहिए। इसे वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह हमारे देश-प्रदेश की धरोहर है। सरकार को आयुर्वेद के अनुसंधान में बजट बढ़ाना चाहिए। साथ ही आयुर्वेद के नाम पर चलने वाले फर्ज़ी दवाखानों व अंधविश्वासी बाबाओं पर नियंत्रण भी आवश्यक है।
(मध्यमत)
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